श्रीमान गोपालक जी, कभी गाय चराई है? मंच बनाम जमीनी हकीकत

श्रीमान गोपालक जी, कभी गाय चराई है?*
भोपाल के भेल दशहरा मैदान में आज राज्य स्तरीय गोपालक सम्मेलन हुआ। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह इसमें शामिल हुए। सरकार की ओर से इसे प्रदेश में दुग्ध उत्पादन, पशुपालन और सहकारिता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण आयोजन बताया गया है। सम्मेलन में 35 हजार से अधिक गोपालकों और दुग्ध सहकारी समितियों से जुड़े सदस्यों के शामिल होने की बात कही गई है।
कार्यक्रम में डेयरी और पशुपालन से जुड़ी घोषणाएं भी हुईं। उज्जैन में 255 करोड़ रुपये की लागत वाले डेयरी प्लांट का भूमिपूजन और गोपालकों तथा गौशालाओं के लिए 101 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता की घोषणा की गई।
लेकिन इस पूरे भव्य आयोजन के बीच पत्रकारिता का काम सिर्फ तालियां गिनना नहीं है। सवाल पूछना भी है। और आज सवाल बहुत छोटा है।

श्रीमान गोपालक जी, क्या कभी गाय चराई है?
यह सवाल किसी व्यक्ति का अपमान करने के लिए नहीं है। यह सवाल उस शब्द की गरिमा को समझने के लिए है, जिसे आज मंचों पर बड़े सम्मान के साथ इस्तेमाल किया जा रहा है गोपालक।
गोपालक होना कोई सरकारी प्रमाणपत्र नहीं है। गोपालक होना कोई राजनीतिक विशेषण भी नहीं है। गोपालक होना एक जीवन-पद्धति है।
जिसने सुबह उठकर सबसे पहले अपने पशु को देखा हो, जिसने उसके लिए चारा जुटाया हो, जिसने पानी की व्यवस्था की हो, जिसने बीमारी में रातभर उसके पास बैठकर उसकी सेवा की हो, जिसने धूप में उसे चराया हो और बारिश में उसके लिए छत ढूंढी ह उससे पूछिए गोपालक क्या होता है।गोपालक वह है जो अपने पशु की सुरक्षा की चिंता अपने आराम से पहले करता है।
वह गाय को सिर्फ दूध देने वाली मशीन नहीं समझता। उसके लिए गाय उसकी अर्थव्यवस्था है, उसकी आजीविका है, उसके परिवार का हिस्सा है। इसलिए किसी व्यक्ति को मंच से गोपालक कह देना और वास्तविक गोपालक के जीवन को समझना दो अलग बातें हैं।
आज राजनीति में शब्दों का भी उत्सव होता है। किसान सम्मेलन, मजदूर सम्मेलन, युवा सम्मेलन, महिला सम्मेलन और गोपालक सम्मेलन। मंच सजता है, हजारों लोग आते हैं, भाषण होते हैं, घोषणाएं होती हैं और तालियां बजती हैं।
लेकिन सम्मेलन समाप्त होने के बाद असली गोपालक अपने गांव लौट जाता है।
वह फिर वही सवाल लेकर खड़ा होता है—चारा कितना महंगा हो गया? पशु का इलाज कहां होगा? दूध का उचित दाम कौन देगा? पशु बीमार पड़ गया तो सरकारी पशु चिकित्सक समय पर आएगा या नहीं? सड़क पर घूमते आवारा पशु से फसल बचाएंगे कैसे? बूढ़ी गाय का क्या होगा? दूध देना बंद कर चुकी गाय का खर्च कौन उठाएगा?
यही असली गोपालक की दुनिया है।
मंच पर खड़े होकर गोपालक की बात करना आसान है, लेकिन एक परिवार की अर्थव्यवस्था को दो गायों के भरोसे चलाना आसान नहीं है। और यहीं से सरकार से असली सवाल शुरू होता है।
