Form 6 भरना गैरकानूनी है” या “चुनाव आयोग ने गैरकानूनी काम किया

SIR पर पूर्व CEC एस.वाई. कुरैशी का बड़ा सवाल—हटाए गए मतदाता Form 6 कैसे भरें?
सारांश:
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के बाद मतदाता सूची से बाहर रह गए पात्र लोगों को फिर से जोड़ने के लिए चुनाव आयोग ने 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष अभियान शुरू करने का निर्देश दिया है। इसके लिए Form 6 का इस्तेमाल किया जाना है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने सवाल उठाया है कि जब Form 6 मूल रूप से नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए है, तो पहले से मतदाता रहे और SIR में नाम हटे लोगों से यही फॉर्म कैसे भरवाया जा सकता है।
नई दिल्ली/03 अक्टूबर 2026 /अटल हिन्द न्यूज़ रिसोर्स
मतदाता सूची में नाम होना किसी नागरिक के लिए केवल एक प्रशासनिक रिकॉर्ड नहीं है। यही नाम चुनाव के दिन उसके मताधिकार के इस्तेमाल का आधार बनता है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति का नाम विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के दौरान पुरानी मतदाता सूची से बाहर हो जाता है और बाद में उसे दोबारा जोड़ने के लिए Form 6 भरने को कहा जाता है, तो उस प्रक्रिया की कानूनी स्थिति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसी मुद्दे को लेकर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने चुनाव आयोग की नई व्यवस्था पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि Form 6 नए मतदाताओं के लिए है और पहले से मतदाता रह चुके व्यक्ति, जिसका नाम SIR के दौरान हट गया है, को इसे भरने के लिए कहना कानूनी समस्या पैदा कर सकता है। दूसरी ओर चुनाव आयोग के अधिकारियों ने नियमों का हवाला देते हुए कहा है कि मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के दावे के लिए Form 6 ही निर्धारित माध्यम है।
SIR के बाद 20 राज्यों में विशेष अभियान
चुनाव आयोग ने 29 सितंबर 2026 को राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को निर्देश दिया था कि जिन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR पूरा हो चुका है, वहां उन पात्र मतदाताओं की पहचान के लिए विशेष अभियान चलाया जाए जो नई मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं। 1 अक्टूबर को मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के साथ हुई वीडियो कॉन्फ्रेंस में भी इस निर्देश को दोहराया गया।
इस अभियान के तहत बूथ लेवल अधिकारियों यानी BLO को SIR से पहले की मतदाता सूची और SIR के बाद तैयार सूची की तुलना करने के लिए कहा गया है। जिन लोगों का नाम पहले की सूची में था लेकिन नई सूची में नहीं है, उनकी पहचान कर घर-घर जाकर उनकी मौजूदा स्थिति की जानकारी लेने और पात्र पाए जाने पर नामांकन की सुविधा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है।
यही वह व्यवस्था है जिसके तहत Form 6 को दोबारा नाम शामिल कराने के रास्ते के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। चुनाव आयोग की ओर से इसे पात्र मतदाताओं को फिर से मतदाता सूची में शामिल करने की प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है।
एस.वाई. कुरैशी ने क्या सवाल उठाया?
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने 2 अक्टूबर को चुनाव आयोग के इस विशेष अभियान पर सवाल उठाते हुए कहा कि Form 6 नए मतदाताओं के लिए है और इसे पहले से मतदाता रहे तथा बाद में सूची से हटाए गए व्यक्ति पर लागू नहीं किया जाना चाहिए।
कुरैशी ने सोशल मीडिया पर चुनाव आयोग के निर्देश को साझा करते हुए यह आपत्ति जताई कि जिन लोगों को Form 6 भरने के लिए मजबूर किया गया है, उनके सामने गलत घोषणा करने का कानूनी जोखिम पैदा हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति में संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठता है।
हालांकि, कुरैशी की इस व्याख्या के साथ चुनाव आयोग की अपनी कानूनी व्याख्या भी सामने आई है। इसलिए पूरे विवाद को केवल “Form 6 भरना गैरकानूनी है” कहकर समाप्त करना सही नहीं होगा।
असल विवाद यह है कि Form 6 का इस्तेमाल पहले से मतदाता रहे लेकिन SIR के बाद सूची से बाहर हुए व्यक्ति को दोबारा शामिल करने के लिए किस कानूनी आधार पर किया जा सकता है।
चुनाव आयोग का जवाब क्या है?
