पुलिस क्यों कहती है 'थाने चलिए'? जानें अपने अधिकार!

Atal Hind Team Online3 October 20265 min read0 viewsभारत
पुलिस क्यों कहती है 'थाने चलिए'? जानें अपने अधिकार!

धारा पहले, कारण बाद में!

हमारे यहां कानून बड़ा लोकतांत्रिक है। किताब में सब बराबर हैं,पुलिस भी, नागरिक भी, आरोपी भी और संविधान भी। फर्क बस इतना है कि पुलिस के हाथ में कानून की किताब होती है और नागरिक के हाथ में अक्सर अपनी जेब टटोलने की मजबूरी। संविधान कहता है कि गिरफ्तार व्यक्ति को जल्द से जल्द गिरफ्तारी के आधार बताए जाएं। कानून भी यही कहता है। सुप्रीम कोर्ट भी कई बार इसकी अहमियत समझा चुका है। मगर थाने की दुनिया का अपना संविधान है,‘पहले चलिए, बाकी बात वहीं होगी।’ पुलिस दरवाजे पर आए तो नागरिक पूछता है,‘साहब, गलती क्या हुई?’ जवाब,‘थाने चलिए, सब पता चल जाएगा।’ यानी इस देश में अब अपराध का पता लगाने की सुविधा भी थाने पहुंचने के बाद मिलती है! आदमी सोचता है, अगर मैं आरोपी हूं तो कम से कम इतना तो जानूं कि आरोप क्या है। लेकिन व्यवस्था कहती है,पहले आरोपी बनिए, फिर अपने ऊपर लगे आरोप के बारे में पूछिए।

         कानून कहता है कारण बताओ, व्यवस्था कहती है कारण जानने के लिए पहले हमारे साथ चलो। यह वही स्थिति है जैसे डॉक्टर मरीज को पहले ऑपरेशन थिएटर में ले जाए और पूछे—‘बीमारी क्या है, बाहर बताऊंगा।’ गिरफ्तारी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार है, लेकिन हमारे यहां कभी-कभी इसकी शुरुआत ही ‘बस दो मिनट थाने चलिए’ से होती है। ये दो मिनट भारतीय पुलिस व्यवस्था के ऐसे दो मिनट हैं जो घड़ी में तो दो होते हैं, मगर परिवार की धड़कनों में दो युग बन जाते हैं।

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एफआईआर इस पूरी कहानी का दूसरा अध्याय है। शिकायतकर्ता अपनी बात बताता है, पुलिस उसे कानून की भाषा में ढालती है और धाराएं सामने आ जाती हैं। फिर धाराओं की संख्या देखकर आसपास के लोग अपराध की गंभीरता का अनुमान लगाने लगते हैं। जैसे अपराध नहीं हुआ, शेयर बाजार का भाव खुला हो—धारा बढ़ी तो मामला गंभीर, धारा घटी तो मामला हल्का। जबकि एफआईआर में लगी धारा अपराध सिद्ध होने का फैसला नहीं होती। फैसला अदालत को करना है। लेकिन सामाजिक अदालत इतनी तेज है कि वह पुलिस स्टेशन से निकलते ही अपना फैसला सुना देती है। यहां असली सवाल यह है कि एफआईआर में कौन-सी धाराएं लगेंगी, इसका प्रारंभिक निर्धारण पुलिस करेगी—यह व्यवस्था का हिस्सा है; मगर उसी निर्धारण के आधार पर किसी की स्वतंत्रता छिने तो उस पर स्वतंत्र और प्रभावी निगरानी भी होनी चाहिए। पुलिस जांच करे, इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन पुलिस ही शिकायत सुने, वही धाराएं तय करे, वही गिरफ्तारी करे और फिर नागरिक को समझाए कि ‘कानून की प्रक्रिया चल रही है’—तो नागरिक मन ही मन पूछता है, ‘साहब, प्रक्रिया चल रही है या मैं चल रहा हूं?’ गंभीर अपराधों में पुलिस को तत्काल कार्रवाई का अधिकार और जरूरत दोनों हैं। लेकिन छोटे-मोटे विवादों में गिरफ्तारी को पहला जवाब बना देना ऐसा है जैसे मच्छर के लिए तोप निकालना। यदि आरोपी जांच में सहयोग कर रहा है, फरार होने का खतरा नहीं है, साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका नहीं है और गवाहों को प्रभावित करने का वास्तविक जोखिम नहीं है, तो हर मामले में गिरफ्तारी की जरूरत पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आखिर थाने कोई ऐसी सरकारी पार्किंग तो नहीं जहां हर विवादित नागरिक को कुछ घंटों के लिए खड़ा कर दिया जाए।

