विश्व शाकाहार दिवस विशेष: शाकाहार केवल भोजन की थाली का परिवर्तन नहीं बल्कि मन और जीवन का परिवर्तन है

विश्व शाकाहार दिवस विशेष: शाकाहार केवल भोजन की थाली का परिवर्तन नहीं बल्कि मन और जीवन का परिवर्तन है

विश्व शाकाहार दिवस-

शाकाहार : केवल भोजन की थाली का परिवर्तन नहीं, मन का परिवर्तन है, , ,

एक अक्टूबर को पूरे विश्व में विश्व शाकाहारी दिवस मनाया जाता है। यह दिवस केवल खान पान की पसंद का दिवस नहीं है, यह जीवन के प्रति दृष्टिकोण का दिवस है। यह हमें स्मरण कराता है कि भोजन केवल पेट भरने की क्रिया नहीं, यह हमारे विचार, हमारे संस्कार, हमारे स्वास्थ्य और हमारी धरती के भविष्य से जुड़ा हुआ निर्णय है। शाकाहार भारत की आत्मा है। हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही कहा था , अहिंसा परमो धर्मः। जीवों के प्रति दया, करुणा और मैत्री का भाव ही भारतीय संस्कृति का मूल है।

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जब विश्व में अन्य सभ्यताएँ आखेट पर निर्भर थीं, तब भारत में ऋषि आश्रमों में कंद मूल फल और अन्न पर जीवन जीने की परंपरा विकसित हो चुकी थी। आज जब पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, रोगों की बढ़ोतरी और पर्यावरण संकट से जूझ रहा है, तब शाकाहार एक बार फिर वैश्विक समाधान के रूप में उभर रहा है। विश्व शाकाहारी दिवस की शुरुआत वर्ष उन्नीस सौ सतहत्तर में उत्तरी अमेरिका के शाकाहारी समाज ने की थी। इसका उद्देश्य था कि लोगों को शाकाहार के लाभों के बारे में बताया जाए और उन्हें प्रेरित किया जाए कि वे कम से कम एक दिन के लिए शाकाहार अपनाकर देखें।

वर्ष उन्नीस सौ अठहत्तर में अंतर्राष्ट्रीय शाकाहारी संघ ने इसे वैश्विक स्तर पर मान्यता दी। धीरे धीरे यह एक अक्टूबर से पूरे अक्टूबर माह को शाकाहारी जागरूकता माह के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिवस को चुनने के पीछे एक और भाव है। अक्टूबर माह में महात्मा गांधी का जन्म दिवस भी आता है। गांधी जी विश्व में शाकाहार और अहिंसा के सबसे बड़े प्रतीक थे। उन्होंने कहा था कि किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से आंका जा सकता है कि वह पशुओं के साथ कैसा व्यवहार करता है। भारत में शाकाहार केवल भोजन नहीं, दर्शन है। वैदिक काल से ही हमारे यहाँ अन्न को ब्रह्म कहा गया है।

उपनिषद कहते हैं , अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। अर्थात अन्न ही ब्रह्म है। जब अन्न ब्रह्म है तो उसे शुद्ध, सात्विक और हिंसा रहित होना ही चाहिए। जैन दर्शन में तो अहिंसा का सबसे सूक्ष्म विवेचन है। जैन मुनि चलते समय भी धरती पर जीव न मर जाए, इसका ध्यान रखते हैं। भोजन में तो हिंसा का प्रश्न ही नहीं उठता। वे कंद मूल भी नहीं खाते क्योंकि उसमें पौधे की पूरी जीवन लीला समाप्त हो जाती है। बौद्ध धर्म ने भी करुणा और मैत्री का संदेश दिया। सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद अहिंसा का मार्ग अपनाया और पशु वध पर रोक लगाई। उसके शिलालेख आज भी पशु रक्षा का संदेश देते हैं। आयुर्वेद में भोजन को औषधि माना गया है।

आयुर्वेद कहता है कि भोजन सात्विक होना चाहिए। सात्विक भोजन वह है जो मन को शांत, बुद्धि को निर्मल और शरीर को निरोग रखे। मांसाहार को आयुर्वेद में तामसिक और राजसिक भोजन की श्रेणी में रखा गया है जो मन में चंचलता, क्रोध और आलस्य बढ़ाता है। भक्ति आंदोलन के संतों ने भी शाकाहार को अपनाया। कबीर, सूर, तुलसी, मीरा, नानक सभी ने निरामिष भोजन का समर्थन किया। गुरु नानक देव जी ने कहा ,जो प्राणी दूसरे प्राणी को मारकर खाता है, वह कभी सुखी नहीं रह सकता। आधुनिक विज्ञान ने भी शाकाहार के लाभों को प्रमाणित किया है।

पहला लाभ है हृदय स्वास्थ्य। शाकाहारी भोजन में रेशा अधिक होता है और हानिकारक वसा कम। इससे रक्त में कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रहता है और हृदय रोग का खतरा कम होता है। शोध बताते हैं कि शाकाहारी लोगों में हृदयाघात की संभावना तीस प्रतिशत तक कम होती है।

दूसरा लाभ है मधुमेह पर नियंत्रण। शाकाहारी भोजन में जटिल कार्बोहाइड्रेट और रेशा होता है जो रक्त शर्करा को धीरे धीरे बढ़ाता है। इससे मधुमेह का खतरा कम होता है और मधुमेह रोगियों में नियंत्रण बेहतर रहता है।

