राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 100 साल: कैसे बदला संघ का सफर?

Atal Hind Team Online26 September 20267 min read16 viewsलेख
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 100 साल: कैसे बदला संघ का सफर?

स्थापना से वर्तमान तक समाज और राष्ट्र सेवा का अतुलनीय समर्पण भाव लिए है : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

लेखक --सुनील कुमार वाजपेयी शिवम्

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल एक संगठन नहीं, यह एक विचार है, एक साधना है, एक जीवन पद्धति है। यह विचार है भारत माता को परम वैभव पर पहुंचाने का, यह साधना है व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की और यह जीवन पद्धति है स्वार्थ से ऊपर उठकर समर्पण की। संघ के सौ वर्ष की यात्रा को देखेंगे तो एक बात स्पष्ट होती है कि इस संगठन ने सत्ता की आकांक्षा कभी नहीं की, केवल सेवा को ही अपना धर्म माना।

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सन् उन्नीस सौ पच्चीस का समय था। देश पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा था। समाज जाति, पंथ, भाषा और वर्ग में बंटा हुआ था। विदेशी शासन ने फूट डालो और राज करो की नीति से समाज को तोड़ दिया था। ऐसे समय में नागपुर में एक चिकित्सक, जिनका हृदय राष्ट्रभक्ति से भरा था, उन्होंने चिंतन किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से कुछ नहीं होगा, जब तक समाज संगठित नहीं होगा, शक्तिशाली नहीं होगा, तब तक स्वतंत्रता टिकेगी नहीं। उन महापुरुष का नाम था डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार।

उन्होंने विजयादशमी के दिन सन उन्नीस सौ पच्चीस को नागपुर के मोहिते वाड़ा में कुछ बालकों और युवकों को एकत्र कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। विजयादशमी का दिन प्रतीक था, असत्य पर सत्य की विजय, बुराई पर अच्छाई की विजय। संघ की पहली शाखा वहीं से प्रारंभ हुई। कोई कार्यालय नहीं, कोई धन नहीं, कोई प्रचार नहीं, केवल एक भगवा ध्वज और राष्ट्र के प्रति निस्वार्थ प्रेम।

डॉक्टर हेडगेवार ने कहा था, हमारा कार्य व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ना है। जैसे माला में मनके बिखरे होते हैं, उन्हें धागा जोड़ता है, वैसे ही संघ समाज को जोड़ने वाला धागा बनेगा। उन्होंने स्वयंसेवकों को सिखाया कि राष्ट्र ही देवता है, उसकी सेवा ही पूजा है।प्रारंभ में लोगों ने संघ को समझा नहीं। कुछ ने कहा यह तो बच्चों का खेल है, जो मैदान में लाठी घुमाते हैं। परंतु डॉक्टर हेडगेवार का दृष्टिकोण बहुत दूर का था। वे जानते थे कि बड़ा वटवृक्ष बनने के लिए पहले बीज को भूमि में गहरा जाना पड़ता है।

संघ की दैनिक शाखा पद्धति बनी। प्रातः या सायं एक घंटा, एक स्थान पर, भगवा ध्वज के सामने, सभी स्वयंसेवक एकत्र होते। शारीरिक अभ्यास, खेल, देशभक्ति गीत, बौद्धिक चर्चा और प्रार्थना। इस एक घंटे में जाति मिट जाती, ऊंच-नीच मिट जाता, केवल हम सब एक हैं, हम सब भारत माता के पुत्र हैं, यही भाव रहता। डॉक्टर हेडगेवार के बाद सन् उन्नीस सौ चालीस में माधव सदाशिव गोलवलकर, जिन्हें सब पूजनीय गुरुजी कहते थे, संघ के द्वितीय सरसंघचालक बने।

गुरुजी ने संघ को अखिल भारतीय रूप दिया। उन्होंने कश्मीर से कन्याकुमारी तक और अटक से कटक तक संघ की शाखाओं का विस्तार किया। उनके समय में ही संघ ने समाज सेवा को व्यवस्थित रूप दिया। संघ के समर्पण भाव की परीक्षा बार-बार हुई और संघ हर बार खरा उतरा। सन् उन्नीस सौ सैंतालीस में देश विभाजन की विभीषिका हुई। लाखों लोग विस्थापित होकर भारत आए। उस समय सरकार के संसाधन कम थे। तब संघ के स्वयंसेवकों ने सीमा पर जाकर शरणार्थियों की सहायता की, उनके लिए भोजन, वस्त्र और आवास की व्यवस्था की, उन्हें सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया। कई स्वयंसेवकों ने अपने प्राण भी दिए।

सन उन्नीस सौ बासठ में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो संघ के स्वयंसेवकों ने सेना की सहायता की। उन्होंने रक्तदान किया, यातायात व्यवस्था संभाली और सीमा क्षेत्रों में रसद पहुंचाई। तत्कालीन प्रधानमंत्री ने स्वयं गणतंत्र दिवस की परेड में संघ को आमंत्रित कर उसके कार्य की सराहना की। सन उन्नीस सौ पैंसठ और उन्नीस सौ इकहत्तर के युद्ध में भी स्वयंसेवकों ने यही भाव दिखाया।देश में जब भी कोई बड़ी आपदा आई। चाहे भूकंप हो, बाढ़ हो, सूखा हो या महामारी हो, संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले सेवा में पहुंचते हैं।

