वन्यजीव सप्ताह : संकल्प लें कि हम किसी भी वन्यजीव को हानि नहीं पहुँचाएंगे

वन्यजीव सप्ताह : संकल्प लें कि हम किसी भी वन्यजीव को हानि नहीं पहुँचाएंगे

वन्यजीव सप्ताह के अवसर पर यह संकल्प लेना अत्यंत आवश्यक है कि हम किसी भी वन्यजीव को हानि नहीं पहुँचाएंगे। इस आलेख में सुनील कुमार वाजपेयी शिवम ने वन्यजीव संरक्षण के महत्व, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान संकटों पर विस्तार से प्रकाश डाला है।

वन्यजीव सप्ताह और हमारी संस्कृति

दो अक्टूबर से आठ अक्टूबर तक पूरे देश में वन्यजीव सप्ताह मनाया जाता है। यह सप्ताह हमें प्रकृति की ओर लौटने का संदेश देता है। हमारे वेदों में कहा गया है कि ईशा वास्यमिदं सर्वम्। अर्थात इस जगत में जो कुछ भी है, उसमें ईश्वर का वास है। केवल मनुष्य में ही नहीं, पशु पक्षी, वृक्ष लता, नदी पर्वत सभी में ईश्वर है। इसलिए भारतीय संस्कृति में वन्यजीवों को केवल जीव नहीं, देवता माना गया है। गणेश जी का वाहन चूहा, शिव का नंदी, दुर्गा का सिंह, सरस्वती का हंस, लक्ष्मी का उल्लू, विष्णु का गरुड़ होना यह बताता है कि हमारे देवी देवता भी बिना वन्यजीव के अधूरे हैं। यह दर्शाता है कि मनुष्य और वन्यजीव एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं है। परंतु आज मनुष्य ने विकास के नाम पर वन्यजीवों का अस्तित्व संकट में डाल दिया है। इसलिए वन्यजीव सप्ताह का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।

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वन्यजीव संरक्षण का इतिहास और परंपरा

वन्यजीव सप्ताह मनाने की परंपरा वर्ष 1952 में शुरू हुई थी। तब भारतीय वन्यजीव परिषद ने निर्णय लिया था कि वन्यजीवों की रक्षा के लिए जन जागरूकता आवश्यक है। पहले यह केवल एक दिन मनाया जाता था, परंतु बाद में इसे एक सप्ताह तक मनाया जाने लगा। इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि देश के हर नागरिक को वन्यजीव संरक्षण का महत्व समझाया जाए। भारत में वन्यजीव संरक्षण कोई नई बात नहीं है। यह हमारी परंपरा में पूरी तरह से रचा बसा हुआ है। बिश्नोई समाज के लोग आज भी वृक्ष और हिरण की रक्षा के लिए अपने प्राण तक दे देते हैं। जोधपुर की घटना पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है जब खेजड़ली गाँव में तीन सौ तिरसठ बिश्नोई स्त्री पुरुषों ने खेजड़ी के वृक्षों को बचाने के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी थी। उनकी नेता अमृता देवी का यह कथन आज भी पूरी तरह से अमर है कि सिर साँटे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण। प्राचीन काल में महान सम्राट अशोक ने अपने शिलालेखों पर वन्यजीव हत्या पर पूरी रोक लगाई थी। उन्होंने अपने शिलालेखों पर लिखा था कि मैंने कई पशु पक्षियों की हत्या बंद करा दी है। राजस्थान में तालछापर, भरतपुर में केवलादेव और गुजरात में गिर जैसे स्थान इसलिए आज सुरक्षित बचे हैं क्योंकि वहाँ के पुराने शासकों ने वन्यजीवों के शिकार पर पूरी रोक लगाई थी। पंचतंत्र की कहानियाँ और जातक कथाएँ सभी में पशु पक्षियों को मनुष्य के समान बुद्धिमान और दयालु रूप में दिखाया गया है। यह हमें यह सिखाता है कि वन्यजीव भी हमारे समाज का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

