निमाड़ी दिवस: एक बोली नहीं निमाड़ की सदियों पुरानी साँस और जीवंत संस्कृति

निमाड़ी दिवस: एक बोली नहीं निमाड़ की सदियों पुरानी साँस और जीवंत संस्कृति

नर्मदा, नीम और निमाड़ी निमाड़ की जीवित आत्मकथा हैं। कहीं गीत, कहीं कहावत और कहीं माँ की पुकार के रूप में निमाड़ी हर जगह मौजूद है। भाषा तब नहीं मरती जब उसके शब्द चुक जाते हैं, बल्कि वह तब सूखने लगती है जब लोग अपनी ही बोली बोलने में संकोच करने लगते हैं। 19 सितंबर का निमाड़ी दिवस कोई तारीख भर नहीं है, बल्कि यह निमाड़ के स्वर को पहचानने और स्वाभिमान से जीने का दिन है। नर्मदा की लहरों से लेकर खेतों की मेड़ों तक और महेश्वर के घाटों से गाँव की चौपालों तक निमाड़ी केवल संवाद का साधन नहीं है, बल्कि यह मिट्टी में रची एक जीवन-दृष्टि है। अखिल निमाड़ लोक परिषद यानी अनिलोप की पहल से जुड़ा यह दिवस किसी बोली को सम्मान देने भर का अवसर नहीं है, बल्कि यह उस लोक-संस्कृति को नमन है जिसने इतिहास, पुरातत्व, अध्यात्म और लोकजीवन को पीढ़ियों से एक सांस्कृतिक सूत्र में बाँधे रखा है। जब निमाड़ की स्मृति बोलती है, तो उसकी सबसे आत्मीय आवाज़ निमाड़ी भाषा में ही सुनाई देती है।

इतिहास और लोकजीवन का संगम है निमाड़ भू-भाग

प्राचीन अनूप जनपद जो नर्मदा घाटी के आसपास फैला हुआ था, वहाँ से लेकर आज के खरगोन, खंडवा, बड़वानी और बुरहानपुर तक फैला निमाड़ केवल एक भू-भाग नहीं है, बल्कि यह इतिहास और लोकजीवन का अद्भुत संगम है। इस क्षेत्र में सदियों की स्मृतियाँ साँस लेती हैं। यहाँ नर्मदा केवल एक नदी नहीं बल्कि रेवा है, महेश्वर केवल एक नगर नहीं बल्कि प्राचीन महिष्मती की स्मृति है, और ओंकारेश्वर-मांधाता केवल तीर्थ नहीं बल्कि आस्था और पुराकथाओं के प्रमुख केंद्र हैं। महेश्वर के नावदाटोली के पुरातात्त्विक अवशेष नर्मदा घाटी की ताम्रपाषाणकालीन सभ्यता की गहराई और निरंतरता के बड़े साक्षी हैं। इसी धरती पर आर्य और अनार्य सांस्कृतिक धाराएँ आपस में मिलीं और एक विशिष्ट लोकसंस्कृति ने आकार लिया। गणगौर के गीतों की गूँज, भागोरिया हाट का उल्लास, कलगी-तुर्रा की स्वर-स्पर्धा और नर्मदा के प्रति अटूट श्रद्धा इस क्षेत्र की सांस्कृतिक आत्मा में पूरी तरह घुल चुके हैं। यही निमाड़ है जहाँ इतिहास मिट्टी में, लोक स्मृति में और संस्कृति जीवन की धड़कन में पूरी तरह जीवित है।

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शौरसेनी अपभ्रंश से जुड़ी हैं निमाड़ी की भाषिक जड़ें

