ट्रंप ने किया नया कानून साइन: भारतीय ऑयल आयात पर लग सकता है 100 प्रतिशत तक टैरिफ

ट्रंप ने किया नया कानून साइन: भारतीय ऑयल आयात पर लग सकता है 100 प्रतिशत तक टैरिफ

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार, 18 सितंबर 2026 को 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस नए कानून से अमेरिकी प्रशासन को दुनिया के उन पांच सबसे बड़े देशों के आयात पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का कानूनी अधिकार मिल गया है जो रूस से कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदते हैं। व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने एक आधिकारिक बयान जारी करके इस कानून पर हस्ताक्षर किए जाने की पुष्टि की है। इस बयान में यह बताया गया है कि यह अधिनियम रूस पर वैधानिक प्रतिबंधों, टैरिफ और रोक को अधिकृत और विस्तारित करता है, साथ ही ईरान के खिलाफ चल रहे मौजूदा उपायों को भी आगे बढ़ाता है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स यानी प्रतिनिधि सभा के सदस्यों ने 16 सितंबर को 262 के मुकाबले 159 वोटों से इस बिल को पास किया था। सीनेट ने इस बिल को इससे पहले 7 अगस्त को अपनी मंजूरी दे दी थी।

केपलर के शिप ट्रैकिंग डेटा और विभिन्न व्यापार विश्लेषणों के अनुसार, भारत वर्तमान में अपने कुल कच्चे तेल के आयात का 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा रूस से खरीदता है। इंडस्ट्री एनालिस्ट्स ने बताया है कि रूसी कच्चे तेल पर भारी कीमत में छूट मिलती है, जिससे 1.4 अरब की भारतीय आबादी के लिए घरेलू ईंधन की affordability बनाए रखने में बहुत मदद मिलती है। देश की घरेलू खपत अपनी कुल क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल की जरूरतों के लिए 85 से 88 प्रतिशत से अधिक आयात पर निर्भर करती है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर इन सप्लाइज में अचानक कोई रुकावट आती है, तो इससे रिफाइनर्स और उपभोक्ताओं दोनों के लिए लागत काफी बढ़ सकती है।

नए कानून का दायरा और संभावित प्रभाव

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इस नए कानून की धारा 113 राष्ट्रपति को यह शक्ति देती है कि वह पिछले 12 महीनों में रूस से सबसे बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम खरीदने वाले पांच देशों में से किसी पर भी 100 प्रतिशत तक ड्यूटी यानी कर लगा सकते हैं। यह शर्त तब लागू होती है जब ये देश कानून लागू होने के बाद 30 दिन की ग्रेस पीरियड के बाद जानबूझकर नई खरीद करते हैं। कानून के वैधानिक पाठ में यह विस्तार से बताया गया है कि यदि राष्ट्रपति कांग्रेस को यह प्रमाणित करते हैं कि इस तरह की छूट संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है, तो राष्ट्रपति के पास विशिष्ट छूट देने का अधिकार सुरक्षित रहता है।

फाइनेंशियल एक्सप्रेस जैसे मीडिया आउटलेट्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेड एनालिस्ट्स और पूर्व अधिकारियों ने इस स्थिति को नई दिल्ली के लिए एक बहुत बड़ी और कठिन उलझन के रूप में वर्णित किया है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव जैसे थिंक टैंक ने यह सुझाव दिया है कि भारत को वॉशिंगटन के साथ अपने व्यापक संबंधों पर बातचीत करते हुए अपने कमर्शियल यानी व्यावसायिक आयात को जारी रखना चाहिए, न कि एकतरफा रियायतें देनी चाहिए। अगर ये टैरिफ लागू हो जाते हैं, तो भारत के टेक्सटाइल यानी कपड़ा, फार्मास्यूटिकल्स यानी दवाएं, रत्न, आभूषण और इंजीनियरिंग सामानों के निर्यातकों को बहुत भारी व्यवधानों का सामना करना पड़ सकता है।

भारत का स्वतंत्र रुख और ऊर्जा सुरक्षा

विदेश मंत्रालय बाजार की गतिशीलता के साथ तालमेल बिठाने वाले विविध स्रोतों के माध्यम से देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। अधिकारियों ने इस बात पर जोर दिया है कि इस मुद्दे पर अमेरिकी वार्ताकारों के साथ उच्च स्तर पर चर्चा की गई है। उन्होंने यह भी कहा है कि भारत अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा। विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने 19 सितंबर को प्रेस को बताया कि भारत किसी भी बाहरी दबाव में काम नहीं करेगा।

उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हित में काम करते हुए एक स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखता है। संभावित टैरिफ लागू होने की 30 दिन की उल्टी गिनती शुरू होने के साथ ही नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच कूटनीतिक चैनल अभी भी सक्रिय बने हुए हैं। सितंबर के क्रूड लोडिंग से जुड़ा भविष्य का मार्केट डेटा संभवतः यह बात सामने लाएगा कि क्या भारतीय खरीदार संभावित अमेरिकी सरकार की कार्रवाई की आशंका में अपनी मात्रा को समायोजित कर रहे हैं या नहीं।

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