सृष्टि के पहले इंजीनियर भगवान विश्वकर्मा की जयंती, जानिए धार्मिक महत्व और इतिहास

सृष्टि के पहले इंजीनियर भगवान विश्वकर्मा की जयंती, जानिए धार्मिक महत्व और इतिहास

विश्वकर्मा पूजा भारत में मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है। इस दिन देश भर में स्थित कारखानों, कार्यशालाओं और विभिन्न कार्यस्थलों पर विशेष पूजा अर्चना की जाती है। ताकि श्रम और कौशल का सम्मान किया जा सके और आने वाले वर्ष के लिए आशीर्वाद प्राप्त हो सके। हर साल विश्वकर्मा पूजा कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है। इस दिन भगवान विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। इसलिए इसे विश्वकर्मा जयंती भी कहते हैं।

विश्वकर्मा पूजा एक ऐसा त्योहार है जहां शिल्पकार, कारीगर, श्रमिक भगवान विश्वकर्मा का त्योहार मनाते हैं। कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा के पुत्र विश्वकर्मा ने पूरे ब्रह्मांड का निर्माण किया था। विश्वकर्मा को देवताओं के महलों का वास्तुकार भी कहा जाता है। विश्वकर्मा दो शब्दों विश्व यानी संसार या ब्रह्मांड और कर्म यानी निर्माता से मिलकर बना है। इसलिए विश्वकर्मा शब्द का अर्थ है दुनिया का निर्माण करने वाला।

भगवान विश्वकर्मा को निर्माण एवं सृजन का देवता माना जाता है। हिंदू धर्म में इन्हें सृष्टि के दिव्य शिल्पकार, देवताओं के वास्तु विशेषज्ञ और पहले इंजीनियर के रूप में पूजा जाता है। विश्वकर्मा रचनात्मकता, तकनीकी कौशल और नवाचार के प्रतीक हैं। उनके सम्मान में भाद्रपद मास की सूर्यकन्या संक्रांति पर विश्वकर्मा जयंती मनाई जाती है। यह वह दिन है जब सूर्य सिंह राशि से कन्या राशि में प्रवेश करता है। इस दिन मजदूर, कारीगर, इंजीनियर, आर्किटेक्ट और उद्योगपति अपने औजारों और मशीनों की पूजा करते हैं।

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चार युगों में विश्वकर्मा जी ने कई नगर और भवनों का निर्माण किया था। विश्वकर्मा शिल्पशास्त्र के आविष्कारक और सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता माने जाते हैं। जिन्होंने विश्व के प्राचीनतम तकनीकी ग्रंथों की रचना की थी। इन ग्रंथों में न केवल भवन वास्तु विद्या, रथ आदि वाहनों के निर्माण बल्कि विभिन्न रत्नों के प्रभाव व उपयोग आदि का भी विवरण है। माना जाता है कि उन्होंने ही देवताओं के विमानों की रचना की थी।

भगवान विश्वकर्मा की उत्पत्ति ऋग्वेद में हुई है। जिसमें उन्हें ब्रह्मांड के निर्माता के रूप में वर्णित किया गया है। भगवान विष्णु और शिवलिंग की नाभि से उत्पन्न भगवान ब्रह्मा की अवधारणाएं विश्वकर्मण सूक्त पर आधारित हैं। विश्वकर्मा प्रकाश को वास्तुतंत्र का अपूर्व ग्रंथ माना जाता है। इसमें अनुपम वास्तुविद्या को गणितीय सूत्रों के आधार पर प्रमाणित किया गया है। ऐसा माना जाता है कि सभी पौराणिक संरचनाएं भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्मित हैं।

भगवान विश्वकर्मा के जन्म को देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन से माना जाता है। पौराणिक युग के अस्त्र और शस्त्र भगवान विश्वकर्मा द्वारा ही निर्मित हैं। विश्वकर्मा को सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी का वंशज माना गया है। ब्रह्माजी के पुत्र धर्म तथा धर्म के पुत्र वास्तु देव थे। जिन्हें शिल्पशास्त्र का आदि पुरुष माना जाता है। इन्हीं वास्तु देव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा का जन्म हुआ।

अपने पिता के पद चिन्हों पर चलते हुए विश्वकर्मा भी वास्तुकला के महान आचार्य बने। मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ इनके पुत्र हैं। इन पांचों पुत्रों को वास्तुशिल्प की अलग-अलग विधाओं में विशेषज्ञ माना जाता है। विश्वकर्मा वैदिक देवता के रूप में सर्वमान्य हैं। इनको गृहस्थ आश्रम के लिए आवश्यक सुविधाओं का निर्माता और प्रवर्तक भी कहा गया है।

अपने विशिष्ट ज्ञान-विज्ञान के कारण देवशिल्पी विश्वकर्मा मानव समुदाय ही नहीं वरन देवगणों द्वारा भी पूजित हैं। देवता, नर, असुर, यक्ष और गंधर्व सभी में उनके प्रति सम्मान का भाव है। भगवान विश्वकर्मा के पूजन-अर्चना किए बिना कोई भी तकनीकी कार्य शुभ नहीं माना जाता। इसी कारण विभिन्न कार्यों में प्रयुक्त होने वाले औजारों, कल-कारखानों और विभिन्न उद्योगों में लगी मशीनों का पूजन विश्वकर्मा जयंती पर किया जाता है।