चुनाव आयोग के अधिकारियों ने कुरैशी की आपत्ति से अलग व्याख्या दी है। आयोग के अनुसार Registration of Electors Rules, 1960 के Rule 13(1) के तहत मतदाता सूची में किसी नाम को शामिल कराने का दावा Form 6 में किया जाता है।
3 अक्टूबर को प्रकाशित एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग के अधिकारियों के हवाले से बताया गया कि Rule 13(1) के अनुसार मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का दावा Form 6 में किया जाना है और इसे वह व्यक्ति हस्ताक्षरित करता है जो अपना नाम सूची में शामिल कराना चाहता है।
आयोग की ओर से यह भी कहा गया है कि SIR के बाद यदि कोई व्यक्ति पात्र है और उसका नाम नई मतदाता सूची में शामिल नहीं है, तो उसे Form 6 के माध्यम से फिर से सूची में शामिल किया जा सकता है।
यानी आयोग का तर्क यह है कि Form 6 केवल उस व्यक्ति के लिए सीमित नहीं है जिसने जीवन में कभी मतदाता सूची में नाम नहीं देखा हो। आयोग इसे मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के दावे का निर्धारित फॉर्म मानता है।
यहीं से पूर्व CEC और वर्तमान चुनाव आयोग की व्याख्या में अंतर दिखाई देता है।
Form 6 को लेकर भ्रम क्यों पैदा हुआ?
Form 6 को लेकर विवाद का एक दूसरा पहलू भी है। SIR की प्रक्रिया के दौरान ऑनलाइन Form 6 में एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी। इस अतिरिक्त हिस्से में आवेदक से उसके या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पुराने SIR मतदाता रिकॉर्ड से संबंधित जानकारी मांगी जा रही थी।
इस बदलाव को लेकर चुनाव आयोग के भीतर भी आपत्तियां सामने आई थीं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने Form 6 में किए गए बदलाव पर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, उनका तर्क था कि वैधानिक फॉर्म में इस तरह का बदलाव निर्धारित नियमों के अनुसार होना चाहिए।
26 सितंबर को चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि SIR पूरी हो चुके क्षेत्रों में गैर-SIR अवधि के दौरान Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित फॉर्म इस्तेमाल किए जाएंगे। इसके बाद 30 सितंबर को SIR पूरी हो चुके राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ऑनलाइन Form 6 से अतिरिक्त SIR घोषणा को हटा दिया गया।
इस बदलाव के बाद अब विवाद का केंद्र अतिरिक्त SIR घोषणा से हटकर यह सवाल बन गया है कि SIR में नाम छूटे पुराने मतदाताओं की पुनः-नामांकन प्रक्रिया में Form 6 की कानूनी भूमिका क्या है।
धारा 31 का सवाल क्यों महत्वपूर्ण है?
