सोनीपत की गोल्डन गर्ल किरण पहल: खेतों के कच्चे मैदान से लेकर एशियन गेम्स तक का शानदार सफर

सोनीपत की गोल्डन गर्ल किरण पहल: खेतों के कच्चे मैदान से लेकर एशियन गेम्स तक का शानदार सफर

सोनीपत के गन्नौर क्षेत्र के गांव गूमड़ की बेटी किरण पहल ने अपनी कड़ी मेहनत और तेज रफ्तार के दम पर एशियाई खेलों में भारत का नाम रोशन किया है। गांव के कच्चे मैदान से शुरू हुआ उनका यह सफर अंतरराष्ट्रीय एथलेटिक्स तक पहुंचा है। एशियाई खेल 2026 में किरण ने रिले स्पर्धा में स्वर्ण और मिश्रित टीम स्पर्धा में रजत पदक जीतकर अपनी अद्भुत प्रतिभा का परिचय दिया है। विजय पताका फहराने वाली किरण एक अक्टूबर को अपने गांव लौटेंगी, जहां ग्रामीणों की ओर से उनका भव्य स्वागत किया जाएगा।

  • सोनीपत के गांव गूमड़ की बेटी किरण पहल का एशियन गेम्स तक का सफर
  • एशियाई खेल 2026 में रिले स्पर्धा में स्वर्ण और मिश्रित टीम स्पर्धा में रजत पदक जीता
  • एक अक्टूबर को गांव लौटने पर ग्रामीणों द्वारा किया जाएगा स्वागत
  • अभावों से लड़कर और संघर्ष करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाई पहचान

बचपन से खेलों के प्रति जुड़ाव और शुरुआती संघर्ष

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किरण का खेल सफर बिल्कुल भी आसान नहीं रहा है। तीसरी कक्षा में उन्होंने कुछ लड़कियों को जिम्नास्टिक करते हुए देखा था। इसके बाद खेलों के प्रति उनकी रुचि काफी बढ़ गई थी। वह पांचवीं कक्षा में स्कूल की साइकिल दौड़, मटका दौड़, रस्सी और दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगी थीं। शुरुआती प्रतियोगिताओं में उन्हें 500 रुपये तक का पुरस्कार मिला था।

वर्ष 2010 में वह अपने गांव से करीब दो किलोमीटर दूर बीएसटी स्कूल के मैदान में पैदल जाकर अभ्यास करती थीं। करीब डेढ़ साल तक यह पूरा सिलसिला लगातार चला था। बाद में उनके परिवार ने 300 रुपये में एक पुरानी साइकिल खरीदकर दी थी। वर्ष 2014 में उन्होंने सोनीपत के सुभाष स्टेडियम में अपना अभ्यास शुरू किया था।

बेहतर प्रशिक्षण के लिए रोहतक में की नौकरी

बेहतर प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए किरण वर्ष 2015 में रोहतक चली गईं थीं। अपने रहने और खानपान का खर्च निकालने के लिए उन्होंने एक पतंजलि स्टोर में चार हजार रुपये मासिक वेतन पर नौकरी की थी। सुबह के समय अभ्यास, दिन के समय नौकरी और शाम को फिर से मैदान में प्रशिक्षण लेना उनका रोज का एक कड़ा कार्यक्रम बन गया था।

किरण ने वर्ष 2018 में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में लगातार दो स्वर्ण पदक जीते थे। दसवीं कक्षा में कंपार्टमेंट आ जाने के कारण रेलवे की नौकरी में अड़चन आ गई थी। इसके बाद उन्होंने दोबारा पढ़ाई की और वर्ष 2019 में अपनी दसवीं की परीक्षा पास की थी। इसी साल उन्हें पटियाला के भारतीय खेल शिविर में भाग लेने के लिए बुलाया गया था।

रेलवे में नौकरी और ओलंपिक तक का सफर

कोविड महामारी के कारण वर्ष 2020 में सभी खेल गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुई थीं। 25 जून 2021 को उन्होंने रेलवे पटियाला में कनिष्ठ लिपिक के रूप में अपनी नौकरी शुरू की थी। जून 2024 में 50.92 सेकंड का बेहतरीन समय निकालकर किरण ने पेरिस ओलंपिक के लिए सीधे तौर पर क्वालीफाई किया था। ओलंपिक में भले ही उन्हें पदक नहीं मिला, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान बेहद मजबूत हो गई थी।

एशिया एशियाई खेलों से ठीक पहले वर्ष 2026 की भारतीय एथलेटिक्स श्रृंखला के सूरत, लुधियाना और संगरूर चरण में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक जीते थे।

महंगे जूतों की कमी और पारिवारिक सहयोग

किरण की बहन तमन्ना ने बताया कि एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता के दौरान किरण के पास करीब 22 हजार रुपये के दौड़ वाले जूते खरीदने के पैसे नहीं थे। कोई भी प्रायोजक नहीं मिलने पर उन्होंने अपने प्रशिक्षक के जूते पहनकर ही उस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और पदक जीता था।

उनकी मां माया देवी ने बताया कि किरण ने बचपन से ही खेल के लिए काफी ज्यादा मेहनत की है। परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य होने के बावजूद उन्होंने अपनी बेटी का हौसला कभी भी टूटने नहीं दिया था। किरण जब रोज दूर मैदान में अभ्यास के लिए जाती थीं, तब उनका पूरा परिवार उनकी इस कड़ी मेहनत को देखता था।

पिता का सपना और भविष्य के बड़े लक्ष्य

वर्ष 2022 में पिता की गंभीर बीमारी के दौरान किरण ने अपना अभ्यास कुछ समय के लिए छोड़कर उनकी पूरी देखभाल की थी। उनके पिता ने उनसे ओलंपिक पदक जीतने का अपना सपना पूरा करने को कहा था। उनके निधन के बाद यही बात किरण की सबसे बड़ी प्रेरणा बन गई थी।

किरण ने वीडियो कॉल के जरिए बताया कि इस पदक के लिए उन्होंने बहुत कड़ी मेहनत की थी। अब उनका मुख्य लक्ष्य विश्व चैंपियनशिप और वर्ष 2028 का ओलंपिक खेल जीतना है।

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