कविता : संजा - मिट्टी की खुशबू का पर्व, लोक संस्कृति और परंपराओं का अनूठा चित्रण

कविता : संजा - मिट्टी की खुशबू का पर्व, लोक संस्कृति और परंपराओं का अनूठा चित्रण

संजा पर्व को लेकर एक विशेष कविता सामने आई है जिसमें मिट्टी की खुशबू और लोक संस्कृति का सुंदर वर्णन किया गया है। यह कविता संजा के महत्व और उससे जुड़ी यादों को ताजा करती है। यह रचना संजय एम. तराणेकर द्वारा लिखी गई है जो इंदौर, मध्य प्रदेश के कवि, लेखक व समीक्षक हैं।

कच्ची दीवारों पर संजा और बेटियों की कला

हाँ, जब कच्ची दीवारों पर संजा मुस्कुराती थी। बेटियाँ मिट्टी, गोबर और फूलों से दुनिया सजाती थीं। नन्ही-सी उँगलियों में पूरा गाँव उतर आता था। हर दिन आकृति में मन का सपना मुस्काता था।

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सहेलियों के गीत और लोककथाएं

सहेलियाँ गीत सुनाती थीं और हँसी आँगन में गूँजती थी। नानी और दादी लोककथाओं से शाम को महकाती थीं। संजा केवल एक चित्र नहीं थी बल्कि यह रिश्तों की पहचान थी। यह बेटियों के कोमल मन में लोक संस्कृति की जान थी।

सोलह दिन का उत्सव और विदाई

सोलह दिन तक हर संध्या एक नया उत्सव होता था। मिट्टी के अदने आँगन में बड़ा-सा संसार संजोता था। फिर अमावस की बेला आती थी और संजा विदा हो जाती थी। जाते-जाते वह घर और आँगन में यादों की खुशबू छोड़ जाती थी। इस कविता के रचयिता संजय एम. तराणेकर (कवि, लेखक व समीक्षक) हैं जो इन्दौर (मध्य प्रदेश) के निवासी हैं और इनका संपर्क नंबर 98260 25986 है।

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