वन्यजीवों का वैज्ञानिक और पारिस्थितिक महत्व

वन्यजीवों का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक भी होता है। प्रत्येक जीव हमारे पर्यावरण संतुलन में एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शेर हिरण को अपना भोजन बनाता है, हिरण ताजी घास खाता है, और घास मिट्टी को मजबूती से बाँधती है। यदि इस चक्र की एक भी कड़ी टूट जाती है तो पूरा पारिस्थितिक चक्र बिगड़ जाता है। गिद्ध मरे हुए पशुओं को खाकर हमारे पर्यावरण को पूरी तरह स्वच्छ रखते हैं। यदि इस दुनिया में गिद्ध न रहें तो भयानक रोग फैल सकते हैं। जमीन के अंदर रहने वाला केंचुआ मिट्टी को उपजाऊ बनाता है। मधुमक्खियाँ फूलों पर बैठकर परागण करती हैं जिससे हमारी फसलें उगती हैं। कई तरह के वन्यजीवों से हमें बहुमूल्य औषधियाँ प्राप्त होती हैं। उदाहरण के लिए साँप के विष से कैंसर की दवा बनाई जाती है। कई प्रकार की वनस्पतियों और जीवों के वैज्ञानिक अध्ययन से नई औषधियों की खोज की जाती है। इसके अलावा वन्यजीव पर्यटन के माध्यम से देश के हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। रणथंभौर, कान्हा, काजीरंगा और सुंदरवन में देश और विदेश से लोग बाघ, हाथी और गैंडा देखने के लिए आते हैं। इससे स्थानीय लोगों को अच्छी खासी आय प्राप्त होती है। हमारे देश के लोकगीत, लोककथाएँ और चित्रकला पूरी तरह से वन्यजीवों में बसे हैं। मोर का सुंदर नृत्य, बाघ का नृत्य और हिरण की कहानियाँ ये सब हमारी संस्कृति को और अधिक समृद्ध बनाते हैं।

वन्यजीवों पर मंडराते गंभीर संकट

आज के समय में वन्यजीवों के सामने कई प्रकार के गंभीर संकट खड़े हो गए हैं। जैसे कि बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण तेजी से जंगल काटे जा रहे हैं। जंगलों की जगह पर नए शहर, खेत, कारखाने और पक्की सड़कें बनाई जा रही हैं। हाथी का प्राकृतिक जंगल सिकुड़ता जा रहा है, इसलिए वह मजबूरन गाँवों में आ जाता है। बाघ का रहने का क्षेत्र भी बहुत छोटा हो गया है। आज बाघ की खाल, हाथी के बहुमूल्य दाँत, गैंडे के सींग, पैंगोलिन के शल्क, तोते और कछुओं की तस्करी एक बड़ा अंतर्राष्ट्रीय अपराध बन चुका है। केवल धन के लालच में शिकारी इन दुर्लभ जीवों को बेरहमी से मार रहे हैं। जब जंगलों का क्षेत्रफल कम होता है तो तेंदुआ, हाथी और भालू जैसे खतरनाक जानवर गाँवों में प्रवेश कर जाते हैं। ऐसी स्थिति में ग्रामीण उनकी हत्या कर देते हैं या फिर वे किसी मनुष्य को मार डालते हैं। यह मानव और वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है। नदियों में फेंके जा रहे प्लास्टिक के कचरे से कछुए और मछलियाँ तड़प-तड़प कर मर रही हैं। खेती में अंधाधुंध उपयोग हो रहे कीटनाशकों के कारण गिद्ध और गौरैया जैसे छोटे पक्षी विलुप्त होते जा रहे हैं। समुद्र में तेल के फैलने से कई समुद्री जीव मारे जाते हैं। लगातार बढ़ते तापमान के कारण हिमालय में हिम तेंदुआ, गंगा नदी में डॉल्फिन और असम में एक सींग वाला गैंडा गंभीर संकट में आ गए हैं।

संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयास

भारत में वन्यजीव संरक्षण के लिए सरकार द्वारा कई सराहनीय प्रयास किए जा रहे हैं। देश की सरकार ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम उन्नीस सौ बहत्तर बनाया है। इस कड़े अधिनियम के तहत शिकार पर पूरी रोक है और दोषी अपराधी को कड़ा दंड दिया जाता है। सरकार द्वारा चलाई गई बाघ परियोजना, हाथी परियोजना, गैंडा परियोजना, घड़ियाल परियोजना और हिम तेंदुआ परियोजना से कई जीवों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। एक समय ऐसा भी था जब देश में बाघ केवल एक हजार आठ सौ ही रह गए थे, लेकिन आज इनकी संख्या बढ़कर तीन हजार से अधिक हो गई है। यह वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में पूरी दुनिया में सबसे बड़ी सफलता मानी जाती है। यदि हम देश के राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों को देखें तो हमारे देश में कुल एक सौ छह राष्ट्रीय उद्यान और पाँच सौ से अधिक अभयारण्य मौजूद हैं। असम के काजीरंगा में गैंडा, गुजरात के गिर में शेर, सुंदरवन में बाघ और केवलादेव में पक्षी पूरी तरह सुरक्षित हैं। अब स्थानीय लोगों की भागीदारी को भी संरक्षण कार्यों से जोड़ा जा रहा है। स्थानीय लोगों को वन मित्र और बाघ मित्र बनाया जा रहा है। जब स्थानीय निवासियों को इससे लाभ मिलेगा तभी वे वन्यजीवों का संरक्षण करेंगे।

