राजनेता को राजनीति करने दो, तुम बस पत्रकारिता करो

ये भीड़ है साहब, भेड़ नहीं: पत्रकारिता और सत्ता पर तीखा व्यंग्य
राजनेता को राजनीति करने दो, तुम बस पत्रकारिता करो
| पक्ष / विषय | मुख्य विचार व संदेश |
|---|---|
| पत्रकार का असली धर्म | सत्ता से सवाल पूछना, प्रेस नोट की जगह धरातल की सच्चाई और जनता की समस्याएं सामने लाना। |
| आज की पत्रकारिता | नेताओं के साथ फोटो, इंटरव्यू और विज्ञापनों तक सीमित होकर सत्ता के इर्द-गिर्द घूमना। |
| जनता की स्थिति | महंगाई, बेरोजगारी और महंगे इलाज से त्रस्त; झूठे आश्वासनों के बीच अपने हक का इंतजार करना। |
| लोकतंत्र का संदेश | जनता भेड़ नहीं, भीड़ है; उसकी चुपचाप सहने की शक्ति टूटने पर वह वोट से पूरा हिसाब करती है। |
व्यंग्य — राजेन्द्र सिंह जादौन
भारत के रहने वाला हूं, भारत की बात बताता हूं। राजनीति और पत्रकारिता का कोई मेल नहीं है। एक जनप्रतिनिधि है तो दूसरा जनसेवक। एक जनता का प्रतिनिधित्व करता है तो दूसरा कलम के माध्यम से जनता की आवाज को बुलंद करके जनसेवा करता है। दोनों की भूमिका अलग है, जिम्मेदारी अलग है और रास्ता भी अलग होना चाहिए। मगर आज हालात ऐसे हैं कि दोनों के बीच की दूरी लगातार खत्म होती जा रही है। कई बार समझना मुश्किल हो जाता है कि सामने राजनेता है या पत्रकार और पत्रकार है या राजनेता।
एक दौर था जब अखबार के दफ्तर के बाहर बड़े-बड़े राजनेता संपादक से मिलने का जुगाड़ ढूंढते थे। संपादक के कमरे में प्रवेश मिल जाना ही बड़ी बात होती थी। नेता जानते थे कि अगर अखबार ने सवाल पूछ लिया तो जवाब देना पड़ेगा और अगर खबर छप गई तो जनता तक बात पहुंच जाएगी। पत्रकार के पास न सरकारी बंगला था, न बड़ी गाड़ी, न सुरक्षा का काफिला, लेकिन उसकी कलम में इतनी ताकत थी कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोग अखबार की सुर्खियां देखकर बेचैन हो जाते थे। आज तस्वीर बदल गई है। अब पत्रकार नेता जी का इंटरव्यू करने के लिए जुगाड़ ढूंढ रहा है। कौन नेता किस पत्रकार को समय देगा, कौन पत्रकार मंच पर आगे बैठेगा, किसे फोटो मिलेगी और किसे बयान मिलेगा, यह भी पत्रकारिता की उपलब्धि माना जाने लगा है। कभी सत्ता खबर से डरती थी, आज कई जगह खबर सत्ता के दरवाजे पर खड़ी होकर अनुमति मांगती नजर आती है।
सवाल यह नहीं है कि पत्रकार नेता से क्यों मिलता है। सवाल यह है कि मिलने के बाद पूछता क्या है। सवाल यह नहीं है कि पत्रकार सरकारी कार्यक्रम में क्यों जाता है। सवाल यह है कि वहां से जनता के सवाल लेकर लौटता है या सिर्फ नेता के साथ तस्वीर लेकर। पत्रकारिता सत्ता की दुश्मनी नहीं है, लेकिन सत्ता की दोस्ती भी नहीं है। पत्रकारिता का धर्म सत्ता से सवाल करना है। सरकार अच्छा काम करे तो उसकी खबर लिखना पत्रकारिता है और सरकार गलत करे तो उसकी गलती सामने रखना भी पत्रकारिता है। किसी राजनीतिक दल का विरोध पत्रकारिता नहीं और किसी दल की प्रशंसा भी पत्रकारिता नहीं। पत्रकारिता का असली अर्थ है जनता के सवाल को सत्ता तक पहुंचाना और सत्ता के जवाब को जनता तक पहुंचाना।
लेकिन आज पत्रकारिता भी अजीब दौर से गुजर रही है। प्रेस नोट को खबर समझ लिया गया है, बयान को उपलब्धि और फोटो को पत्रकारिता। सवाल पूछने वाला पत्रकार कई बार परेशानी पैदा करने वाला माना जाता है और हर बात पर तालियां बजाने वाला पत्रकार व्यवस्था का पसंदीदा। पत्रकार अगर सत्ता से सवाल करे तो उसके रिश्ते खराब हो सकते हैं, विज्ञापन प्रभावित हो सकता है, निमंत्रण कम हो सकते हैं और पहुंच सीमित हो सकती है। लेकिन पत्रकार अगर सवाल छोड़ देगा तो फिर जनता की आवाज कौन उठाएगा?
