नौकरी का वेतन और ड्यूटी का हिसाब कविता: जानिए सरकारी पद और कर्तव्य पर क्या उठे सवाल

नौकरी का वेतन और ड्यूटी का हिसाब कविता: जानिए सरकारी पद और कर्तव्य पर क्या उठे सवाल

सरकारी कुर्सी मिली तो जिम्मेदारी साथ आई, और वेतन केवल हक नहीं बल्कि ड्यूटी की शपथ समाई। यह बात संजय एम तराणेकर, कवि, लेखक व समीक्षक, इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश), मो. 98260 25986 द्वारा रचित कविता में कही गई है। इस कविता का संदर्भ विधायक की भतीजी को बिना काम सैलरी मिलने से जुड़ा है।

छह महीने ड्यूटी से दूरी, फिर भी वेतन जारी रहने पर जब सवाल उठा तो दफ्तर में हर कोई थोड़ा भारी नजर आया। कविता में बताया गया है कि पीजी की पढ़ाई और नौकरी की ड्यूटी अपनी जगह है, लेकिन दोनों साथ निभाने में नियमों का साफ हिसाब होना चाहिए।

सिफारिश हो या रिश्ते, कानून सभी के लिए हो, और सरकारी पद पर बैठने वाले व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति नेक होना चाहिए। 70 हजार रुपये की तनख्वाह में जनता का पैसा जुड़ा होता है और हर एक रुपये के पीछे किसी न किसी का विश्वास खड़ा होता है।

जांच अगर अब हो रही है, तो सच सामने आने दो, और दोषी कौन है तथा निर्दोष कौन है, यह नियमों को ही बतलाने दो। कविता के माध्यम से यही संदेश दिया गया है कि प्रशासनिक व्यवस्था और नियमों का पालन पूरी ईमानदारी से होना चाहिए।

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