बेटी होने की सज़ा क्यों: संजय एम तराणेकर की कविता और हाई कोर्ट की टिप्पणी

बेटी होने की सज़ा क्यों? आज़ादी को गुज़रे दशकों का लंबा दौर हो चुका है। इसके बावजूद बेटी के जन्म पर क्यों मन में कोई शोर होता है? बेटे की चाहत में बेटी को क्यों बोझ समझ लिया जाता है? ममतामई कोख से कली को क्यों मिटाया जाता है?
जिस घर में बेटी जन्मे, वहाँ खुशियों के दीप जलें। वह आँगन हँसी से महके और सपनों को पंख मिलें। बेटा या बेटी दोनों जीवन की अनमोल सौगात हैं। फिर क्यों लिंग के तराजू पर बात को तौला जाता है?
एक बेटी सिर्फ बेटी नहीं होती है, वह कल की माँ भी होती है। वह किसी घर की रोशनी और दूसरे घरों की शान भी होती है। दुर्भाग्य ये नहीं है कि लोग आज भी बेटा चाहते हैं। दुर्भाग्य ये है कि कुछ लोग बेटी को जीने नहीं देते हैं।
आइए अपनी सोच को बदलें और उन बेटियों को अधिकार मिले। जिस धरती पर बेटी जन्मी, उस धरती पर उसे संसार मिले। हर एक बेटी को स्नेह व सम्मान का आधार मिले। नवयुग में बेटी को पाकर परिवार में चेहरे खिलें।
संदर्भ - हाई कोर्ट: यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी लोग बेटा ही चाहते हैं। यह कविता संजय एम तराणेकर, कवि, लेखक व समीक्षक, इन्दौर-452011, मध्य प्रदेश द्वारा लिखी गई है। संपर्क मो. 98260 25986 है। स्वरदूत 98260-25986 पर संपर्क किया जा सकता है।