उत्तर प्रदेश सियासत: रथ के रंग से गरमाई राजनीति, सपा के पीडीए और बसपा के सर्वजन संदेश में छिड़ी बड़ी जंग

रथ के रंग से निकली सियासत की बड़ी लड़ाई
उत्तर प्रदेश की आगामी 2027 की सियासत में चुनावी रणभेरी अभी पूरी तरह बजी भी नहीं है, लेकिन राजनीतिक तीर-कमान निकल चुके हैं। समाजवादी पार्टी की पीडीए राजनीति और बहुजन समाज पार्टी के 'सर्वजन संदेश के बीच खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। बसपा की सुप्रीमो सुश्री मायावती ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पर हमला बोलते हुए जिस तरह पीडीए रथ के रंग को राजनीतिक सवाल बना दिया है, उससे साफ है कि आने वाले चुनाव में लड़ाई केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रहने वाली। असली जंग सामाजिक समीकरणों, वोट बैंक और राजनीतिक नैरेटिव पर भी होगी।
मायावती ने सवाल उठाया है कि सपा का पीडीए रथ अपने पारंपरिक लाल रंग से कम और भाजपा-आरएसएस के भगवा रंग से अधिक प्रभावित क्यों नजर आ रहा है। उनके शब्दों में यह सवाल महज रंग का नहीं, बल्कि राजनीति के बदलते रंग का है। मायावती ने इसे सपा की वोट की राजनीति से जोड़ते हुए यह तक पूछ दिया कि क्या अखिलेश यादव का मुस्लिम मतदाताओं पर पहले जैसा भरोसा नहीं रहा?
सियासत में प्रतीकों की अपनी ताकत होती है। झंडे का रंग हो या चुनावी रथ, नारा हो या यात्रा हर चीज मतदाता तक एक राजनीतिक संदेश पहुंचाती है। लेकिन राजनीति के रंगों को सीधे वैचारिक बदलाव का प्रमाण मान लेना भी जल्दबाजी होगी। किसी प्रचार वाहन का रंग अपने आप में किसी दल की नीति, विचारधारा या चुनावी रणनीति का निर्णायक प्रमाण नहीं बन जाता। फिर भी मायावती ने जिस मुद्दे को उठाया है, उसकी राजनीतिक अहमियत इसलिए है क्योंकि उन्होंने रंग के बहाने सीधे सपा के सामाजिक समीकरण पर निशाना साधा है।
अखिलेश यादव की राजनीति में पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समूहों का गठजोड़ एक प्रमुख राजनीतिक सूत्र के रूप में सामने आया है। समाजवादी पार्टी इस सामाजिक समीकरण को भाजपा के मुकाबले एक वैकल्पिक राजनीतिक धुरी के रूप में पेश करती रही है। मायावती का सवाल इसी धुरी की विश्वसनीयता पर है। वह पूछ रही हैं कि आखिर पीडीए की जमीन पर सपा का वास्तविक सामाजिक आधार कितना मजबूत है और उसमें दलितों तथा अल्पसंख्यकों की हिस्सेदारी किस रूप में है?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट लंबे समय से बसपा की केंद्रीय राजनीतिक ताकत रहे हैं। यदि कोई दूसरा दल दलितों को अपने सामाजिक गठजोड़ का हिस्सा बनाने की कोशिश करता है तो स्वाभाविक रूप से बसपा के लिए यह राजनीतिक चुनौती बनती है। मायावती का हमला इसी चुनौती का जवाब भी माना जा सकता है।
मायावती ने मुस्लिम मतदाताओं का भी विशेष उल्लेख किया है। उनका तर्क है कि यदि मुस्लिम समाज ने पिछले चुनावों में समाजवादी पार्टी को समर्थन दिया, लेकिन उसके बावजूद भाजपा को सत्ता में आने से नहीं रोका जा सका, तो मुस्लिम मतदाताओं को अपने राजनीतिक विकल्प पर विचार करना चाहिए। यह तर्क सीधे उस धारणा को चुनौती देता है कि मुस्लिम मतदाता स्वाभाविक रूप से सपा के साथ रहेगा।
लेकिन यहां भी चुनावी राजनीति का एक पुराना सच सामने आता है. कोई भी वोट बैंक स्थायी नहीं होता। मतदाता किसी दल के साथ हमेशा के लिए बंधा नहीं होता। परिस्थितियां बदलती हैं, मुद्दे बदलते हैं और राजनीतिक समीकरण भी बदलते हैं। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और सामाजिक रूप से विविध राज्य में जाति, समुदाय, स्थानीय प्रत्याशी, सरकार का प्रदर्शन, राष्ट्रीय मुद्दे और चुनावी गठबंधन सभी मिलकर मतदान व्यवहार को प्रभावित करते हैं।इसलिए मायावती का मुस्लिम मतदाताओं को दिया गया संदेश केवल सपा पर हमला नहीं है। यह बसपा की ओर से राजनीतिक विकल्प का दरवाजा खोलने की कोशिश भी है।
मायावती ने अपने बयान में ऊंची जातियों, खासकर ब्राह्मण समाज के बीच भी बसपा के पक्ष में रुझान बढऩे का दावा किया है। यह दावा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि बसपा की राजनीति का एक बड़ा अध्याय सामाजिक इंजीनियरिंग से जुड़ा रहा है। दलित आधार के साथ ब्राह्मण और अन्य सामाजिक समूहों को जोडऩे का प्रयोग उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहले भी महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में मायावती का यह दावा बताता है कि बसपा एक बार फिर व्यापक सामाजिक गठबंधन की संभावना तलाश रही है।लेकिन दावे और जमीन की हकीकत में अंतर होता है। किसी सामाजिक समूह के राजनीतिक रुझान में बदलाव का अंतिम प्रमाण चुनाव परिणाम या विश्वसनीय सर्वेक्षण ही दे सकते हैं। चुनाव से पहले किए गए राजनीतिक दावे स्वाभाविक रूप से अपने-अपने दलों के हित और रणनीति से जुड़े होते हैं।