जनता को भी वर्षों से भेड़ समझने की कोशिश की जा रही है। कभी जाति के नाम पर हांका गया, कभी धर्म के नाम पर, कभी राष्ट्रवाद के नाम पर, कभी विकास के नाम पर और कभी मुफ्त की योजनाओं के नाम पर। जनता भी उम्मीद में चलती रही। जहां रोशनी दिखाई दी, उसी तरफ बढ़ती गई। क्योंकि जनता को हमेशा उम्मीद चाहिए। उसे लगता है कि शायद इस बार कुछ बदलेगा। 2014 में भी देश की जनता ने बड़ी उम्मीद के साथ सत्ता परिवर्तन किया था। प्रचंड बहुमत दिया। उम्मीद थी कि महंगाई कम होगी, रोजगार आएगा, भ्रष्टाचार कम होगा, किसान मजबूत होगा, गरीब का जीवन आसान होगा और व्यवस्था आम आदमी के दरवाजे तक पहुंचेगी। जनता ने ताली भी बजाई, थाली भी बजाई और जरूरत पड़ी तो दिया भी जलाया। लेकिन सवाल यह है कि जनता की उम्मीद अब सिर्फ थाली, ताली और दिया जलाने तक सीमित रह गई है क्या?
साहब, दिया जलाने के लिए तेल चाहिए और सरकार को दिए में तेल चाहिए, वह भी उसी जनता से जिसका अपना तेल निकला जा रहा है। आम आदमी बाजार में जाता है तो पहले जेब देखता है और फिर सामान। घर का बजट ऐसा हो गया है कि महीने की पहली तारीख को वेतन आता है और कुछ ही दिनों में उसका अंतिम संस्कार हो जाता है। कोई झालमुड़ी खाकर गुजारा कर रहा है, कोई बच्चों को मेलोडी खिलाकर समझा रहा है कि बेटा, चॉकलेट भी पेट को बहलाने का एक तरीका है। रसोई में महंगाई का हिसाब है और भाषणों में विकास का। आदमी पूछ रहा है कि पेट्रोल महंगा क्यों है, गैस महंगी क्यों है, सब्जी महंगी क्यों है, फीस महंगी क्यों है और इलाज महंगा क्यों है, लेकिन उसे जवाब में बड़े-बड़े सपने दिखाए जाते हैं। देश आगे बढ़ रहा होगा साहब, लेकिन घर का आदमी पीछे क्यों छूट रहा है, यह सवाल कोई तो पूछे।
और यही सवाल पत्रकार को पूछना है। लेकिन पत्रकार भी अब कई जगह उसी व्यवस्था के आसपास घूमता दिखाई देता है। जनता पत्रकार से उम्मीद करती है कि वह उसकी आवाज बनेगा, पत्रकार विज्ञापनदाता की तरफ देखता है, विज्ञापनदाता सत्ता की तरफ देखता है और सत्ता पत्रकार की तरफ। इस गोल चक्कर में जनता फिर वहीं खड़ी रह जाती है जहां से उसने शुरुआत की थी।
राजनीति कुछ लोगों के लिए ससुराल जैसी हो गई है। ससुराल जाएंगे तो खाली हाथ थोड़ी लौटेंगे। कहीं सूटकेस, कहीं बैग, कहीं लिफाफा और कहीं हर महीने की व्यवस्था। जनसेवा के इस नए मॉडल पर जनता मुस्कुराती नहीं, बस चुप रहती है। लेकिन उसकी चुप्पी को सहमति समझ लेना सबसे बड़ी भूल है।
एक दौर था जब रेलवे स्टेशन पर अखबार का बंडल आता था और लोग लाइन लगाकर अखबार खरीदते थे। अखबार हाथ में आते ही ऐसा लगता था जैसे बंदूक का लाइसेंस मिल गया हो। खबर पढ़कर लोग चर्चा करते थे, सवाल करते थे और सत्ता को जवाब देना पड़ता था। संपादकीय पढ़े जाते थे और खबरें अधिकारियों की नींद खराब करती थीं। आज कई जगह अखबार में यह ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि किस नेता का फोटो कितना बड़ा है और किस कार्यक्रम में कौन बैठा था। जनता की समस्या छोटी और नेता का फोटो बड़ा होता जा रहा है। साहब, जनता को फोटो नहीं चाहिए, उसे जवाब चाहिए।
वह पूछना चाहती है कि उसके गांव की सड़क कब बनेगी। उसका बच्चा स्कूल में शिक्षक के बिना क्यों पढ़ रहा है। अस्पताल में डॉक्टर क्यों नहीं है। युवा रोजगार के लिए शहरों में क्यों भटक रहा है। किसान अपनी फसल का दाम पाने के लिए परेशान क्यों है। गरीब सरकारी योजना के लिए दफ्तरों के चक्कर क्यों लगा रहा है। और पत्रकार का काम है इन सवालों को सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाना।
