कविता: मेज़ों पर पानी का राज़ और अफसरशाही का अंदाज़, संजय एम तराणेकर की रचना

कविता: मेज़ों पर पानी का राज़ और अफसरशाही का अंदाज़, संजय एम तराणेकर की रचना

इन्दौर के कवि, लेखक व समीक्षक संजय एम. तराणेकर की एक कविता सामने आई है जिसका शीर्षक मेज़ों पर पानी का राज़ है। इस कविता में गरीब देश की ऊँची कुर्सी और अफसरशाही के अंदाज़ पर बात की गई है।

  • गरीब देश की ऊँची कुर्सी और अफसरशाही का अंदाज़ दर्शाया गया है।
  • जनता प्यासी और सूखे हलक है जबकि मेज़ों पर पानी का राज़ है।
  • 500 रूपये लीटर की चर्चा और बोतलों के सम्मान का ज़िक्र किया गया है।

मेज़ों पर पानी का राज़ और ज़मीनी हालात

AtalHind की हर खबर सबसे पहलेJoin Channel

कवि ने बताया है कि कहीं नलों में पानी गायब है। कहीं खेत-खलिहान सूखे हुए हैं। कहीं घड़ों में दरारें पड़ती हैं। लेकिन दूसरी तरफ बोतलों का सम्मान किया जाता है।

इस देश में 500 रूपये लीटर की चर्चा है और बोतल की कीमत आसमान छू रही है। इस देश में हर बूँद की कीमत बहुत अधिक है और जलपान इतना महँगा है। चुनावों की बड़ी-बड़ी बैठकें होती हैं और लोकतंत्र का भारी काम चलता है। जनता के विश्वास की खातिर हर दिन एक नया पैगाम दिया जाता है।

पारदर्शिता और जनता का हिसाब

ना किसी के जल का विरोध है और ना ही किसी सुविधा से कोई बैर है। माँग सिर्फ इतनी है कि जनता के धन का हिसाब हो और पारदर्शिता की पूरी खैर हो। कुर्सी चाहे जितनी ऊँची हो, लेकिन जनता से ऊँचा कोई नहीं हो सकता है। जहाँ सेवा-संकल्प जीवित हो, वहाँ दिखावे की कोई जगह नहीं होती है।

चाहे 500 लीटर की बात हो या पाँच बोतल की, यदि प्रश्न उठे तो उसका जवाब भी देना चाहिए। जनता के विश्वास की खातिर हर खर्च का पूरा हिसाब देना चाहिए। लोकतंत्र की यही पुकार है कि जनता ही असली सरकार है। पानी की हरेक बूँद बचाने में ही देश का सच्चा संस्कार छिपा है।

रचनाकार का विवरण

यह कविता संजय एम. तराणेकर द्वारा लिखी गई है जो कि कवि, लेखक व समीक्षक हैं। वे इन्दौर-452011, मध्यप्रदेश के निवासी हैं। उनका संपर्क नंबर 98260 25986 है और स्वरदूत के माध्यम से यह जानकारी दी गई है।

Share:

Comments

Leave a comment