यूपीआई पर टैक्स का कड़वा सच: 2000 रुपये से ज्यादा के लेनदेन पर कर से बाजार में हलचल और विरोध

यूपीआई पर टैक्स का कड़वा सच: 2000 रुपये से ज्यादा के लेनदेन पर कर से बाजार में हलचल और विरोध

अर्पित जादौन द्वारा भेजी अटल हिन्द के लिए इस विशेष रिपोर्ट में यूपीआई पर टैक्स लगाने के फैसले और उसके असर पर चर्चा की गई है। इस खबर के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • सरकार द्वारा 2000 रुपये से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत का कर लगाया गया है।
  • भारत के अनेक संगठन, व्यापारी और सामान्य वर्ग इस कर प्रणाली का भरपूर विरोध कर रहे हैं।
  • ऑनलाइन पेमेंट पर टैक्स लगने से लोग फिर से घरों में कैश जमा करने लगेंगे।
  • इस टैक्स का सबसे बड़ा फायदा अमेरिका में बैठी कंपनियों फोनपे और गूगल पे को मिल सकता है।

सरकार ने नोटों को चलन से बाहर करने के उद्देश्य से यूपीआई को बाजार में चलाने पर काफी जोर दिया था। अनेक कंपनियां प्रतिस्पर्धा में आ गई और अनेक विदेशी कंपनियां भी इस दौड़ में शामिल हो गईं। अब सरकार ने यूपीआई पर 2000 रुपये के लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत का कर लगा दिया है। इससे बाजार में हलचल पैदा हो गई है। भारत के अनेक संगठन, व्यापारी और अन्य सामान्य वर्ग इस कर प्रणाली का भरपूर विरोध कर रहे हैं।

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इसको ऐसे समझा जाए कि जब आप महीने भर का राशन लेने बाजार जाते हैं। मान लीजिए हमारा बिल 2400 रुपये बनता है और हम दुकानदार को यूपीआई से पेमेंट करेंगे। तब दुकानदार कहेगा कि मुझे 2000 रुपये तो यूपीआई से दे दें और 400 रुपये नगद पेमेंट करें। अगर आप पूरा भुगतान यूपीआई से करना चाहेंगे तो आपको 20 या 30 रुपये ज्यादा देने होंगे। यानी कि वह सामान हमें 2450 रुपये का पड़ेगा और यह ग्राहक यानी हमारा ही नुकसान होगा।

पहले पेट्रोल पंप पर 2 प्रतिशत अधिक देकर कार्ड स्वैप किया जाता था और अब यह मर्ज फिर लौटने वाला है। इसका असर यह होगा कि बाजार में ऑनलाइन पेमेंट्स से दुकानदार कतराएगा। फिर से यह स्थिति होगी कि हमें 2 से 4 हजार रुपये अपने पर्स में रखना पड़ेगा। जब हम जेब में पैसे रखेंगे तो अपनी अलमारी में भी इमर्जेंसी के लिए एक-दो लाख रुपये रखने होंगे।

मोदी जी ने लोगों को सपना दिखाया था कि कैशलेस इंडिया बनाएंगे और काला धन खत्म हो जाएगा। पूरा सिस्टम कैशलेस बन जाएगा लेकिन इस टैक्स से लोग फिर से घरों में कैश जमा करने लगेंगे। इससे यह नुकसान है कि अभी तो यह पैसा बैंक में ही घूम रहा है। जब यह पैसा आपके घर में रहेगा तब आप इसे खर्च नहीं करेंगे और यह आपके पास ही रहेगा।

जब तक दुकानदार इस पैसे को बैंक में जमा नहीं करेंगे, तब तक यह पैसा बैंक के बाहर ही रहेगा। ऐसे में बैंकों की क्या हालत होगी यह सोचने की बात है। यूपीआई आने से पहले बैंकों के पास सेविंग अकाउंट और करंट अकाउंट के खाते होते थे। बैंक बचत खाते में ग्राहकों को 2.5 प्रतिशत से 3 प्रतिशत तक ब्याज देती थी और करंट अकाउंट में चवन्नी भी नहीं देती थी।

यानी जनता का अरबों-खरबों रुपया बैंक में पड़ा रहता था। बैंक इसी पैसे को उठाकर बड़े उद्योगपतियों को गाड़ी खरीदने और मकान बनाने वाले को 9, 10 या 12 प्रतिशत के भारी ब्याज पर लोन दे देते थे। इसी मुनाफे से बैंक की दुकान चलती थी। पिछले 2-3 वर्षों में जब से यूपीआई आई है, तब से लोगों के छोटे-मोटे पैसे बैंकों में पड़े रहते थे और बैंकों में वह पैसा लगातार घट रहा है।

