पितृपक्ष 2026: श्राद्ध, तर्पण और पितरों की मान्यता

पितरों को तृप्त करने से जीवन में कभी धन, विद्या और संतान की कमी नहीं होती, घर में शांति बनी रहती है,,
लेखक --सुनील कुमार वाजपेयी शिवम्
भारतीय संस्कृति में जीवन को केवल जन्म से मृत्यु तक सीमित नहीं माना गया है। यहां जीवन को एक अटूट श्रृंखला के रूप में देखा गया है, जहां पूर्वजों का आशीर्वाद और उनकी तृप्ति वर्तमान पीढ़ी के सुख का आधार है। हमारे शास्त्रों में तीन प्रकार के ऋण बताए गए हैं; देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। देव ऋण पूजा पाठ से, ऋषि ऋण ज्ञान के प्रसार से और पितृ ऋण पितरों की सेवा, श्राद्ध और तर्पण से चुकाया जाता है। इसी पितृ ऋण को चुकाने का पर्व है पितृपक्ष।
भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक का पंद्रह दिन का समय पितृपक्ष कहलाता है। इसे महालय पक्ष, श्राद्ध पक्ष और कनागत के नाम से भी जाना जाता है। इन पंद्रह दिनों में हमारे पितर पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं और अपने वंशजों से तर्पण की आशा करते हैं।पितृपक्ष का महत्व केवल धार्मिक नहीं, वैज्ञानिक और सामाजिक भी है। पहला महत्व कृतज्ञता का है। जिस माता पिता और पूर्वजों ने हमें जन्म दिया, पालन पोषण किया, संस्कार दिए, संपत्ति दी, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का यह अवसर है। यदि हम अपने मूल को भूल जाएंगे तो हमारा अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा।
पितृपक्ष हमें याद दिलाता है कि हम अकेले नहीं हैं, हमारे पीछे एक लंबी परंपरा है। दूसरा महत्व आध्यात्मिक है। गरुड़ पुराण, मार्कंडेय पुराण और मनुस्मृति में कहा गया है कि मृत्यु के बाद आत्मा तुरंत मुक्त नहीं होती। उसकी गति उसके कर्मों पर निर्भर करती है। जो आत्माएं अतृप्त रह जाती हैं, वे पितृलोक में निवास करती हैं। श्राद्ध और तर्पण से उन्हें तृप्ति मिलती है, उन्हें आगे की गति मिलती है और वे प्रसन्न होकर अपने वंशजों को आशीर्वाद देती हैं।
तीसरा महत्व सामाजिक एकता का है। पितृपक्ष में परिवार के सभी सदस्य एकत्र होते हैं। जो लोग काम के कारण दूर रहते हैं, वे भी इस अवसर पर घर आते हैं। वंश वृक्ष की चर्चा होती है, पुरानी कथाएं सुनाई जाती हैं, नई पीढ़ी को अपने गोत्र और अपने पूर्वजों के बारे में ज्ञान मिलता है। इससे परिवार में एकता और संस्कारों का संरक्षण होता है। चौथा महत्व दान और संयम का है। पितृपक्ष में सात्विक भोजन, ब्रह्मचर्य, सत्य बोलना और दान करने का विधान है। इससे मन और शरीर दोनों शुद्ध होते हैं। कई लोग प्रश्न करते हैं कि आज के वैज्ञानिक युग में पितृपक्ष का क्या औचित्य है। इसका उत्तर हमारे शास्त्रों में ही है।
हमारे शरीर में हमारे पितरों के गुणसूत्र होते हैं। हमारे स्वभाव, हमारे रोग और हमारे संस्कारों में हमारे पितरों का अंश होता है। जब हम तर्पण करते हैं तो हम केवल जल नहीं देते, हम अपने भीतर के पितृ अंश को शुद्ध करते हैं। यह एक प्रकार का मानसिक और आत्मिक शोधन है। दूसरे, यह प्रकृति के चक्र से भी जुड़ा है। पितृपक्ष वर्षा ऋतु के अंत और शरद ऋतु के प्रारंभ में आता है।