पूर्व CEC एस.वाई. कुरैशी की आपत्ति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा Representation of the People Act, 1950 की धारा 31 से जुड़ा है।
धारा 31 गलत घोषणा से संबंधित है। कानून के अनुसार यदि कोई व्यक्ति मतदाता सूची की तैयारी, पुनरीक्षण या सुधार अथवा किसी नाम को सूची में शामिल करने या बाहर करने से संबंधित कोई लिखित बयान या घोषणा करता है और वह बयान गलत है तथा व्यक्ति उसे गलत जानता है या गलत मानता है, तो उसे एक वर्ष तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि Form 6 भरने वाला हर व्यक्ति अपराध कर रहा है। धारा 31 में जानबूझकर गलत या सत्य न मानी जाने वाली घोषणा का तत्व महत्वपूर्ण है। इसलिए किसी व्यक्ति पर केवल Form 6 भरने के आधार पर अपराध का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।
वास्तविक सवाल यह है कि Form 6 में संबंधित व्यक्ति से कौन-सी घोषणा ली जा रही है और क्या वह घोषणा उसके वास्तविक मामले पर लागू होती है।
“पहली बार मतदाता” और “नाम दोबारा जोड़ना” में फर्क
पूरे विवाद को समझने के लिए एक सामान्य मतदाता की स्थिति पर विचार करना जरूरी है।
मान लीजिए कोई व्यक्ति 2010 से मतदाता सूची में दर्ज है। वह 2014, 2019 और 2024 में मतदान भी कर चुका है। SIR के बाद जब वह नई मतदाता सूची देखता है तो उसका नाम उसमें नहीं मिलता।
ऐसे व्यक्ति का दावा यह नहीं होगा कि वह पहली बार मतदाता बन रहा है। उसका दावा होगा कि वह पहले से मतदाता था और उसका नाम नई सूची में क्यों नहीं है।
यहीं पर Form 6 को लेकर सवाल पैदा होता है।

यदि Form 6 केवल नए मतदाता के रूप में आवेदन करने के अर्थ में लिया जाए तो कुरैशी की आपत्ति महत्वपूर्ण दिखाई देती है। लेकिन यदि नियमों के तहत इसे मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के दावे के रूप में देखा जाए, तो चुनाव आयोग की व्याख्या सामने आती है।
इसलिए अंतिम कानूनी स्थिति केवल फॉर्म के शीर्षक को देखकर तय नहीं की जा सकती। इसके लिए Form 6 की सटीक भाषा, Registration of Electors Rules, 1960 और SIR के लिए जारी निर्देशों को साथ पढ़ना होगा।
चुनाव आयोग ने अब क्या व्यवस्था बनाई है?
2 अक्टूबर की रिपोर्टों के अनुसार चुनाव आयोग ने SIR पूरी हो चुके 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया है। इसका उद्देश्य केवल नए मतदाताओं को जोड़ना नहीं, बल्कि उन पात्र लोगों को भी सूची में शामिल करना है जो SIR के बाद मतदाता सूची से छूट गए हैं।
इस अभियान में BLO को पुराने और नए रिकॉर्ड की तुलना करने को कहा गया है। इसके बाद चिन्हित लोगों से संपर्क कर उनकी वर्तमान स्थिति की जांच की जाएगी और पात्र पाए जाने पर नाम शामिल कराने की प्रक्रिया में मदद की जाएगी।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना है, लेकिन इसके साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि कोई पात्र मतदाता केवल प्रशासनिक प्रक्रिया या दस्तावेजी कमी के कारण मतदान के अधिकार से बाहर न हो।
विवाद का केंद्र अब क्या है?
इस पूरे मामले में तीन अलग-अलग बातें एक साथ जुड़ गई हैं।
पहली बात, SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटने की प्रक्रिया।
दूसरी बात, SIR के बाद छूटे पात्र मतदाताओं को वापस जोड़ने की प्रक्रिया।
तीसरी बात, उस प्रक्रिया के लिए Form 6 का इस्तेमाल और उसमें की जाने वाली घोषणा।
पहली और दूसरी प्रक्रिया पर राजनीतिक तथा कानूनी बहस अलग हो सकती है। लेकिन तीसरा सवाल पूरी तरह प्रक्रियात्मक और कानूनी है—क्या पहले से मतदाता रह चुके व्यक्ति को Form 6 के माध्यम से दोबारा शामिल करना नियमों के अनुरूप है और यदि हां, तो उस व्यक्ति से किस प्रकार की घोषणा ली जानी चाहिए?
चुनाव आयोग कह रहा है कि Rule 13(1) के तहत नाम शामिल कराने का दावा Form 6 में किया जाता है। वहीं कुरैशी का सवाल है कि पुराने मतदाता को नए मतदाता के फॉर्म से दोबारा जोड़ना उचित कैसे माना जा सकता है।
आम मतदाता के लिए इसका क्या मतलब है?