तीसरा लाभ है पाचन तंत्र का स्वास्थ्य। अन्न, फल, सब्जी और दालों में पर्याप्त रेशा होता है जो आंतों को स्वच्छ रखता है। इससे कब्ज, अम्लता और बड़ी आंत के रोगों से बचाव होता है।

चौथा लाभ है शरीर का भार नियंत्रण। शाकाहारी भोजन में कैलोरी कम होती है और पोषक तत्व अधिक। इससे मोटापा नहीं बढ़ता और शरीर हल्का फुल्का रहता है।

पांचवा लाभ है दीर्घायु। कई वैश्विक शोधों में यह पाया गया है कि शाकाहारी लोग औसतन मांसाहारी लोगों की तुलना में अधिक वर्ष जीते हैं। जापान के ओकिनावा द्वीप के लोग, जो मुख्यतः शाकाहारी भोजन करते हैं, विश्व में सबसे अधिक आयु जीते हैं।

छठा लाभ है मानसिक स्वास्थ्य। सात्विक भोजन मन को शांत रखता है। जो लोग शाकाहार अपनाते हैं, उनमें चिंता, अवसाद और क्रोध की मात्रा कम पाई गई है। योग शास्त्र में भी कहा गया है कि जैसा अन्न वैसा मन। आज धरती के सामने सबसे बड़ा संकट जलवायु परिवर्तन है और इसमें पशु आधारित उद्योग का बहुत बड़ा योगदान है। एक किलो मांस उत्पन्न करने के लिए हजारों लीटर जल चाहिए, जबकि एक किलो गेहूं या दाल के लिए उसका दसवां भाग ही पर्याप्त है।

विश्व में कृषि योग्य भूमि का सत्तर प्रतिशत से अधिक भाग केवल पशुओं के चारे के लिए प्रयोग होता है। यदि वही भूमि सीधे अन्न उत्पादन के लिए प्रयोग हो तो विश्व से भूख समाप्त हो सकती है।पशु पालन से मीथेन नामक गैस निकलती है जो कार्बन डाई ऑक्साइड से बीस गुना अधिक हानिकारक है और धरती को गरम करती है। वनों को काटकर चारागाह बनाए जा रहे हैं जिससे जैव विविधता नष्ट हो रही है।

शाकाहार अपनाकर हम एक व्यक्ति एक वर्ष में लगभग डेढ़ टन कार्बन उत्सर्जन कम कर सकता है। यह धरती की रक्षा के लिए सबसे बड़ा व्यक्तिगत योगदान है। इसलिए पर्यावरणविद कहते हैं कि यदि धरती बचानी है तो थाली बदलनी होगी। भारत विश्व में दाल, सब्जी और फल उत्पादन में अग्रणी है। शाकाहार को बढ़ावा देने से किसानों को लाभ होता है। विविध फसलों की खेती से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है।

आज विश्व में शाकाहारी उत्पादों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। पौधों से बना दूध, सोया से बने खाद्य पदार्थ, कटहल से बना मांस विकल्प, इनकी मांग यूरोप और अमेरिका में बहुत बढ़ रही है। भारत इस क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व कर सकता है। कई लोग सोचते हैं कि शाकाहार में प्रोटीन की कमी होती है। यह पूरी तरह भ्रम है। दालें, चना, राजमा, सोयाबीन, मूंगफली, दूध, दही, पनीर में भरपूर प्रोटीन होता है। एक कटोरी दाल में उतना ही प्रोटीन होता है जितना एक अंडे में। दूसरा भ्रम है कि शाकाहारी लोग कमजोर होते हैं। भारत के महान पहलवान, सैनिक, योगी सभी शाकाहारी रहे हैं।

महाबली भीम शाकाहारी थे, हनुमान जी शाकाहारी थे। शक्ति भोजन से नहीं, संयम और अभ्यास से आती है। तीसरा भ्रम है कि शाकाहार में स्वाद नहीं। भारत में शाकाहारी व्यंजनों की इतनी विविधता है कि विश्व में कहीं नहीं। कश्मीर का दम आलू, पंजाब की सरसों का साग, राजस्थान का दाल बाटी, गुजरात का ढोकला, बंगाल का रसगुल्ला, दक्षिण का सांभर डोसा, अवध की बिरयानी का शाकाहारी रूप, स्वाद का अथाह सागर है।

विश्व शाकाहारी दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम अपने भोजन पर पुनर्विचार करें। शाकाहार केवल भोजन की थाली का परिवर्तन नहीं, यह मन का परिवर्तन है। यह हमें सिखाता है कि हम धरती पर अकेले नहीं हैं, सभी जीवों को जीने का अधिकार है। जब हम किसी पशु के प्रति करुणा दिखाते हैं तो हम अपने भीतर की मनुष्यता को जगाते हैं। जब हम शाकाहार अपनाते हैं तो हम अपने स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं, किसान की आय बढ़ाते हैं और धरती को बचाते हैं। इसलिए इस एक अक्टूबर को संकल्प लें कि हम सप्ताह में कम से कम दो दिन पूर्ण शाकाहार अपनाएंगे, बच्चों को जीव दया का पाठ पढ़ाएंगे और अन्न का सम्मान करेंगे। क्योंकि भूख मिटाना पुण्य है, परंतु जीव की रक्षा करके भूख मिटाना महापुण्य है।

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