राजनेता को राजनीति करने दीजिए। उसका काम चुनाव लड़ना है, वोट मांगना है, सरकार बनाना है, घोषणा करना है और जनता को जवाब देना है। पत्रकार का काम है घोषणा का हिसाब पूछना। नेता कहे सड़क बन गई तो पत्रकार सड़क पर जाए। नेता कहे अस्पताल बेहतर हो गया तो पत्रकार अस्पताल पहुंचे। नेता कहे किसान खुशहाल है तो पत्रकार खेत में जाए। नेता कहे बेरोजगारी कम हुई तो पत्रकार बेरोजगार युवा के घर पहुंचे। यही पत्रकारिता है।
पत्रकार अगर नेता की भाषा बोलने लगेगा तो जनता की भाषा कौन बोलेगा। पत्रकार अगर सत्ता का प्रवक्ता बन जाएगा तो जनता का प्रहरी कौन रहेगा। पत्रकार अगर सवाल पूछने से पहले यह सोचेगा कि सामने वाला नाराज हो जाएगा तो फिर कलम का मतलब ही क्या रह जाएगा।
पत्रकारिता का मतलब हर सरकार को गलत कहना नहीं है। पत्रकारिता का मतलब हर नेता को भ्रष्ट कहना भी नहीं है। पत्रकारिता का मतलब सिर्फ इतना है कि किसी को भी सवालों से ऊपर मत मानिए। सत्ता में जो है उससे सवाल होगा, विपक्ष में जो है उससे भी सवाल होगा, अधिकारी से भी सवाल होगा और जरूरत पड़ी तो पत्रकार से भी सवाल होगा। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार सिर्फ पत्रकार को नहीं, जनता को भी है।
जनता भेड़ नहीं है। वह चुप है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह समझती नहीं। वह ताली बजाती है तो इसका मतलब यह नहीं कि हर बात से सहमत है। वह वोट देती है तो इसका अर्थ यह नहीं कि पांच साल के लिए सवाल पूछने का अधिकार भी दे दिया। जनता पांच साल देखती है, सुनती है, सहती है और फिर एक दिन उसकी उंगली बोलती है।
इसलिए साहब, भीड़ को भेड़ मत समझिए। यह वही जनता है जो किसी को सिर पर बैठाती है और समय आने पर जमीन भी दिखा देती है। लोकतंत्र में आखिरी फैसला न नेता का होता है, न पत्रकार का। आखिरी फैसला जनता का होता है।
और पत्रकारों से भी एक सवाल है। हम आखिर किसके लिए लिख रहे हैं? उस नेता के लिए जिसने मंच पर जगह दी, उस अधिकारी के लिए जिसने चाय पिलाई, उस विज्ञापनदाता के लिए जिसने बिल दिया या उस जनता के लिए जिसने अखबार खरीदकर हमारी पत्रकारिता को जिंदा रखा? जवाब बहुत कठिन नहीं है। पत्रकारिता जनता के लिए है। जिस दिन जनता ने अखबार पर भरोसा करना बंद कर दिया, उस दिन अखबार के पास सिर्फ कागज बचेगा और पत्रकार के पास सिर्फ प्रेस कार्ड।
कैमरा कोई भी खरीद सकता है। माइक कोई भी पकड़ सकता है। प्रेस कार्ड कोई भी बनवा सकता है। लेकिन सवाल पूछने की हिम्मत खरीदी नहीं जा सकती। वह पत्रकार के भीतर होती है। वही तय करती है कि वह खबर लिखेगा या प्रेस नोट, जनता की आवाज बनेगा या सत्ता का प्रवक्ता, सवाल करेगा या सिर्फ सलाम।
इसलिए राजनेता को राजनीति करने दो और पत्रकार को पत्रकारिता। नेता अगर पत्रकार बन जाएगा तो सवाल कौन पूछेगा और पत्रकार अगर नेता बन गया तो जनता की खबर कौन लिखेगा?
याद रखिए साहब, यह भीड़ है, भेड़ नहीं। इसे डंडे से हांका नहीं जा सकता। इसे सिर्फ उम्मीद से जोड़ा जा सकता है और सवालों से जगाया जा सकता है। जनता जब तक उम्मीद करती है तब तक ताली बजाती है, जब उम्मीद टूटती है तो सवाल करती है और जब सवालों का जवाब नहीं मिलता तो फिर वह फैसला करती है।
इसलिए सत्ता भी सावधान रहे, पत्रकार भी सावधान रहे और जनता भी जागती रहे। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत कुर्सी पर बैठे व्यक्ति में नहीं, उस आम आदमी में है जिसके हाथ में वोट है और उस पत्रकार की कलम में है जो उसके सवाल को आवाज देता है।
ये भीड़ है साहब, भेड़ नहीं। इसे हांका नहीं जा सकता, इसे सिर्फ समझा जा सकता है। और जिस दिन यह समझ गई कि उसके साथ क्या हो रहा है, उस दिन वह सिर्फ सवाल नहीं करेगी पूरा हिसाब करेगी।