कविता: माँ को कुर्सी दे दो, उम्र की ढलती शाम में मिले सम्मान और मुस्कान

कविता: माँ को कुर्सी दे दो, उम्र की ढलती शाम में मिले सम्मान और मुस्कान

इन्दौर के कवि, लेखक व समीक्षक संजय एम. तराणेकर की एक विशेष कविता सामने आई है जिसका शीर्षक माँ को कुर्सी दे दो है। इस कविता के माध्यम सेबुज़ुर्ग माँ के सम्मान और उनकी शारीरिक स्थिति को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।

कविता के अनुसारमाँ को कुर्सी दे दो, जिससे इतना तो सम्मान रहे। उम्र की ढलती शाम में चेहरे पर मुस्कान रहे। राजनीति अपने स्थान पर है और मतभेदों में बात चलती रहे। माँ के सम्मान से ऊपर भला कौन सी सौगात हो सकती है?

मंच और सवाल

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मंच पर सवाल उठें और सरकारों से जवाब माँगे जाएँ। किसी बुज़ुर्ग माँ पर हँसी के तीर नहीं भागने चाहिए। भले ही वह मिमिक्री और हँसी-मजाक का मंच रहा हो, लेकिन सवाल यह रहता है कि क्या वह असम्मान का क्षण था?

कुर्सी और आसन

कुर्सी कोई सत्ता नहीं है और न ही कोई सिंहासन माँगा जा रहा है। हाँ, थकी हुई उम्र के आगे थोड़ा आसन माँगा जाता है। नेता आएँ और नेता जाएँ, राजनीति के रंग बदलें। लेकिन माँ के आँचल की गरिमा पर शब्द कैसे मचल सकते हैं?

मानवता और सम्मान

संसद की ऊँची बातें बाद में कह दी जानी चाहिए। माँ की झुकी उम्र पर ध्यान देकर उन्हें मान दे दिया जाना चाहिए। भाई, माँ को कुर्सी दे दो और माँ को सम्मान दे दो। राजनीति जितनी भी हो, मानवता को उसका स्थान मिलना चाहिए।

यह कविता संजय एम. तराणेकर, कवि, लेखक व समीक्षक, इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश) द्वारा लिखी गई है। इनका संपर्क मोबाइल नंबर 98260 25986 और स्वरदूत 98260-25986 है।

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