क्या विपक्ष का सवाल पूछना गलत? विप्लब देव के बयान पर तीखा सच

सवाल विपक्ष का काम है, हिसाब सत्ता को देना है*
मध्यप्रदेश के नवनियुक्त भाजपा प्रभारी विप्लब कुमार देब ने राहुल गांधी से कांग्रेस शासनकाल का हिसाब मांगा है। इस बयान के बाद लोकतंत्र में सत्ता की जवाबदेही और विपक्ष की मौलिक भूमिका को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। जानिए क्यों इतिहास का हवाला देकर वर्तमान के बुनियादी सवालों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
क्या विपक्ष का सवाल पूछना गलत है? विप्लब देव के बयान, राहुल गांधी और लोकतंत्र का कड़वा सच
मध्यप्रदेश के नवनियुक्त भाजपा प्रभारी विप्लब कुमार देब ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को लेकर कहा है कि राहुल गांधी सिर्फ सरकार से सवाल न करें, बल्कि कांग्रेस शासनकाल का हिसाब भी दें। बयान राजनीति में नया नहीं है। सत्ता पक्ष अक्सर विपक्ष से उसके पुराने कार्यकाल का हिसाब मांगता है और विपक्ष सत्ता से उसके वर्तमान कार्यकाल का। लेकिन इस पूरे विवाद में एक बुनियादी बात समझने की जरूरत है—लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष की भूमिकाएं एक जैसी नहीं होतीं।
राहुल गांधी आज सरकार में नहीं हैं। वे विपक्ष की भूमिका में हैं। संसद में विपक्ष के नेता के रूप में उनका प्रमुख दायित्व ही यही है कि वे सरकार से सवाल पूछें, सरकारी नीतियों की आलोचना करें, जनता से जुड़े मुद्दे संसद और सार्वजनिक मंचों पर उठाएं और सरकार से जवाब मांगें। अगर विपक्ष सरकार से सवाल नहीं करेगा तो फिर सरकार से सवाल कौन करेगा?
विप्लब देव जी से एक सीधा सवाल है अगर विपक्ष सरकार से सवाल नहीं करेगा तो क्या सत्ता खुद से सवाल करेगी? क्या सरकार खुद अपने फैसलों की आलोचना करेगी? क्या सरकार खुद से पूछेगी कि बेरोजगारी क्यों है, महंगाई पर जनता की परेशानी क्यों है, किसानों की समस्याएं क्यों बनी हुई हैं, सरकारी अस्पतालों की स्थिति कैसी है, शिक्षा व्यवस्था में क्या कमियां हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ आखिरी व्यक्ति तक क्यों नहीं पहुंच रहा?
लोकतंत्र में विपक्ष कोई सजावटी संस्था नहीं है। विपक्ष सत्ता पर निगरानी रखने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सत्ता पक्ष के पास सरकार चलाने की जिम्मेदारी होती है और विपक्ष के पास सरकार से सवाल पूछने की। दोनों की जिम्मेदारियां अलग हैं। इसलिए विपक्ष के नेता से यह कहना कि पहले अपनी सरकार का हिसाब दो, उसके बाद वर्तमान सरकार से सवाल करना, लोकतांत्रिक भूमिका को उलट देने जैसा तर्क है।
कांग्रेस के शासनकाल का हिसाब चाहिए तो कांग्रेस से मांगिए। उसके नेताओं से सवाल कीजिए। जनता के बीच जाकर बताइए कि कांग्रेस की सरकारों ने क्या किया और क्या नहीं किया। चुनाव में जनता के सामने अपना रिपोर्ट कार्ड रखिए। लेकिन इससे वर्तमान सरकार की जवाबदेही खत्म नहीं हो जाती।
आज देश में सत्ता भारतीय जनता पार्टी के पास है। मध्यप्रदेश में भी भाजपा की सरकार है। इसलिए वर्तमान सरकार से जुड़े सवालों का जवाब भी वर्तमान सरकार को ही देना होगा। जनता यह नहीं कहेगी कि 10, 20 या 30 साल पहले किसकी सरकार थी, इसलिए आज के सवाल का जवाब नहीं मिलेगा। जनता सड़क, बिजली, पानी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसान, महिला सुरक्षा और सरकारी व्यवस्था को लेकर आज सवाल करेगी और आज की सरकार को उसका जवाब देना होगा।
राजनीति में अतीत का हिसाब हमेशा महत्वपूर्ण होता है, लेकिन अतीत वर्तमान की जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता। अगर हर सवाल का जवाब पिछली सरकार के काम गिनाकर दिया जाने लगे तो फिर किसी भी सरकार को अपने पांच साल के काम का हिसाब देने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। सरकार से पूछा जाएगा कि आपने क्या किया और जवाब मिलेगा कि पिछली सरकार ने क्या नहीं किया था। सवाल रोजगार का होगा तो जवाब पिछली सरकार की बेरोजगारी से आएगा। सवाल महंगाई का होगा तो जवाब पिछली सरकार के महंगाई के आंकड़ों से आएगा। सवाल भ्रष्टाचार का होगा तो जवाब पुराने घोटालों से दिया जाएगा। इस तरह वर्तमान सवाल हमेशा अतीत की फाइलों में दबा दिया जाएगा। यही राजनीति का वह रास्ता है जहां जनता का असली सवाल पीछे छूट जाता है।