निमाड़ी की पहचान केवल उसके शब्दों में ही नहीं बसती है, बल्कि उन शब्दों से निकलती अपनी विशिष्ट ध्वनि में भी निवास करती है। शौरसेनी अपभ्रंश से जुड़ी इसकी भाषिक जड़ें राजस्थानी भाषा-परिवार और पश्चिमी हिंदी अंचल के साथ संवाद करती हैं। इसके अलावा मालवी, गुजराती, भीली और खानदेशी के संपर्क ने इसके शब्द-संसार को और अधिक समृद्धि प्रदान की है। विलंबित ‘अs’ और प्राचीन ‘ळ’ जैसी ध्वन्यात्मक विशेषताएँ निमाड़ी को एक अलग पहचान देती हैं। ‘मनs’, ‘मखs’, ‘काजळ’ और ‘डोळो’ जैसे शब्द केवल साधारण बोले हुए शब्द नहीं हैं, बल्कि ये निमाड़ की मिट्टी, स्मृति और संवेदना की अपनी आवाज़ हैं। वर्ष 2011 की जनगणना में लगभग 23 लाख लोगों ने निमाड़ी को अपनी मातृभाषा बताया था। यह आँकड़ा भले ही इसके सामाजिक विस्तार को पूरी तरह न समेट पाए, लेकिन यह इतना जरूर कहता है कि निमाड़ी किसी सीमित गाँव की बोलचाल मात्र नहीं है, बल्कि एक व्यापक लोकसमुदाय की जीवित और अपनी पहचान बोलती हुई एक सशक्त भाषा है।

लोकस्मृति में रचा-बसै है निमाड़ का समृद्ध साहित्य

निमाड़ी का सबसे बड़ा साहित्य वह है जो कागज़ पर उतरने से पहले सीधे लोकस्मृति में रचा गया था। संत सिंगाजी के निर्गुण भजनों से लेकर खेतों के श्रमगीतों तक, सोहर से लेकर ऋतुगीतों तक, और विवाह-धार्मिक गीतों से लेकर व्रतकथाओं तक, हर विधा में निमाड़ के जीवन का अनुभव और लोकस्मृति पूरी तरह सुरक्षित है। पशु-पक्षियों की लोककथाएँ लोगों को नीति-व्यवहार का बोध कराती हैं, तो वहीं लोकोक्तियाँ मौसम, पर्यावरण, श्रम और सामाजिक संबंधों का लोकज्ञान अपने भीतर सँजोए रखती हैं। इस ज्ञान को किसी पुस्तकालय में नहीं बल्कि सीधे जीवन में पढ़ा गया है। ‘सदा नीरा, हरs पीरा। गाँव मुलुक, मs जड़s हीरा’ जैसी पंक्तियाँ लोकबुद्धि की अमूल्य विरासत हैं। इन पंक्तियों में साधारण शब्दों के भीतर असाधारण जीवन-दृष्टि छिपी हुई है जिसे आधुनिक ज्ञान की भाषा में समझने की बहुत आवश्यकता है। संत परंपरा, चित्रकला, लोकनृत्य और नर्मदाष्टक जैसी अभिव्यक्तियाँ इस संसार को और अधिक विस्तार देती हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि निमाड़ी साहित्य किताबों से कहीं अधिक लोगों की आवाज़, स्मृति और जीवन-पद्धति में जीवित है।

संस्कृति और आत्मीयता से जुड़े हैं निमाड़ी के रिश्ते

निमाड़ी की असली ताकत बड़े-बड़े शब्दों में नहीं बल्कि छोटी-छोटी आत्मीयताओं में बसती है जहाँ भाषा खुद एक रिश्ते में बदल जाती है। खेत से लौटते हुए किसान का संबोधन, देहरी पर बुजुर्गों की कोई कहावत और दूर मुंबई या भोपाल में बसे किसी निमाड़ी व्यक्ति का अपनी माँ से ‘भला तो’ कहना सीधे मिट्टी से जुड़ाव को जगा देता है। जन्म से लेकर विवाह तक निमाड़ी गीतों की उपस्थिति सांस्कृतिक निरंतरता की बड़ी साक्षी है। कलगी-तुर्रा जैसी लोकपरंपराएँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि यह सामुदायिक संवाद और स्मृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने वाली प्रमुख लोक-संस्थाएँ हैं। संत सिंगाजी से लेकर आधुनिक निमाड़ी साहित्य तक की यह लंबी यात्रा यह बताती है कि भाषा ने अपने रूप जरूर बदले हैं, लेकिन अपनी मूल आत्मा को कभी नहीं छोड़ा है। महादेव प्रसाद चतुर्वेदी का ‘अम्मर बोल’ निमाड़ी साहित्य की एक बहुत महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है, तो वहीं रामनारायण उपाध्याय जैसे विद्वानों ने निमाड़ी के क्षेत्र और साहित्यिक वैभव को दस्तावेजी रूप देने में अपना बहुमूल्य योगदान दिया है।