                  अब जरा तकनीक की तरफ आइए। आदमी मोबाइल से पैसा भेज रहा है, घर बैठे टैक्स भर रहा है, पासपोर्ट का आवेदन कर रहा है, ट्रेन की सीट बुक कर रहा है और यहां तक कि यह भी देख सकता है कि उसका पार्सल किस शहर में पहुंचा। लेकिन पुलिस शिकायत का मामला आते ही कई जगह तकनीक अचानक छुट्टी पर चली जाती है। शिकायत दर्ज करानी है तो कागज, कलम, इंतजार और फिर वह प्रसिद्ध वाक्य—‘साहब अभी व्यस्त हैं।’ क्यों न शिकायत की डिजिटल प्रति तुरंत मिले? कौन-सी धाराएं लगाई गईं, यह नागरिक देख सके। जांच अधिकारी कौन है, कार्रवाई कहां पहुंची, इसकी जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध हो। गंभीर मामलों में तत्काल पुलिस कार्रवाई जरूरी है, इसलिए हर एफआईआर को इंटरनेट के हवाले नहीं किया जा सकता, लेकिन पारदर्शिता को तो इंटरनेट के हवाले किया ही जा सकता है। इससे वह महान भारतीय संवाद भी समाप्त हो सकता है—‘मैंने तो यह लिखा था।’ ‘नहीं, एफआईआर में तो कुछ और लिखा है।’ डिजिटल रिकॉर्ड में ‘याद नहीं’ की गुंजाइश कम होती है। और जहां याददाश्त कमजोर होती है, वहां रिकॉर्ड मजबूत होना चाहिए। इसी तरह गंभीर धाराओं और गिरफ्तारी के मामलों में न्यायिक निगरानी मजबूत की जानी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि पुलिस हर छोटी जांच के लिए अदालत से अनुमति मांगती घूमे। पुलिस को अपराध की प्रारंभिक जांच और कानूनी धाराएं तय करने का अधिकार रहना चाहिए, लेकिन नागरिक की स्वतंत्रता पर गंभीर असर डालने वाले कदमों की स्वतंत्र समीक्षा जितनी मजबूत होगी, व्यवस्था पर भरोसा उतना ही बढ़ेगा। आखिर पुलिस जांचकर्ता है, अदालत न्यायनिर्णायक। अगर दोनों की कुर्सियां एक-दूसरे में घुलने लगेंगी तो नागरिक को यह समझना मुश्किल होगा कि वह जांच के बीच है या फैसले के।

       आखिर में सवाल पुलिस की ताकत का नहीं, ताकत के इस्तेमाल का है। अपराधी को कानून से डरना चाहिए, पुलिस से नहीं। पुलिस को कानून का अधिकार चाहिए, नागरिक को कानून की सुरक्षा। दोनों साथ-साथ चल सकते हैं, बशर्ते गिरफ्तारी को उपलब्धि और धाराओं को हथियार समझने की मानसिकता से बाहर निकला जाए। छोटे मामलों में जहां संभव हो, गिरफ्तारी अंतिम उपाय बने; गिरफ्तारी के कारण साफ और लिखित रूप में बताए जाएं; एफआईआर में पारदर्शिता हो; गंभीर धाराओं पर न्यायिक निगरानी हो और पुलिस कार्रवाई का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार हो। तब शायद वह दिन आएगा जब पुलिस किसी के दरवाजे पर पहुंचेगी तो नागरिक का पहला सवाल यह नहीं होगा—‘साहब, बचने का रास्ता क्या है?’ बल्कि वह पूछ सकेगा—‘साहब, कानून के तहत मेरा अधिकार क्या है?’ अभी तो हालत यह है कि पुलिस के पास धाराओं की पूरी किताब है और नागरिक के पास सिर्फ सवाल। और व्यवस्था का सबसे सुरक्षित जवाब वही पुराना—‘थाने चलिए, वहीं सब पता चल जाएगा।’ बस फर्क इतना है कि थाने तक पहुंचते-पहुंचते कभी-कभी आदमी को यह तो पता चल जाता है कि वह आरोपी है, लेकिन यह पता लगाने में वक्त लग जाता है कि आखिर उसका अपराध क्या है। धारा कानून की होनी चाहिए, डर व्यवस्था का नहीं; और एफ आई आर.लिखने का आग्रह करने पर पुलिस कहती है कि आवेदन लिखकर दे दो ताकि उनके थाने का आपराधिक रिकॉर्ड अच्छा बना रहे!-

मधु सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र.
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