यूपी में दो महीने में 4 मुसलमानों की हत्या, SAJC रिपोर्ट के खुलासे

साउथ एशिया जस्टिस कैंपेन (SAJC) की पहली Election Watch: उत्तर प्रदेश, 2027 रिपोर्ट के अनुसार 1 अगस्त से 30 सितंबर 2026 के बीच कम से कम चार मुसलमानों की कथित धार्मिक नफरत वाली हत्याएं हुईं। रिपोर्ट में 70 मुसलमानों के पुलिस ‘हाफ-एनकाउंटर’ में घायल होने, 152 की मनमानी गिरफ्तारी और कई हमलों का जिक्र है। ये आंकड़े 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सामने आए हैं।
UP Election Watch: दो महीनों में 4 मुस्लिम मौतों का दावा, क्या कहती है रिपोर्ट?
लखनऊ/3 अक्टूबर 2026/अटल हिन्द
त्वरित सारांश: दक्षिण एशिया जस्टिस कैंपेन (SAJC) की Election Watch: Uttar Pradesh, 2027 की पहली रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अगस्त-सितंबर 2026 के दौरान उत्तर प्रदेश में कम से कम चार मुस्लिम लोगों की मौत ऐसे मामलों में हुई जिन्हें रिपोर्ट ने संदिग्ध धार्मिक रूप से प्रेरित घृणा अपराधों के रूप में दर्ज किया। रिपोर्ट ने साथ ही पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारियों और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कई मुद्दों का भी उल्लेख किया है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर दिखाई दे सकता है, लेकिन चुनावी माहौल से जुड़े सामाजिक और कानून-व्यवस्था के सवाल पहले ही चर्चा में आने लगे हैं। इसी बीच दक्षिण एशिया जस्टिस कैंपेन यानी SAJC ने Election Watch: Uttar Pradesh, 2027 का पहला संस्करण जारी किया है। रिपोर्ट अगस्त और सितंबर 2026 की घटनाओं को आधार बनाकर तैयार की गई है।
रिपोर्ट का एक प्रमुख दावा है कि इन दो महीनों में उत्तर प्रदेश में कम से कम चार मुस्लिम लोगों की मौत ऐसे मामलों में हुई जिन्हें SAJC ने संदिग्ध धार्मिक रूप से प्रेरित घृणा अपराधों में शामिल किया है। संस्था के अनुसार 2025 में पूरे साल ऐसे सात मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2026 के पहले सात महीनों में पांच मामले दर्ज किए गए थे। अगस्त-सितंबर के चार मामलों को जोड़ने के बाद संस्था ने 2026 के लिए कुल संख्या नौ बताई है।
चार मौतों में कौन-कौन से मामले शामिल हैं?
SAJC की रिपोर्ट में पहला मामला हापुड़ का है। रिपोर्ट के अनुसार 31 जुलाई को ट्रक चालक अजीम अली की एक ऑटो-रिक्शा से टक्कर के बाद कथित तौर पर मारपीट की गई। गंभीर हालत में उन्हें दिल्ली के अस्पताल ले जाया गया, जहां 4 अगस्त को उनकी मौत हो गई। मामले में पुलिस ने सात लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बात सामने आई थी।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अजीम अली के मामले में पुलिस और शिकायतकर्ताओं की ओर से दुर्घटना को लेकर अलग-अलग पक्ष सामने आए थे। इसलिए पूरी घटना को केवल एक धार्मिक अपराध के रूप में अंतिम रूप से घोषित करना जांच और न्यायिक प्रक्रिया से पहले उचित नहीं होगा। SAJC ने इसे अपने मानकों के तहत संदिग्ध धार्मिक रूप से प्रेरित घटना में शामिल किया है।
दूसरा मामला मैनपुरी का बताया गया है। SAJC के अनुसार 6-7 अगस्त के दौरान 20 वर्षीय मुस्लिम युवक अनीश की मौत हुई। रिपोर्ट के मुताबिक वह अपने एक रिश्तेदार के साथ रात में खेल रहा था, तभी गांव के चार लोगों ने दोनों से कथित तौर पर पूछताछ की और मारपीट की। शिकायत के अनुसार विवाद का एक कारण रिश्तेदार का बुर्का पहनना बताया गया। अनीश की मौत के बाद पुलिस ने चार लोगों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या से संबंधित मामला दर्ज किया।
तीसरा मामला झांसी का है और इसकी जांच में पुलिस कार्रवाई सामने आई। 21 वर्षीय कानून के छात्र परवेज अली की मौत के मामले में शुरुआती तौर पर घटना को दुर्घटना माना गया था। बाद में पोस्टमार्टम में शरीर पर मानव दांतों के काटने के निशान सहित चोटें सामने आने के बाद जांच हत्या के एंगल से आगे बढ़ी। पुलिस ने एक कांस्टेबल समेत आठ लोगों को गिरफ्तार किया।
झांसी पुलिस की जांच के अनुसार आरोपियों का एक समूह खुद को अपराध रोकने वाला संगठन बताता था और कथित तौर पर ड्रग से जुड़े लोगों से वसूली करता था। पुलिस का आरोप है कि परवेज को ड्रग के नमूने से जुड़े बहाने से बुलाया गया और उसके साथ मारपीट की गई। इस मामले में उपलब्ध पुलिस जांच धार्मिक पहचान से आगे बढ़कर कथित वसूली और आपराधिक गतिविधियों की ओर भी संकेत करती है। इसलिए इसे केवल एक धार्मिक अपराध मानना जांच के सभी पहलुओं को समेट नहीं पाएगा।