पौराणिक साक्ष्यों के मुताबिक स्वर्ग लोक की इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, असुर राज रावण की स्वर्णनगरी लंका, भगवान श्रीकृष्ण की समुद्र नगरी द्वारिका और पांडवों की राजधानी हस्तिनापुर के निर्माण का श्रेय भी विश्वकर्मा को ही जाता है। पौराणिक कथाओं में इन उत्कृष्ट नगरियों के निर्माण के रोचक विवरण मिलते हैं। उड़ीसा का विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर तो विश्वकर्मा के शिल्प कौशल का अप्रतिम उदाहरण माना जाता है। विष्णु पुराण में उल्लेख है कि जगन्नाथ मंदिर की अनुपम शिल्प रचना से खुश होकर भगवान विष्णु ने उन्हें शिल्पावतार के रूप में सम्मानित किया था।

महाभारत में पांडव जहां रहते थे उस स्थान को इंद्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता था। इसका निर्माण भी विश्वकर्मा ने किया था। कौरव वंश के हस्तिनापुर और भगवान कृष्ण के द्वारका का निर्माण भी विश्वकर्मा ने ही किया था। सतयुग का स्वर्ग लोक, त्रेतायुग की लंका, द्वापर की द्वारिका और कलियुग के हस्तिनापुर आदि के रचयिता विश्वकर्मा जी की पूजा अत्यंत शुभकारी है। सृष्टि के प्रथम सूत्रधार, शिल्पकार और विश्व के पहले तकनीकी ग्रंथ के रचयिता भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं की रक्षा के लिए अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया था।

विष्णु को चक्र, शिव के त्रिशूल, इंद्र को वज्र, हनुमान को गदा और कुबेर को पुष्पक विमान विश्वकर्मा ने ही प्रदान किए थे। सीता स्वयंवर में जिस धनुष को श्रीराम ने तोड़ा था वह भी विश्वकर्मा के हाथों बना था। जिस रथ पर निर्भर रहकर श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन संसार को भस्म करने की शक्ति रखते थे उसके निर्माता विश्वकर्मा ही थे। पार्वती के विवाह के लिए जो मण्डप और वेदी बनाई गई थी वह भी विश्वकर्मा ने ही तैयार की थी।

माना जाता है कि विश्वकर्मा ने ही लंका का निर्माण किया था। इसके पीछे कहानी है कि शिव ने माता पार्वती के लिए एक महल का निर्माण करने के लिए भगवान विश्वकर्मा को कहा तो विश्वकर्मा ने सोने का महल बना दिया। इस महल के पूजन के दौरान भगवान शिव ने राजा रावण को आमंत्रित किया। रावण महल को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया और जब भगवान शिव ने उससे दक्षिणा में कुछ देने को कहा तथा उसने महल ही मांग लिया। भगवान शिव ने उसे महल देकर वापस पर्वतों पर चले गए।

विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए उड़ने वाले रथों का निर्माण किया था। विश्वकर्मा ने देवताओं के राजा इंद्र का हथियार वज्र का निर्माण किया था। वज्र को ऋषि दधीचि और अज्ञेयस्त्र की हड्डियों से बनाया गया है। भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र उनकी शक्तिशाली रचनाओं में से एक था।

विश्वकर्मा जयंती का औद्योगिक जगत और भारतीय कलाकारों, मजदूरों, इंजीनियर्स आदि के लिए खास महत्व है। विश्वकर्मा जयंती भारत के जम्मू कश्मीर, पंजाब, हिमाचल, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा, त्रिपुरा, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में मनाई जाती है। नेपाल में भी विश्वकर्मा पूजा को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। विश्वकर्मा के पूजन और उनके बताए वास्तुशास्त्र के नियमों का अनुपालन कर बनवाए गए मकान और दुकान शुभ फल देने वाले माने जाते हैं। इनमें कोई वास्तुदोष नहीं माना जाता।

औद्योगिक श्रमिकों द्वारा इस दिन बेहतर भविष्य, सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों और अपने-अपने क्षेत्र में सफलता के लिए प्रार्थना की जाती हैं। विश्वकर्मा जयंती के दिन देश के कई हिस्सों में काम बंद रखा जाता है और खूब पतंगबाजी की जाती है। विभिन्न प्रदेशों की सरकार विश्वकर्मा जयंती पर अपने कर्मचारियों को सावेतनिक अवकाश प्रदान करती है। यह त्योहार मुख्य रूप से दुकानों, कारखानों और उद्योगों द्वारा मनाया जाता है। इस अवसर पर, कारखानों और औद्योगिक क्षेत्रों के श्रमिक अपने औजारों की पूजा करते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 सितंबर 2023 को प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना प्रारम्भ की थी। जिसमें अपने हाथों और औजारों से काम करने वाले कारीगरों और शिल्पकारों को संपूर्ण सहायता प्रदान की जाती है। इस योजना में 18 व्यवसायों में लगे कारीगर और शिल्पकार शामिल हैं। पीएम विश्वकर्मा योजना में पीएम विश्वकर्मा प्रमाणपत्र और पहचान पत्र के माध्यम से मान्यता, कौशल सत्यापन के माध्यम से कौशल उन्नयन, बुनियादी कौशल, उन्नत कौशल प्रशिक्षण, उद्यमशीलता ज्ञान, 15,000 रुपये तक के टूलकिट प्रोत्साहन, तीन लाख रुपये तक की ऋण सहायता दी जाती है।

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