इस समय पृथ्वी पर पितरों के निमित्त उगने वाले कुश, तिल और जौ सहज उपलब्ध होते हैं। इस समय सूर्य कन्या राशि में होता है, जिसे शास्त्रों में पितरों के लिए अनुकूल माना गया है। तीसरे, पितृपक्ष मनोवैज्ञानिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। जब हम अपने दिवंगत माता-पिता के लिए श्राद्ध करते हैं तो हमारे मन में उनके प्रति जो अपराध बोध या अपूर्ण कर्तव्य की भावना होती है, वह शांत होती है। हमें संतोष मिलता है कि हमने अपना कर्तव्य पूरा किया।
पितृपक्ष कौन मना सकता है। इस विषय में शास्त्रों में स्पष्ट नियम हैं। सबसे पहला अधिकारी पुत्र होता है। ज्येष्ठ पुत्र को श्राद्ध का मुख्य अधिकारी माना गया है। यदि ज्येष्ठ पुत्र न हो तो अन्य पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र भी कर सकते हैं। यदि पुत्र न हो तो पुत्री का पुत्र अर्थात दौहित्र भी श्राद्ध कर सकता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि पुत्री भी अपने पिता का श्राद्ध कर सकती है, विशेषकर वर्तमान समय में जब पुत्र और पुत्री में भेद नहीं माना जाता। यदि पुत्र परिवार में न हो तो पत्नी अपने पति के निमित्त श्राद्ध कर सकती है। भाई, भतीजा, शिष्य और मित्र भी श्राद्ध कर सकते हैं यदि परिवार में कोई अन्य अधिकारी न हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि श्राद्ध भाव से किया जाता है, केवल रक्त संबंध से नहीं। जिसके मन में पितरों के प्रति श्रद्धा है, वही श्राद्ध कर सकता है। श्राद्ध शब्द श्रद्धा से ही बना है। इसलिए श्रद्धा ही सबसे बड़ी पात्रता है। जिनके माता पिता जीवित हैं, वे अपने दादा-दादी, परदादा परदादी का श्राद्ध कर सकते हैं।
जिनके माता पिता नहीं हैं, वे उनका श्राद्ध तिथि के अनुसार करते हैं। जिनको अपने पितरों की तिथि ज्ञात नहीं है, वे अमावस्या को जिसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है, उस दिन सभी पितरों का श्राद्ध कर सकते हैं। श्राद्ध के लिए आडंबर की आवश्यकता नहीं, भाव की आवश्यकता है। फिर भी शास्त्रों में कुछ सामग्री बताई गई है, पवित्रता के लिए। पहला कुश को बहुत पवित्र माना गया है। इसके बिना श्राद्ध अधूरा माना जाता है। कुश की अंगूठी पहनकर श्राद्ध किया जाता है। दूसरे काला तिल, काला तिल पितरों को बहुत प्रिय है। तर्पण में तिल का प्रयोग अनिवार्य है। तीसरे जौ, जौ को देवताओं का अन्न कहा गया है और यह पवित्रता का प्रतीक है।
चौथे गंगाजल या किसी पवित्र नदी का जल, यदि गंगाजल न हो तो स्वच्छ जल में तुलसी पत्र डालकर उसे पवित्र बनाया जाता है। पितरों के लिए सात्विक भोजन बनाया जाता है। इसमें चावल, दाल, बिना लहसुन प्याज की सब्जी, पूरी, कद्दू की सब्जी, खीर और मलाई रहित दूध से बने पदार्थ होते हैं। भोजन में खीर का विशेष महत्व है क्योंकि खीर चंद्रमा और पितरों दोनों को प्रिय है। अन्य सामग्रियों में धूप, दीपक, श्वेत चंदन, रोली, तुलसी पत्र, श्वेत फूल, फल, पान, सुपारी, दक्षिणा के लिए वस्त्र या अन्न, गौ ग्रास के लिए घास और कौए, गाय, कुत्ते और चींटी के लिए निकाला गया भोजन। पितृपक्ष में श्राद्ध करने की विधि बहुत कठिन नहीं है।