चौथा मामला बिजनौर का है। 15 सितंबर को 43 वर्षीय सरकारी प्राथमिक स्कूल शिक्षक नौशाद अहमद की गोली मारकर हत्या कर दी गई। आरोपी ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया था। पुलिस के अनुसार आरोपी ने दावा किया कि उसे लगता था कि शिक्षक 'लव जिहाद' को बढ़ावा दे रहे थे। हालांकि पुलिस ने व्यक्तिगत विवाद के पहलू की भी जांच की।
इस मामले में उपलब्ध रिपोर्टिंग एक महत्वपूर्ण सावधानी की ओर भी इशारा करती है। पुलिस के अनुसार हत्या से कुछ दिन पहले दोनों के बीच कथित विवाद हुआ था और जांच में व्यक्तिगत दुश्मनी का पहलू भी सामने आया। इसलिए आरोपी द्वारा बताए गए कथित मकसद को जांच का हिस्सा माना जाना चाहिए, अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं।
SAJC की रिपोर्ट में सिर्फ चार मौतें नहीं
SAJC ने अपनी रिपोर्ट को केवल हत्या के मामलों तक सीमित नहीं रखा है। संस्था का कहना है कि उसने अगस्त-सितंबर के दौरान गिरफ्तारियों, हिरासत, पुलिस मुठभेड़ों, कथित दुर्व्यवहार, धार्मिक स्वतंत्रता, भाषण और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मामलों को भी देखा।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इन दो महीनों में कम से कम 70 मुस्लिम लोगों को पुलिस की कथित 'हाफ एनकाउंटर' कार्रवाई में गोली लगने से चोट आई। इनमें 27 जिलों का उल्लेख किया गया है और रिपोर्ट के अनुसार 52 लोग गोहत्या या पशु चोरी के आरोपों से जुड़े थे। ये SAJC द्वारा मीडिया रिपोर्टों और उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर तैयार किए गए आंकड़े हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगस्त-सितंबर में 152 से अधिक मुस्लिम लोगों की गिरफ्तारी या हिरासत के मामले दर्ज किए गए। SAJC ने यह स्पष्ट किया है कि उसकी सूची संपूर्ण सरकारी अपराध रजिस्टर नहीं है, बल्कि मीडिया रिपोर्टों और सत्यापित की जा सकने वाली घटनाओं पर आधारित दस्तावेजीकरण है।
पुलिस एनकाउंटर के आंकड़ों पर भी सवाल
SAJC ने उत्तर प्रदेश पुलिस के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा है कि 2026 के पहले आठ महीनों में 49 लोग पुलिस 'एनकाउंटर' में मारे गए। रिपोर्ट के अनुसार यह संख्या पूरे 2025 में दर्ज 48 मौतों से अधिक थी।
यहां 'एनकाउंटर' शब्द को लेकर भी सावधानी जरूरी है। पुलिस आमतौर पर इन घटनाओं को मुठभेड़ या आत्मरक्षा में हुई गोलीबारी के रूप में प्रस्तुत करती है, जबकि मानवाधिकार संगठनों और कुछ रिपोर्टों में कई मामलों की स्वतंत्र जांच की मांग की जाती रही है। किसी मामले में अंतिम जिम्मेदारी तय करने का आधार जांच, साक्ष्य और अदालत का निर्णय होता है।
SAJC ने यह भी कहा है कि सितंबर 2024 के बाद पुलिस द्वारा मारे गए लोगों का धर्मवार आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया। संस्था ने पुराने आधिकारिक आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर मुस्लिमों की हिस्सेदारी का उल्लेख किया है, लेकिन उस अनुपात को 2026 की वर्तमान स्थिति का प्रत्यक्ष आंकड़ा नहीं माना जा सकता।
चुनावी पृष्ठभूमि क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर प्रदेश विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 22 मई 2027 तक है। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड में उत्तर प्रदेश विधानसभा की अवधि 23 मई 2022 से 22 मई 2027 दर्ज है। इसलिए 2027 में विधानसभा चुनाव होना संवैधानिक समयसीमा के भीतर है, हालांकि चुनाव की तारीख निर्वाचन आयोग घोषित करेगा।
SAJC ने अपनी Election Watch श्रृंखला को इसी चुनावी पृष्ठभूमि से जोड़ा है। संस्था के अनुसार इसका उद्देश्य चुनाव से पहले मानवाधिकार और चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी घटनाओं का महीने-दर-महीने दस्तावेजीकरण करना है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दर्ज घटनाएं संपूर्ण नहीं हैं और केवल वे मामले शामिल हैं जिन्हें रिपोर्ट तैयार करने वालों ने रिपोर्ट किया हुआ और सत्यापित करने योग्य पाया।
