पुस्तक चर्चा: नाभिनाल का अटूट रिश्ता - माँ और संतान के शाश्वत संबंध की साहित्यिक यात्रा

विवेक रंजन श्रीवास्तव द्वारा लिखित और खुदेजा खान तथा डॉ. मयंक मुरारी द्वारा संपादित काव्य संकलन ‘नाभिनाल का अटूट रिश्ता’ पर आधारित यह पुस्तक चर्चा माँ और संतान के बीच के अनूठे रिश्ते को गहराई से समझती है। इस लेख में संकलन की विभिन्न कविताओं के माध्यम से मातृत्व के अलग-अलग रूपों और भावनाओं को रेखांकित किया गया है।
माँ को पढ़ना उस मौन को पढ़ना है जिसे वह जन्म से पहले से पल-पल कष्ट सहकर भी आनंद में बदलती है। माँ जीवन का अमर तत्व है और उस पर प्रायः प्रत्येक कवि ने लिखा है। माँ और संतान का रिश्ता एक अदृश्य धागा है जो जन्म के क्षण में शारीरिक रूप से अलग हो जाता है। लेकिन यह रिश्ता स्मृति, संवेदना और आत्मा के धरातल पर कभी विच्छिन्न नहीं होता है।
नाभिनाल का अटूट रिश्ता: काव्य संकलन की विशेषताएं
खुदेजा खान और डॉ. मयंक मुरारी द्वारा संपादित काव्य संकलन ‘नाभिनाल का अटूट रिश्ता’ इसी शाश्वत संबंध को कविता के अनेक स्वरों में अनुभव करने का अवसर देता है। यह पुस्तक केवल माँ पर लिखी कविताओं का संग्रह नहीं है। यह उस मानवीय अनुभव की साहित्यिक यात्रा है जहाँ माँ एक व्यक्ति से आगे बढ़कर स्मृति, माटी, घर, त्याग, समय और अस्तित्व का रूपक बन जाती है।
नाभिनाल जैविक संबंध का प्रतीक है, जबकि अटूट रिश्ता उसके भावात्मक विस्तार का व्याख्यान करता है। नाभिनाल जन्म के बाद कटती है, पर क्या माँ से संबंध कभी कट सकता है? यही प्रश्न इस शीर्षक को दार्शनिक प्रस्तावना में बदल देता है। संकलन की कविताएँ हमारे भीतर ठहरे हुए बच्चे तक पहुँचने का रास्ता बनाती हैं।
विभिन्न कवियों की कविताओं में माँ के विविध रूप
ब्रज श्रीवास्तव की कविता ‘सबसे पहले माँ’ में माँ की आत्मीय व्याख्या की गई है। कवि लिखते हैं कि माँ केवल माँ नहीं है बल्कि वह किसी जज़्बात की सुखद उपस्थिति है। माँ कोई जन्नत नहीं है वह तो खालिस धरती है और धरती पर मौजूद घर का ओसारा है। यहाँ माँ अमूर्त आदर्श नहीं बल्कि रोजमर्रा की सुरक्षा है।
भरत प्रसाद की कविता ‘कोई और धातु की होती है माँ’ मातृत्व को रहस्य के रूप में देखती है। कवि सलाह देते हैं कि गलती से भी माँ को परखने की गलती मत करना क्योंकि उसके भीतर अज्ञात लिपियाँ छिपी रहती हैं। यहाँ माँ ऐसी किताब है जिसके अक्षर सामान्य बुद्धि से नहीं पढ़े जा सकते हैं।
स्मृति और संघर्ष के जीवंत बिंब
नरेन्द्र गौड़ की कविता ‘माँ का संदूक’ स्मृति को घरेलू वस्तु में खोजती है। पिता द्वारा आइलपेंट से टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में संदूक पर लिखा माँ का नाम परिवार की सामूहिक स्मृति का पात्र बन जाता है। माँ के जाने के बाद उसके कपड़े और आभूषण भावनात्मक और आर्थिक मूल्य के बीच खड़े दिखते हैं।
मिथिलेश रॉय की कविता ‘अपनी कथा में’ माँ को उसकी संतान की माँ होने से पहले एक स्वतंत्र बचपन वाली लड़की के रूप में देखती है। वह पोते-पोतियों को खेलों, नदी और स्कूल की स्मृतियाँ सुनाती है। अमरजीत की कविता ‘चिराग़ जैसी माँ’ में माँ की अनुपस्थिति के बाद शहर में सब पहले जैसा चलने पर भी परिवार में रिक्तता रह जाने का भाव है।
भारतीय संवेदना और माँ का विराट स्वरूप
इस संकलन का एक महत्वपूर्ण पक्ष विभिन्न भाषायी पृष्ठभूमियों के कवियों का सम्मिलन है। मानस रंजन महापात्र की कविता ‘माँ के लिए आकाश के सपने’ में माँ विराट उपस्थिति बन जाती है। कवि लिखते हैं कि आकाश के चप्पे चप्पे पर तेरा नाम लिखा है मेरी माँ और धरती के शब्द सारे असमर्थ हैं तेरा नाम लिखने को।
मधु सक्सेना की कविता ‘बंजारन माँ’ माँ की गृहस्थी को छोटे टीन के बक्से में समेटती है। ‘नाभिनाल का अटूट रिश्ता’ का महत्त्व इस बात में है कि इसमें माँ को देखने की अनेक दृष्टियाँ मौजूद हैं। माँ को याद करना केवल अतीत में लौटना नहीं है, बल्कि स्वयं से यह पूछना भी है कि हमारी वर्तमान जीवन-व्यवस्था में उस व्यक्ति के लिए कितना स्थान बचा है।