निमाड़ी भाषा के संरक्षण और विकास की आवश्यकता

यही कारण है कि निमाड़ी दिवस को केवल एक सांस्कृतिक आयोजन, सम्मान समारोह या केवल स्मरण का दिन मान लेना पर्याप्त नहीं है। अखिल निमाड़ लोक परिषद वर्ष 1953 से निमाड़ी के उत्थान के कार्यों से जुड़ी हुई है और सन 2001 से चली आ रही सम्मान परंपरा के अंतर्गत सैकड़ों कलाकारों, साहित्यकारों और लोक-कलाकारों को सम्मानित किया जा चुका है। निमाड़ी-हिंदी शब्दकोश और व्याकरण इस भाषा को अध्ययन, लेखन और संरक्षण की ठोस जमीन प्रदान करते हैं। अब इस बात की सख्त जरूरत है कि मानकीकरण के साथ-साथ क्षेत्रीय विविधताओं की अस्मिता भी पूरी तरह सुरक्षित रहे। साहित्य, शिक्षा, शोध, डिजिटल माध्यम, ऑडियो-वीडियो अभिलेखन और नई पीढ़ी के रचनात्मक प्रयोगों में निमाड़ी की उपस्थिति लगातार बढ़नी चाहिए। तभी यह केवल विरासत में मिली कोई भाषा बनकर नहीं रहेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की अपनी आवाज़ बनकर बोलेगी। आज के समय में शिक्षा, प्रशासन और रोजगार के क्षेत्र में हिंदी और अंग्रेजी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। यह निमाड़ी के लिए एक चुनौती जरूर है, लेकिन साथ ही यह एक बड़ी संभावना भी है क्योंकि एक बहुभाषिक समाज में मातृभाषा और संपर्क-भाषा दोनों साथ-साथ फल-फूल सकती हैं। निमाड़ी को बचाना हिंदी या अंग्रेजी से किसी प्रकार की दूरी बनाना नहीं है, बल्कि अपनी मूल जड़ों से नाता बनाए रखना है। नर्मदा, नीम, खेत, लोकगीत, औषधीय परंपरा और पर्यावरणीय अनुभवों से बुना हुआ इसका शब्द-संसार आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान का एक बहुत बड़ा भंडार है। इसलिए 19 सितंबर का संदेश बिल्कुल सीधा और स्पष्ट है कि निमाड़ी को किसी संग्रहालय में सुरक्षित रखने से कहीं अधिक जरूरी काम यह है कि इसे अपने घर में बोला जाए, विद्यालय में सुनाया जाए, साहित्य में रचा जाए और डिजिटल दुनिया में हमेशा जिलाए रखा जिस दिन अगली पीढ़ी बिना किसी संकोच के यह कहेगी कि ‘अपनी-अपनी निमाड़ी सबसे प्यारी’, उस दिन निमाड़ी दिवस केवल मनाया नहीं जाएगा बल्कि अपनी मिट्टी की आवाज़ बनकर पूरी तरह जिया जाएगा। यह लेख शिक्षाविद् प्रो. आरके जैन “अरिजीत” बड़वानी, मध्य प्रदेश द्वारा लिखा गया है।

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