किसी भी नागरिक के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि उसका नाम मतदाता सूची में नहीं है, तो वह केवल राजनीतिक बहस का हिस्सा बनकर न रह जाए।
उसे पहले यह जांचना चाहिए कि उसका नाम वर्तमान मतदाता सूची में मौजूद है या नहीं। यदि नाम नहीं है और वह पात्र है, तो निर्वाचन अधिकारियों द्वारा उपलब्ध कराई गई दावा और नामांकन प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जा सकता है।
SIR पूरी हो चुके राज्यों में चुनाव आयोग का नया विशेष अभियान इसी उद्देश्य से बताया गया है कि ऐसे लोगों की पहचान की जाए जो पात्र होने के बावजूद सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं।
इस प्रक्रिया में स्थानीय BLO और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
क्या यह केवल राजनीतिक विवाद है?
यह मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। इसमें चुनावी कानून, मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिक के मताधिकार—तीनों जुड़े हुए हैं।
एक तरफ चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित या अपात्र लोगों के नामों को नियमों के अनुसार ठीक किया जाए। दूसरी तरफ उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी यह है कि पात्र नागरिक का नाम गलती से बाहर न रह जाए।
यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से हट गया है, तो उसे दोबारा शामिल करने की प्रक्रिया स्पष्ट, सरल और कानूनी रूप से सुरक्षित होनी चाहिए।
यही कारण है कि Form 6 पर उठे सवाल को केवल राजनीतिक आरोप मानकर नजरअंदाज करने के बजाय नियमों के आधार पर समझना जरूरी है।
आगे क्या होगा?
अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि चुनाव आयोग पुराने मतदाताओं के पुनः-नामांकन और नए मतदाताओं के पंजीकरण के बीच प्रक्रिया को कितना स्पष्ट करता है।
विशेष रूप से यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है कि SIR में पहले से दर्ज लेकिन बाद में सूची से बाहर हुए पात्र मतदाता के मामले में Form 6 किस कानूनी प्रावधान के तहत लागू होगा और उस व्यक्ति से कौन-सी घोषणा ली जाएगी।
दूसरी ओर, यदि आयोग का कहना है कि Rule 13(1) Form 6 को हर उस व्यक्ति के लिए लागू करता है जो मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का दावा करता है, तो इस व्याख्या को स्पष्ट रूप से सार्वजनिक करना भी विवाद को कम कर सकता है।
इससे आम मतदाता को भी पता चलेगा कि उसे कौन-सा फॉर्म भरना है और उसे किसी ऐसी घोषणा को लेकर भ्रम नहीं रहेगा जो उसके वास्तविक मामले पर लागू नहीं होती।
सवाल सिर्फ Form 6 का नहीं, मतदाता के भरोसे का है
SIR और Form 6 को लेकर उठा विवाद भारत की चुनावी व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण सवाल को सामने लाता है—मतदाता सूची से नाम हटने के बाद पात्र नागरिक को वापस सूची में शामिल कराने का रास्ता कितना स्पष्ट और कानूनी रूप से सुरक्षित है?
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने Form 6 को लेकर गंभीर कानूनी आपत्ति उठाई है। उनका कहना है कि यह फॉर्म नए मतदाताओं के लिए है और पहले से मतदाता रहे तथा SIR में नाम हटे लोगों के लिए इसका इस्तेमाल सवाल खड़ा करता है।
दूसरी ओर चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि Registration of Electors Rules, 1960 के Rule 13(1) के तहत मतदाता सूची में नाम शामिल कराने का दावा Form 6 में किया जाता है और इसी आधार पर SIR के बाद छूटे पात्र मतदाताओं को भी इस प्रक्रिया के माध्यम से जोड़ा जा सकता है।
इसलिए इस समय सबसे सुरक्षित और तथ्यपरक निष्कर्ष यही है कि Form 6 के इस्तेमाल को लेकर पूर्व CEC और चुनाव आयोग की कानूनी व्याख्याएं अलग हैं। अंतिम बात इस पर निर्भर करेगी कि संबंधित नियमों और SIR के निर्देशों की कानूनी व्याख्या किस तरह की जाती है।
लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुद्धता जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी यह सुनिश्चित करना भी है कि एक भी पात्र नागरिक केवल प्रक्रिया की अस्पष्टता के कारण अपने मताधिकार से वंचित न रह जाए।