मायावती का दूसरा महत्वपूर्ण हथियार कानून-व्यवस्था का मुद्दा है। उन्होंने अपने शासनकाल को अपराध नियंत्रण, शांति-व्यवस्था और कानून के राज से जोड़ते हुए कहा है कि बसपा ऐसी सरकार का अनुभव पहले दे चुकी है। यह कोई नया राजनीतिक तर्क नहीं, बल्कि बसपा के चुनावी विमर्श का पुराना और महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कानून-व्यवस्था हमेशा बड़ा चुनावी मुद्दा रही है। अलग-अलग सरकारें अपने कार्यकाल को लेकर अलग-अलग दावे करती रही हैं और विपक्ष उनके दावों को चुनौती देता रहा है। ऐसे में चुनावी बहस का वास्तविक आधार यह होना चाहिए कि सरकारों के कार्यकाल में अपराध, पुलिस व्यवस्था, न्यायिक प्रक्रिया, निवेश, रोजगार और जनकल्याण से जुड़े ठोस आंकड़े क्या कहते हैं।
मायावती का 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय का संदेश इसी प्रशासनिक दावे के साथ जुड़ा हुआ है। वह बसपा को केवल दलित राजनीति तक सीमित नहीं रखना चाहतीं। उनका कहना है कि पार्टी समाज के सभी वर्गों के लिए रोटी, रोजगार, सम्मान और स्वाभिमान की राजनीति करती है।
एक तरफ सपा का पीडीए है, जो पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एक राजनीतिक छतरी के नीचे लाने की कोशिश करता है। दूसरी तरफ बसपा का सर्वजन संदेश है, जो सामाजिक दायरे को व्यापक बनाने की बात करता है। दोनों ही रणनीतियों की सफलता अंतत: इस बात पर निर्भर करेगी कि वे जमीन पर कितने मतदाताओं को अपने साथ जोड़ पाती हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पुराने सामाजिक समीकरण अपनी पुरानी शक्ल में कायम रहेंगे या मतदाताओं का नया पुनर्संयोजन होगा?
मायावती का बयान इस संभावित पुनर्संयोजन की ओर संकेत करता है। वह सपा के उस दावे को चुनौती दे रही हैं कि पीडीए उसके लिए व्यापक सामाजिक समर्थन का आधार बन सकता है। साथ ही वह मुस्लिम मतदाताओं को यह संदेश दे रही हैं कि बसपा उनके सामने एक अलग राजनीतिक विकल्प है। इसी क्रम में ब्राह्मण और अन्य सवर्ण समूहों का उल्लेख करके वह अपने सामाजिक आधार को व्यापक बनाने की कोशिश का संकेत भी देती हैं।
इस पूरी कवायद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब केवल 'कौन किसके साथ है का सवाल नहीं है। उससे बड़ा सवाल है ? कौन किस सामाजिक समूह को किस राजनीतिक भाषा में अपने साथ जोड़ सकता है?
पीडीए बनाम सर्वजन का यह विमर्श आने वाले चुनावी माहौल में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक टकराव बन सकता है। लेकिन इसका जवाब नारों से नहीं मिलेगा। इसका जवाब उम्मीदवारों के चयन, संगठन की सक्रियता, स्थानीय मुद्दों और अंतत: मतदाताओं के फैसले में मिलेगा। मायावती ने फिलहाल गेंद अखिलेश यादव के पाले में डाल दी है। उन्होंने पीडीए की वास्तविकता पर सवाल किया है, मुस्लिम मतदाताओं के बीच सपा की पकड़ को चुनौती दी है और अपने शासन के रिकॉर्ड को फिर बहस में खड़ा किया है। अब देखना यह होगा कि समाजवादी पार्टी इस हमले का जवाब किस राजनीतिक भाषा में देती है। कुल मिलाकर, पीडीए रथ का रंग भले ही इस राजनीतिक विवाद का तत्काल कारण बना हो, लेकिन असली लड़ाई रंगों की नहीं, वोट के सामाजिक रंगमंच की है। लाल, भगवा और नीला ये सभी उत्तर प्रदेश की राजनीति में केवल रंग नहीं, बल्कि अलग-अलग राजनीतिक पहचानों और दावों के प्रतीक हैं। चुनावी मैदान में असली परीक्षा इन प्रतीकों की नहीं, बल्कि उन सामाजिक गठबंधनों की होगी जिन्हें ये प्रतीक अपने पीछे खड़ा करने में सफल होते हैं।
उत्तर प्रदेश की सियासत में रंग बदलने के आरोप नए नहीं हैं। लेकिन इस बार मायावती का संदेश साफ तौर पर यह है कि वह सपा को अपने सामाजिक आधार पर एकतरफा बढ़त देने के मूड में नहीं हैं। वह पीडीए की राजनीति को चुनौती देकर बसपा के लिए फिर से राजनीतिक जमीन तलाश रही हैं। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि पीडीए रथ का रंग क्या है। बड़ा सवाल यह है कि चुनावी मौसम चढऩे के साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति का रंग किस तरह बदलता है. और इस बदलते रंगमंच पर कौन से सामाजिक समीकरण टिकते हैं, कौन-से बिखरते हैं और कौन कौन से नए समीकरण आकार लेते हैं। इसका फैसला राजनीतिक मंच पर नेता नहीं, मतदाता करेंगे।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।