यह अंतर समझना जरूरी है। किसी संस्था की रिपोर्ट में दर्ज संख्या को सरकारी अंतिम आंकड़ा नहीं माना जा सकता, जब तक संबंधित सरकारी विभाग या स्वतंत्र आधिकारिक जांच वही आंकड़ा जारी न करे। दूसरी ओर, ऐसी रिपोर्टें उन घटनाओं को एक साथ देखने का प्रयास करती हैं जो अलग-अलग जिलों और अलग-अलग समय पर सामने आती हैं।
चुनाव और सामाजिक तनाव के बीच सबसे बड़ा सवाल
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चुनाव केवल राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा नहीं होते। कानून-व्यवस्था, नागरिक अधिकार, मतदाता सूची, धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक सुरक्षा जैसे मुद्दे भी चुनावी माहौल को प्रभावित करते हैं।
SAJC की रिपोर्ट में चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों का भी उल्लेख है। संस्था ने विपक्षी दलों की ओर से मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आरोपों और पुलिस द्वारा विपक्षी नेताओं को विभिन्न मौकों पर घर में रोके जाने की घटनाओं को दर्ज किया है। इन आरोपों को संबंधित पक्षों के दावों के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि अपने आप में स्थापित तथ्य के रूप में।
रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision के दौरान 2.04 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। SAJC ने यह भी लिखा है कि हटाए गए नामों का धर्म के आधार पर कोई आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं हुआ है। इसलिए इस संख्या से सीधे किसी विशेष धार्मिक समुदाय के मतदाताओं के प्रभावित होने का निष्कर्ष निकालना उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों से संभव नहीं है।
रिपोर्ट पर स्वतंत्र नजर जरूरी
SAJC स्वयं को गैर-दलीय मानवाधिकार आंदोलन बताता है और कहता है कि वह भारत तथा दक्षिण एशिया में मानवाधिकार, लोकतंत्र और विविधता की रक्षा के लिए काम करता है। उसकी Election Watch रिपोर्ट राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया में प्रकाशित खबरों तथा अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू स्रोतों के आधार पर तैयार किए जाने की बात कहती है।
इसलिए रिपोर्ट को पढ़ते समय उसके स्रोत, इस्तेमाल की गई परिभाषाएं और प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच देखना जरूरी है। खास तौर पर हत्या या हिंसा के पीछे धार्मिक मकसद होने का सवाल कई मामलों में पुलिस जांच और अदालत के निष्कर्ष पर निर्भर करता है।
बिजनौर के नौशाद अहमद मामले में आरोपी की ओर से बताया गया कथित धार्मिक मकसद सामने आया है, लेकिन पुलिस ने व्यक्तिगत विवाद के पहलू की भी जांच की। झांसी के परवेज अली मामले में पुलिस जांच ने कथित वसूली और आपराधिक गतिविधि का कोण सामने रखा। ये उदाहरण दिखाते हैं कि एक ही घटना में एक से अधिक जांच कोण हो सकते हैं।
आगे क्या देखना होगा?
2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ते उत्तर प्रदेश में आने वाले महीनों में तीन तरह के आंकड़े विशेष महत्व रखेंगे—कानून-व्यवस्था से जुड़े आधिकारिक आंकड़े, चुनाव आयोग की मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया संबंधी रिकॉर्ड तथा स्वतंत्र संगठनों की निगरानी रिपोर्टें।
इन तीनों को साथ पढ़ने से ही तस्वीर अधिक स्पष्ट हो सकती है। किसी एक रिपोर्ट के आंकड़े को पूरे राज्य की अंतिम स्थिति मानने के बजाय यह देखना जरूरी होगा कि संबंधित मामले में FIR क्या कहती है, पुलिस जांच कहां पहुंची, अदालत में क्या हुआ और सरकारी रिकॉर्ड में क्या दर्ज है।
SAJC की पहली Election Watch रिपोर्ट ने अगस्त और सितंबर 2026 की घटनाओं को एक साथ रखकर बहस के लिए कई सवाल सामने रखे हैं। अब इन मामलों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्ष, सरकारी आंकड़े और आने वाली रिपोर्टें यह स्पष्ट करेंगी कि दर्ज घटनाओं की वास्तविक कानूनी और सामाजिक तस्वीर क्या बनती है।
संपादकीय नोट: इस रिपोर्ट में SAJC के दावों को संस्था के दस्तावेजीकरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जहां किसी घटना में धार्मिक मकसद का आरोप है, वहां उसे अंतिम तथ्य के रूप में नहीं लिखा गया है। संबंधित मामलों में पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्ष को अंतिम महत्व दिया जाएगा।