सिरसा: 85 साल की उम्र में सेवानिवृत्त सैनिक लाल चंद गोदारा ने हासिल की एमए की डिग्री

सिरसा के सेवानिवृत्त सैनिक लाल चंद गोदारा ने 85 साल की उम्र में एमए की डिग्री हासिल करके एक नया इतिहास रचा है। लालचंद गोदारा के मुताबिक उनके पोते-पोतियां उन्हें कम पढ़े-लिखे होने का ताना मारते थे। यही बात उनके दिल पर लगी और उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि वे अपनी पढ़ाई को लगातार जारी रखेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि एक बेहतर समाज के लिए शिक्षा मुख्य अंग है। शिक्षा हासिल करने की कोई उम्र नहीं होती है, यह तो बस एक उम्र का आंकड़ा मात्र है। जीवन में कोई भी मंजिल पाने के लिए शिक्षा हमेशा रोशनी का काम करती है।
अनपढ़ता के ताने ने दी प्रेरणा
सेवानिवृत्त फौजी लाल चंद गोदारा ने सोमवार को यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि उन्होंने सैनिक रहते हुए देश की सुरक्षा के लिए अपने सीने पर गोली खाने की पूरी हिम्मत रखी थी। लेकिन किसी से अनपढ़ता का ताना सुनना गोली खाने से भी कहीं ज्यादा दर्द देने जैसा था। इसके बाद उन्होंने मन में ठान लिया कि वे पढ़ लिखकर एक शिक्षित समाज का हिस्सा जरूर बनेंगे। अपने इसी मजबूत जज्बे के बड़े भरोसे पर लालचंद ने 81 साल की उम्र में अपनी ग्रेजुएशन की डिग्री पूरी की थी। इसके बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई को जारी रखने का कड़ा फैसला लिया। उन्होंने इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी में एमए कोर्स में दाखिला लिया। अब लालचंद ने एमए की डिग्री को सफलतापूर्वक हासिल करके एक नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया है।
पीएचडी और लॉ करने का अरमान
लालचंद गोदारा ने आगे बताया कि अब वे अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखते हुए पीएचडी या लॉ करने का अपना अरमान पूरा करने की दौड़ में लगे हुए हैं। आपको बता दें कि देश की सेवा के दौरान युद्ध में मोर्चा संभाल चुके लालचंद खेल के मैदान में भी अपनी कड़ी प्रतिभा का पूरा लोहा मनवा रहे हैं। हरियाणा मास्टर एथलेटिक्स प्रतियोगिता में उन्होंने कई पदक जीतकर न केवल अपनी खेल प्रतिभा दिखाई है। बल्कि उन्होंने आज के युवाओं के सामने फिटनेस और हौसले की एक बहुत बड़ी मिसाल भी पेश की है। लालचंद गोदारा ने यह भी बताया कि उन्होंने वर्ष 1962, 1965 और 1971 की भारत की लड़ाइयों में एक सैनिक के रूप में सक्रिय हिस्सा लिया था। सेना में अपनी सेवाएं पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 1972 से लेकर 2002 तक परिवहन विभाग में यार्ड मास्टर के रूप में भी अपनी सेवाएं दी थीं।
खेलों में सक्रियता और राष्ट्रीय पदक
नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद आमतौर पर जिस उम्र में लोग अपने घरों में आराम करने को प्राथमिकता देते हैं। उस उम्र के दौर में लालचंद ने खेलों को अपनी रोजमर्रा की दिनचर्या का मुख्य हिस्सा बना लिया। लालचंद के नाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं में करीब 200 पदक दर्ज हैं। इनमें से करीब 150 अकेले स्वर्ण पदक शामिल हैं, जबकि उन्होंने 30 सिल्वर और 20 ब्रॉन्ज मेडल भी अपने नाम किए हैं। उनका साफ तौर पर यह कहना है कि शरीर को सक्रिय रखने के लिए बढ़ती हुई उम्र कभी भी बाधा नहीं बननी चाहिए। अगर इंसान का नियमित अभ्यास हो, अनुशासन हो और अपने लक्ष्य के प्रति पूरा समर्पण हो तो वह बढ़ती उम्र में भी अपनी एक अलग पहचान बना सकता है। उनकी इस कड़ी मेहनत का सकारात्मक परिणाम हरियाणा मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में साफ देखने को मिला था। लालचंद के जीवन की सबसे खास बात यह है कि खेलों में उनकी सक्रियता सेवानिवृत्ति के बाद और अधिक तेजी से बढ़ी है। सैन्य सेवा और अपनी नौकरी के इतने लंबे सफर के बाद उन्होंने अपने खाली समय को आराम में बिताने के बजाय खेल के मैदान को चुना। उम्र के साथ उनकी शारीरिक चुनौतियां जरूर बढ़ीं, लेकिन उन्होंने अपना नियमित अभ्यास कभी बंद नहीं किया। यही मुख्य कारण है कि आज 85 वर्ष की अधिक उम्र में भी वे दौड़, गोला फैंक और हैमर थ्रो जैसी कठिन स्पर्धाओं में लगातार पदक हासिल कर रहे हैं।