इसे सामान्य व्यक्ति भी कर सकता है। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के दक्षिण दिशा में एक स्थान को गोबर या जल से शुद्ध करें। क्योंकि दक्षिण दिशा पितरों की दिशा मानी जाती है। सबसे पहले हाथ में कुश, जल, तिल और फूल लेकर संकल्प लें। संकल्प में अपना नाम, गोत्र और जिस पितर के लिए श्राद्ध कर रहे हैं उसका नाम और तिथि का उच्चारण करें। इसके बाद तर्पण करें। तांबे के लोटे में जल, काला तिल, जौ और तुलसी पत्र डालें। जनेऊ को दाहिने कंधे से बाएं कंधे की ओर करें, जिसे अपसव्य कहा जाता है। अपने अंगूठे और तर्जनी के बीच से जल को धीरे धीरे छोड़ें।
यह तर्पण पितरों को तृप्ति देता है। पिता के लिए तीन अंजलि, दादा के लिए तीन और परदादा के लिए तीन अंजलि जल दें। इसी प्रकार माता पक्ष के लिए भी तर्पण करें। तर्पण के बाद पिंडदान करें। पके हुए चावल, जौ का आटा, तिल, शहद और घी मिलाकर तीन या छह पिंड बनाएं। ये पिंड पितरों के शरीर के प्रतीक माने जाते हैं। इन्हें केले के पत्ते या दोने पर रखें। इसके बाद ब्राह्मण भोजन या किसी सात्विक व्यक्ति को भोजन कराएं। यदि ब्राह्मण न मिले तो गाय, कौए, कुत्ते और चींटी को भोजन का अंश दें। शास्त्रों में कहा गया है कि पितर इन रूपों में भोजन ग्रहण करने आते हैं। विशेषकर कौए को पितरों का रूप माना गया है।
भोजन के बाद यथाशक्ति दान करें। दान में अन्न, वस्त्र, तिल, गुड़, घी, चांदी और भूमि का दान श्रेष्ठ माना गया है। परंतु सबसे बड़ा दान अन्नदान है। किसी भूखे को भोजन कराना पितरों को सबसे अधिक प्रसन्न करता है। अंत में हाथ जोड़कर पितरों से क्षमा प्रार्थना करें और यह मंत्र बोलें - आब्रह्मभुवनाल्लोकाद् आब्रह्मभुवनात् सर्व पितरः तृप्यन्तु। अर्थात ब्रह्मलोक से लेकर पृथ्वी तक सभी पितर तृप्त हों। पितृपक्ष में कुछ कार्य वर्जित माने गए हैं।
इस पक्ष में नया कार्य, नया घर, नया वाहन, मांगलिक कार्य जैसे विवाह और मुंडन नहीं करना चाहिए। मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज, मसूर की दाल और बासी भोजन से बचना चाहिए। क्रोध, झूठ और कलह से दूर रहना चाहिए। शरीर और मन दोनों को सात्विक रखना चाहिए। पितृपक्ष केवल कर्मकांड नहीं, यह हमारी संस्कृति का मूल है। यह हमें याद दिलाता है कि हम अपने पूर्वजों के आशीर्वाद से ही हैं। जो व्यक्ति अपने पितरों को तृप्त करता है, उसके जीवन में कभी धन, विद्या और संतान की कमी नहीं होती। उसके घर में शांति बनी रहती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार पितृपक्ष अवश्य मनाना चाहिए। इससे न केवल पितरों की मुक्ति होती है, बल्कि हमारा अपना जीवन भी धन्य होता है।