कुल जमा राशि 40 से 43 प्रतिशत थी जो अब घटकर 37 प्रतिशत रह गई है। महंगाई इतनी है कि लोगों की बचत घट रही है। जो छोटी बचत है, उसे लोग शेयर और म्यूचुअल फंड में लगा रहे हैं। अब यूपीआई पर टैक्स लगने पर लोग पैसा निकालेंगे और उसे पर्स तथा तिजोरी में रखने लगेंगे।

बैंकों से सस्ता पैसा और तेजी से गायब होने लगेगा। बैंकों की तिजोरी खाली होने लगेगी तो बैंक क्या करेगा। जब कोई मकान पर लोन लेगा तब बैंक उससे 8.50 प्रतिशत की बजाय 10.50 प्रतिशत की ब्याज की मांग करेगी। अब इस टैक्स की मार ग्राहकों की ईएमआई, बाइक और कार के लोन पर पड़ेगी।

ग्राहक की मासिक किस्त 2 से 3 हजार रुपये बढ़ जाएगी। अब दिखाया यह जा रहा है कि 2000 से ऊपर की रकम पर टैक्स की बात हो रही है। पर इसका पूरा झटका बैंक के पूरे ढांचे और हमारी जेब पर पड़ेगा। क्या यह पैसा भारत सरकार के खाते में जाएगा या यह देश के स्कूलों और अस्पतालों में लगेगा, पर अफसोस ऐसा नहीं होने जा रहा है।

हम ज्यादातर यूपीआई चलाने के लिए फोनपे या गूगल पे का इस्तेमाल कर रहे हैं। देश में पूरे यूपीआई का अकेले 47 प्रतिशत से 48 प्रतिशत का हिस्सा अकेले फोनपे का है। यह कंपनी अमेरिका की बड़ी कंपनी के मालिक वॉलमार्ट की है। दूसरा गूगल पे है जिसके पास करीब यूपीआई का 32 प्रतिशत से 33 प्रतिशत का हिस्सा आता है।

यह कैलिफोर्निया अमेरिका में बैठे गूगल के मालिक की है। इन दोनों को जोड़ दें तो 81 प्रतिशत बैठता है और देश का पेटीएम 7 प्रतिशत से 8 प्रतिशत पर सिमट कर बैठा है। अब सरकार ने यूपीआई पर टैक्स लगाया है तो इसका सबसे बड़ा फायदा अमेरिका में बैठी कंपनियों को मिलेगा। इस पर सरकार को सोचना चाहिए।

पहले बैंकों को एटीएम लगाने के लिए जगह-जगह कमरे किराए पर लेने पड़ते थे। 24 घंटे एसी चलवाने पड़ते थे और सिक्योरिटी गार्ड लगवाने पड़ते थे। बख्तरबंद गाड़ी से कैश भरने के लिए करोड़ों रुपये का खर्चा करना पड़ता था। भारत में एक एटीएम और उसे संभालने का खर्च एक वर्ष में 500 करोड़ से ज्यादा का है।

एक रिपोर्ट के अनुसार यूपीआई के आने से लोगों ने एटीएम का प्रयोग बंद कर दिया है। इसके कारण बैंकों को हजारों करोड़ की बचत हुई है। तो यह घाटे का रोना किसके लिए है। इसका पूरा सच कड़वा है और यह पूरा खेल वाशिंगटन से चल रहा है।

यूपीआई से पहले प्लास्टिक कार्ड, डेबिट कार्ड और क्रेडिट कार्ड चलते थे। उन पर ठप्पा मास्टर कार्ड और वीजा कार्ड का होता था। जब कोई इन कार्डों का प्रयोग करता था तो कंपनी 2 से 3 प्रतिशत अपना कमीशन काट लेती थी। भारत के पसीने की कमाई से अमेरिका अपनी तिजोरी भर रहा था।

भारत ने अपना सिस्टम यूपीआई और रुपे इनके सामने खड़ा कर दिया था। बहुत लोगों ने इसका उपयोग भी शुरू कर दिया और कार्ड का प्रयोग बंद कर दिया। नतीजा यह हुआ कि अमेरिका का अरबों रुपये का धंधा धड़ाम से गिर गया। इसके बाद अमेरिका के पेट में दर्द हुआ और उसने इसके खिलाफ शिकायत यूएसटीआर ट्रेड रिपोर्ट में दर्ज कराई।

शिकायत थी कि भारत यूपीआई और रुपे को मुफ्त करके अमेरिका की कंपनी के साथ भेदभाव कर रही है। अब ऐसा लगता है कि भारत इस दबाव में आ चुका है। अब यूपीआई पर टैक्स घोषित करना अमेरिका की कंपनी के दबाव में किया गया है। अब आत्मनिर्भर का ढोल जो हम पीट रहे थे, वह अब फटने लगा है।

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