अगर प्रदेश में गोपालकों का इतना बड़ा सम्मेलन हो सकता है, तो सरकार को यह भी बताना चाहिए कि मध्यप्रदेश में वास्तविक गोपालकों की संख्या कितनी है? कितने पशुपालक नियमित रूप से दुग्ध सहकारी समितियों से जुड़े हैं? कितने गोपालकों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिला? कितने पशुओं का बीमा हुआ? कितने पशुओं का इलाज सरकारी व्यवस्था से हुआ? कितनी गौशालाएं वास्तव में चल रही हैं और कितनी केवल कागज पर हैं? सम्मेलन में कितने लोग आए, इसका आंकड़ा भी सरकार सार्वजनिक करे।
क्योंकि भीड़ और गोपालक में अंतर होता है।
सरकार यदि कहती है कि 35 हजार से अधिक गोपालक सम्मेलन में पहुंचे, तो यह आंकड़ा स्वागत योग्य है। लेकिन जनता यह भी जानना चाहती है कि उनमें वास्तविक गोपालक कितने थे और दुग्ध सहकारी समितियों के सदस्य कितने थे। यह जानकारी सार्वजनिक होगी तो सम्मेलन की तस्वीर और स्पष्ट होगी। गोपालक के नाम पर राजनीति नहीं, गोपालक के जीवन पर नीति चाहिए।
यह फर्क समझना होगा।
गोपालक को मंच पर सम्मानित कर देना अच्छी बात है, लेकिन उसकी रोजमर्रा की समस्या का समाधान उससे कहीं बड़ी बात है।
गोपालक को माला नहीं, उचित दूध मूल्य चाहिए। गोपालक को भाषण नहीं, पशु चिकित्सा की उपलब्धता चाहिए।
गोपालक को फोटो नहीं, चारे की व्यवस्था चाहिए। गोपालक को घोषणा नहीं, भुगतान समय पर चाहिए गोपालक को सिर्फ सम्मेलन नहीं, ऐसी नीति चाहिए जिससे पशुपालन घाटे का सौदा न बने।
और सबसे बड़ी बात गोपालक को यह भरोसा चाहिए कि जिस पशु को वह अपने परिवार की तरह पालता है, उसकी जिम्मेदारी अकेले उसके कंधे पर नहीं छोड़ी जाएगी।
आज मंच से किसी को गोपालक कहा गया। ठीक है। लेकिन गोपालक शब्द इतना हल्का भी नहीं कि किसी राजनीतिक संबोधन में उसे आसानी से इस्तेमाल कर दिया जाए।
गोपालक वह नहीं जो केवल गाय का नाम जानता हो। गोपालक वह है जो गाय की जरूरत समझता हो। गोपालक वह नहीं जो गाय पर भाषण दे। गोपालक वह है जो गाय के लिए सुबह उठे।
गोपालक वह नहीं जो तस्वीर में गाय के साथ खड़ा दिखाई दे। गोपालक वह है जो गाय बीमार पड़े तो रात में उठकर उसके लिए डॉक्टर ढूंढे। गोपालक वह नहीं जिसकी पहचान मंच पर तय हो। गोपालक वह है जिसकी पहचान उसके श्रम से होती है।
इसलिए सवाल व्यक्तिगत नहीं है। सवाल व्यवस्था और शब्द की गरिमा का है।और पत्रकार का काम यही है कि जहां हजारों लोग तालियां बजा रहे हों, वहां वह एक सवाल पूछे।
आज वह सवाल है
श्रीमान गोपालक जी, कभी गाय चराई है?
अगर हां, तो उस अनुभव को प्रदेश की पशुपालन नीति में दिखाई देना चाहिए। अगर नहीं, तो कम से कम उन लोगों की आवाज जरूर सुनिए जिन्होंने पूरी जिंदगी गाय चराते हुए गुजारी है।
क्योंकि असली गोपालक को किसी मंच से प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं होती। उसके पैरों की धूल, उसके हाथों की मेहनत और उसके पशुओं की आवाज ही उसका परिचय है।
गोपालक सम्मेलन तभी सार्थक होगा, जब सम्मेलन खत्म होने के बाद भी गोपालक के घर का चूल्हा थोड़ा बेहतर जले, उसके पशु ज्यादा सुरक्षित हों और उसकी मेहनत की कीमत उसे मिले। वरना मंच बदलते रहेंगे, बैनर बदलते रहेंगे, भाषण बदलते रहेंगे और शब्द भी बदलते रहेंगे।
लेकिन गांव का गोपालक वहीं खड़ा रहेगा सुबह हाथ में रस्सी लिए, सामने अपनी गाय लिए और सरकार से एक ही सवाल पूछता हुआ मेरी मेहनत की कीमत कब मिलेगी?

राजेन्द्र सिंह जादौन