विप्लब देव जी, आपको कांग्रेस के शासनकाल का हिसाब मांगने का पूरा राजनीतिक अधिकार है। लेकिन उसी तरह विपक्ष को भी आपकी सरकार से सवाल पूछने का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है। सवाल पूछना किसी सरकार के खिलाफ दुश्मनी नहीं है। सवाल लोकतंत्र की ताकत हैं। सरकार को सवाल पसंद आएं या न आएं, लेकिन लोकतंत्र में सवालों से बचने की जगह सवालों का जवाब देना पड़ता है।
पत्रकार सरकार से सवाल पूछता है तो उसका काम सत्ता विरोध करना नहीं होता, बल्कि सत्ता से जवाब मांगना होता है। विपक्ष सरकार से सवाल करता है तो उसका काम भी यही है कि सरकार के फैसलों की जांच-पड़ताल हो और जनता के सामने जवाबदेही तय हो। सरकार को मजबूत सवाल कमजोर नहीं करते, बल्कि जवाबदेह बनाते हैं।
राहुल गांधी कांग्रेस शासनकाल का हिसाब दें या कांग्रेस अपने पुराने फैसलों पर सफाई दे—यह राजनीतिक बहस का विषय हो सकता है। लेकिन राहुल गांधी अगर आज सरकार से सवाल पूछ रहे हैं तो उन्हें यह कहकर नहीं रोका जा सकता कि पहले पुराने शासन का हिसाब दो। अगर ऐसा नियम बना दिया जाए तो कोई भी विपक्ष कभी सवाल नहीं पूछ पाएगा, क्योंकि हर पार्टी के इतिहास में कोई न कोई ऐसा कार्यकाल जरूर रहा है जिस पर सवाल उठाए जा सकते हैं।
और अगर इतिहास की फाइल खोलनी ही है तो फिर फाइल पूरी खोलनी होगी। सिर्फ कांग्रेस के शासनकाल की नहीं, बल्कि हर सरकार के शासनकाल की। कौन-सी सरकार कब सत्ता में रही, उसने क्या वादे किए, कितने पूरे किए, कौन-से फैसले विवादित रहे, किन योजनाओं से जनता को लाभ मिला और किन फैसलों से नुकसान हुआ—हर सरकार का हिसाब जनता के सामने होना चाहिए। लेकिन यह हिसाब चुनाव और राजनीतिक बहस का विषय है, वर्तमान सरकार से वर्तमान सवालों का जवाब देने से बचने का रास्ता नहीं।
लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति सत्ता में बैठा नेता नहीं, बल्कि वह नागरिक है जो सवाल पूछता है। सवाल पूछने वाले को यह नहीं कहा जा सकता कि तुमने पहले यह क्यों नहीं पूछा। यदि आज सवाल है तो आज जवाब देना होगा।
विप्लब देव जी, आप नए प्रभारी हैं। मध्यप्रदेश में भाजपा संगठन की जिम्मेदारी आपके कंधों पर है। आप कांग्रेस से सवाल पूछिए, कांग्रेस शासनकाल की नाकामियां जनता को बताइए, कांग्रेस के पुराने फैसलों पर बहस कीजिए। राजनीतिक मैदान में यह सब लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन जब राहुल गांधी सरकार से सवाल करें तो उनसे यह मत कहिए कि पहले कांग्रेस का हिसाब दो। क्योंकि जिस दिन विपक्ष सवाल पूछना बंद कर देगा, उस दिन सत्ता से जवाब मांगने वाली लोकतांत्रिक आवाज कमजोर हो जाएगी।
एक बात बिल्कुल साफ होनी चाहिए—विपक्ष का काम सवाल करना है और सत्ता का काम जवाब देना है।
आज राहुल गांधी विपक्ष में हैं, इसलिए वे सवाल पूछेंगे। आज केंद्र और मध्यप्रदेश में भाजपा सत्ता में है, इसलिए जवाब भाजपा सरकार को देना होगा। कल परिस्थितियां बदल सकती हैं। सत्ता किसी और के पास होगी और विपक्ष किसी और के पास। तब भी यही लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू रहेगी।
इसलिए मुद्दा राहुल गांधी नहीं हैं। मुद्दा कांग्रेस या भाजपा भी नहीं है। असली मुद्दा यह है कि क्या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं जहां हर सवाल का जवाब पुराने शासन की गलतियों से दिया जाए, या ऐसी राजनीति जहां वर्तमान सरकार अपने वर्तमान काम का हिसाब जनता को दे?
जनता को इतिहास भी जानना है और वर्तमान भी। लेकिन वर्तमान के सवालों को अतीत की गलतियों के पीछे छिपाया नहीं जा सकता।
विप्लब देव जी, कांग्रेस से हिसाब मांगिए, जरूर मांगिए। लेकिन राहुल गांधी से सवाल पूछने का अधिकार मत मांगिए। वह अधिकार विपक्ष को लोकतंत्र ने दिया है।
राहुल गांधी सवाल करेंगे।
विपक्ष सवाल करेगा।
जनता सवाल करेगी।
और सत्ता का काम है जवाब देना।
यही लोकतंत्र है। यही सत्ता की जवाबदेही है। और यही वह व्यवस्था है जिसमें सरकार को यह याद रखना पड़ता है कि पांच साल की कुर्सी स्थायी नहीं होती, लेकिन जनता के सवाल हमेशा रहते हैं।