हमारी नैतिक जिम्मेदारी और कर्तव्य

वन्यजीवों का संरक्षण करना केवल सरकार का ही कार्य नहीं है, बल्कि यह हम सबका सामूहिक कर्तव्य है। जब भी हम किसी जंगल में घूमने जाएं तो वहाँ भूलकर भी कचरा न फैलाएं। जंगलों के भीतर किसी भी प्रकार की प्लास्टिक न ले जाएं। जंगलों में कभी भी तेज ध्वनि या संगीत न बजाएं। वन्यजीवों को हमेशा दूर से ही देखें, उन्हें कभी न छेड़ें और न ही उन्हें अपना भोजन दें। बाजार से कभी भी वन्यजीव उत्पाद न खरीदें जैसे हाथी के दाँत की मूर्ति, बाघ की खाल, शहतूश शाल और कछुए का कवच। इन सभी चीजों की बाजार में मांग ही शिकार का सबसे बड़ा कारण बनती है। जब ऐसी चीजों की मांग पूरी तरह बंद होगी तभी शिकार भी अपने आप बंद हो जाएगा। हमें अपने आस-पास अधिक से अधिक संख्या में वृक्ष लगाने चाहिए। अपने घरों की छतों पर गौरैया, मैना और गिलहरी के लिए साफ पानी और दाना अवश्य रखें। अपने घर के आँगन में तुलसी, नीम और पीपल जैसे पवित्र वृक्ष लगाएं जिन पर पक्षी आसानी से आ सकें। अपने छोटे बच्चों को वन्यजीवों की प्रेरणादायक कहानियाँ सुनाएं। बच्चों को समय-समय पर चिड़ियाघर और राष्ट्रीय उद्यान घुमाने के लिए ले जाएं। जब कोई बच्चा किसी वन्यजीव से सच्चा प्रेम करना सीखेगा तभी वह बड़ा होकर उसकी रक्षा करेगा। सोशल मीडिया पर जागरूकता जरूर फैलाएं, लेकिन कभी भी वन्यजीवों की सटीक और लाइव जगह साझा न करें ताकि शिकारी वहाँ तक न पहुँच सकें। अंतिम रूप से वन्यजीव सप्ताह हमें यह बड़ी बात स्मरण कराता है कि मनुष्य इस धरती का मालिक नहीं बल्कि केवल एक रखवाला है। यह सुंदर धरती केवल अकेले मनुष्य के लिए नहीं है, बल्कि इस पर सभी जीवों का समान अधिकार है। महाकवि तुलसीदास जी ने बहुत सही कहा है कि परहित सरिस धर्म नहिं भाई। वन्यजीवों का हित करना ही हमारा सबसे बड़ा धर्म है। यदि इस धरती पर वन्यजीव नहीं बचेंगे तो घने जंगल नहीं बचेंगे, यदि जंगल नहीं रहेंगे तो शुद्ध जल नहीं रहेगा, और यदि जल ही नहीं रहेगा तो इस धरती पर जीवन की कल्पना भी असंभव हो जाएगी। आइए इस वन्यजीव सप्ताह के पावन अवसर पर हम सब मिलकर यह पक्का संकल्प लें कि हम किसी भी वन्यजीव को कभी कोई हानि नहीं पहुँचाएंगे। हम सब मिलकर अपने जंगलों को बचाएंगे और इन बेजुबान जीवों को बचाएंगे, तभी हमारा अपना आने वाला भविष्य पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। क्योंकि यदि वन्यजीव इस दुनिया में हैं तो ही हम सब सुरक्षित हैं, और वन्यजीव हैं तो ही इस संसार में जीवन है।

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