सुप्रीम कोर्ट की कैंसर ड्रग की कीमतों पर कड़ी फटकार, मेडिकल मार्केट में चल रही है लूट

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार 22 सितंबर 2026 को कैंसर की जरूरी दवाओं की अधिकतम रिटेल प्राइस यानी MRP और रिटेलर प्राइस यानी PTR के बीच के बहुत बड़े अंतर पर कड़ी आपत्ति जताई है। कोर्ट ने इस प्रथा को दिनदहाड़े लूट और पूरी तरह से बर्बादी और नरसंहार करार दिया है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस कीमत के अंतर पर बहुत नाराजगी दिखाई। कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि इस तरह के बड़े मार्कअप और संबंधित अधिकारियों की चुप्पी को कैसे अनुमति दी जा सकती है। कोर्ट ने इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 29 सितंबर 2026 की तारीख तय की है, ताकि प्रतिवादियों की दलीलों पर विचार किया जा सके।
संसदीय समिति की बैठक और मीडिया रिपोर्ट का खुलासा
कोर्ट की इन सख्त टिप्पणियों के बाद स्वास्थ्य और परिवार कल्याण से जुड़ी संसदीय समिति ने बुधवार 23 सितंबर 2026 को एक बैठक बुलाई। इस बैठक में कैंसर के इलाज को किफायती बनाने और दवाओं के दामों को नियंत्रित करने के तरीकों पर चर्चा की गई।
दिल्ली के सबसे बड़े ड्रग मार्केट से जुड़ी आजतक की गुरुवार 24 सितंबर 2026 की एक रियलिटी चेक रिपोर्ट ने इस मुद्दे की पुष्टि की। इस रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि जीवन रक्षक और कैंसर की दवाएं उनकी MRP से दस गुना तक की कीमत पर बेची जा रही थीं। उदाहरण के तौर पर, 2,700 रुपये MRP वाली एक दवा को 27,000 रुपये में बेचा जा रहा था।
दिल्ली ड्रग ट्रेडर्स एसोसिएशन ने यह बयान दिया कि कीमतों के अंतर का यह मुद्दा बहुत पुराना है। यह केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित नहीं है बल्कि लगभग सभी दवाओं पर असर डालता है।
दवाओं की कीमतों का नियमन और सरकारी नीतियां
नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी यानी NPPA भारत में दवाओं की कीमतों को रेगुलेट करने के लिए जिम्मेदार है। याचिकाकर्ताओं ने यह तर्क दिया है कि भले ही NPPA के पास PTR और स्टॉकिस्टों की定价 का डेटा मौजूद होता है, लेकिन इस जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जाता है।
राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर ने यह नोट किया है कि ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर 2013 का मैकेनिज्म बाजार की लगभग 80 प्रतिशत दवाओं को कवर नहीं करता है। वास्तविक लागत और MRP के बीच का यह अंतर 0 प्रतिशत से 80 प्रतिशत तक है।
मार्च 2026 में सरकार ने यह बयान दिया था कि 131 एंटी-केंसर दवाओं के लिए प्रभावी अधिकतम कीमतें तय कर दी गई थीं। इसके अलावा, यूनियन बजट 2026-27 में इलाज की लागत को कम करने के लिए 17 जरूरी और महंगी कैंसर दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी को पूरी तरह माफ कर दिया गया था।
कच्चे माल की लागत और मरीजों पर इसका असर
हालांकि, जून 2026 में केंद्र सरकार ने कच्चे माल की बढ़ती लागत के कारण प्लेटिनम-बेस्ड कैंसर दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी थी। इससे सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लाटिन जैसी दवाओं की संभावित कमी को लेकर चिंताएं बढ़ गईं हैं।
दवाओं की यह भारी महंगाई मरीजों को अपना इलाज कराने के लिए घर और गहने जैसे सामान बेचने पर मजबूर कर रही है। इस स्थिति का असर सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं और रीइंबर्समेंट पर भी पड़ रहा है।