केरल की बाढ़, गुजरात का भूकंप, उत्तराखंड की बाढ़, चेन्नई की बाढ़, कोरोना महामारी - इन सभी में संघ के स्वयंसेवकों ने बिना किसी प्रचार के, बिना किसी भेदभाव के सेवा की। कोरोना काल में जब लोग घरों में बंद थे, तब स्वयंसेवक घर-घर जाकर भोजन, दवा और प्राणवायु की व्यवस्था कर रहे थे। लाखों परिवारों तक राशन पहुंचाया गया। यह सेवा किसी सत्ता के आदेश से नहीं, हृदय के भाव से होती है। संघ ने सदैव माना है कि हिंदू समाज एक है। जाति व्यवस्था समाज का कोढ़ है, इसे समाप्त करना होगा।

इसके लिए संघ ने सामाजिक समरसता का कार्यक्रम प्रारंभ किया। संघ की शाखा में कोई भी स्वयंसेवक अपनी जाति नहीं बताता। सभी एक ही पंक्ति में बैठते हैं, एक साथ भोजन करते हैं, एक साथ जल पीते हैं। संघ के प्रयास से कई स्थानों पर मंदिरों में सभी वर्गों के प्रवेश के लिए आंदोलन हुए। संघ ने वनवासी क्षेत्रों में विशेष कार्य किया। वनवासी बंधु हमारे ही भाई हैं, वे ही इस धरती के मूल निवासी हैं। उनके बीच शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वावलंबन के लिए संघ से प्रेरित संगठनों ने कार्य किया। एकल विद्यालय, छात्रावास और चिकित्सालय चलाए जा रहे हैं। संघ ने कुटीर उद्योग, ग्राम विकास और स्वदेशी के लिए भी कार्य किया।

संघ के प्रेरणा से सेवा भारती, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विश्व हिंदू परिषद जैसे अनेक संगठन बने, जो समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सेवा कर रहे हैं। आज संघ से प्रेरित पचास से अधिक संगठन समाज में कार्यरत हैं, जो शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा, सुरक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। संघ ने सदैव कहा कि भारत केवल एक भूभाग नहीं, यह एक संस्कृति है। इस संस्कृति का मूल सनातन धर्म है, जो सर्वे भवंतु सुखिनः का संदेश देता है। संघ ने इसी राष्ट्रबोध को जगाने का कार्य किया।

स्वतंत्रता के बाद जब देश में पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव बढ़ने लगा, तब संघ ने अपने त्योहारों, अपनी भाषा, अपने महापुरुषों के प्रति गौरव का भाव जगाया। गुरु पूर्णिमा, विजयादशमी, मकर संक्रांति जैसे उत्सवों को समाज में व्यापक रूप से मनाने की परंपरा संघ ने ही प्रारंभ की। संघ ने इतिहास के गौरव को भी सामने रखा। छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, रानी लक्ष्मीबाई जैसे महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेने की सीख दी। आज संघ अपने स्थापना के सौ वर्ष पूरे करने जा रहा है।

आज देश के लगभग हर जिले में, हर खंड में संघ की शाखा लगती है। साठ हजार से अधिक स्थानों पर दैनिक शाखा और बीस हजार से अधिक स्थानों पर साप्ताहिक मंडली लगती है। लाखों स्वयंसेवक प्रतिदिन एक घंटा राष्ट्र के लिए देते हैं। आज संघ का कार्य विदेशों में भी फैला है। हिंदू स्वयंसेवक संघ के नाम से विश्व के चालीस से अधिक देशों में भारतीय संस्कृति का कार्य हो रहा है। आज के सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने संघ को नए युग के अनुरूप नया आयाम दिया है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, जैविक खेती, कुटुंब प्रबोधन और सामाजिक समरसता के पंच परिवर्तन का मंत्र दिया है।

संघ अब केवल शाखा तक सीमित नहीं, समाज के प्रत्येक परिवार तक पहुंचने का प्रयास कर रहा है। संघ के समर्पण भाव का मूल मंत्र है , अपना कार्य औरों के लिए। स्वयंसेवक अपने लिए कुछ नहीं मांगता। वह जो भी करता है, समाज के लिए करता है। संघ में कोई सदस्यता शुल्क नहीं, कोई सदस्यता पंजिका नहीं। जो शाखा में आता है, वही स्वयंसेवक है। गुरु दक्षिणा के रूप में स्वयंसेवक अपनी क्षमता के अनुसार धन देता है, वह भी गुप्त रूप से, बिना नाम के। संघ में सत्ता का कोई आकर्षण नहीं।

सरसंघचालक से लेकर सामान्य स्वयंसेवक तक सभी एक समान हैं। सभी जमीन पर बैठते हैं, सभी एक ही भोजन करते हैं। यही समता संघ की शक्ति है। सौ वर्ष की यात्रा में संघ ने सिद्ध किया है कि बिना किसी बाहरी चमक-दमक के, बिना किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के, केवल निस्वार्थ सेवा और संगठन के बल पर समाज को बदला जा सकता है। संघ ने देश को लाखों समर्पित कार्यकर्ता दिए हैं जो समाज के हर क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं।

आज जब देश नई ऊंचाइयों को छू रहा है, तब संघ का यह विचार और अधिक प्रासंगिक हो गया है कि व्यक्ति का निर्माण ही राष्ट्र का निर्माण है। यदि व्यक्ति चरित्रवान होगा, अनुशासित होगा, त्यागी होगा, तो राष्ट्र भी वैसा ही बनेगा।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सौ वर्ष का इतिहास त्याग, तपस्या और समर्पण का इतिहास है। यह इतिहास हमें सिखाता है कि राष्ट्र सेवा ही ईश्वर सेवा है और इसी सेवा में जीवन की सार्थकता है।

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