पेन प्रॉस्टिट्यूट पत्रकारिता में घिसता पत्रकार और नोटों के बिस्तर पर पत्रकारिता ?

पेन प्रॉस्टिट्यूट पत्रकारिता में घिसता पत्रकार और नोटों के बिस्तर पर पत्रकारिता ?

पेन प्रॉस्टिट्यूट पत्रकारिता: घिसती कलम या नोटों का बिस्तर?

प्रख्यात लेखक जॉर्ज ऑरवेल हों या सआदत हसन मंटो, दोनों ऐसे लेखक थे जिन्होंने अपने समय के समाज को सिर्फ देखा नहीं, बल्कि उसके भीतर चल रही हलचल को शब्दों में दर्ज किया। उनकी रचनाओं में सत्ता, समाज, भाषा, बाजार, पाखंड और मनुष्य के बदलते चरित्र पर तीखे सवाल दिखाई देते हैं। आज जब पत्रकारिता के बदलते चेहरे को देखते हैं तो लगता है कि उस दौर में उठाए गए कई सवाल आज और ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं।

वर्तमान पत्रकारिता की सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि पत्रकारों के विचार अलग-अलग क्यों हैं। हर पत्रकार का अपना दृष्टिकोण होता है। हर पत्रकार अपने अनुभव, परिवेश और विचारों के साथ खबर को देखता है। कोई भी व्यक्ति पूरी तरह विचारशून्य नहीं हो सकता। सवाल यह है कि पत्रकार का पक्ष किसके साथ है। वह सत्ता के साथ खड़ा है, बाजार के साथ खड़ा है, अपने निजी हित के साथ खड़ा है या उस जनता के साथ जिसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचना मुश्किल है।

AtalHind की हर खबर सबसे पहलेJoin Channel

पत्रकारिता का मूल काम सत्ता की चापलूसी करना नहीं, सत्ता से सवाल पूछना था। पत्रकार का काम प्रेस नोट को खबर बनाकर छाप देना नहीं था, बल्कि प्रेस नोट के पीछे छिपे सवाल को तलाशना था। पत्रकार का काम मंत्री के साथ फोटो खिंचवाना नहीं था, बल्कि मंत्री से यह पूछना था कि जनता से किया गया वादा पूरा क्यों नहीं हुआ। पत्रकार का काम अधिकारी की प्रशंसा करना नहीं था, बल्कि यह पूछना था कि सरकारी योजना का पैसा जमीन पर कितना पहुंचा।

लेकिन धीरे-धीरे पत्रकारिता और बाजार के बीच ऐसा रिश्ता बना कि खबर और विज्ञापन की सीमाएं कई जगह धुंधली होती चली गईं। अखबार मालिकों और चैनल संचालकों के सामने अपने संस्थान चलाने की व्यावसायिक मजबूरियां हैं, लेकिन सवाल यह है कि इन मजबूरियों की कीमत पत्रकारिता क्यों चुकाए। जब खबर की धार विज्ञापनदाता के हित से तय होने लगे और पत्रकार की कलम संस्थान के कारोबारी हितों के हिसाब से चलने लगे तो फिर पत्रकारिता और प्रचार के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है।

जॉर्ज ऑरवेल के लेखन में सत्ता और भाषा के संबंध को लेकर गहरी चिंता दिखाई देती है। उन्होंने बार-बार यह बताया कि शब्दों और सूचना पर नियंत्रण समाज की सोच को प्रभावित कर सकता है। ‘पेन प्रॉस्टिट्यूट’ जैसी अभिव्यक्ति इसी कठोर चिंता का रूपक है, जिसमें कलम की स्वतंत्रता और उसके बिक जाने के खतरे को सामने रखा जाता है। पत्रकारिता में यह स्थिति तब पैदा होती है जब पत्रकार अपने विवेक से अधिक किसी लाभ, दबाव या प्रभाव को महत्व देने लगे।

सआदत हसन मंटो ने भी समाज के उन चेहरों को सामने रखा जिन्हें सभ्य समाज पर्दे के पीछे रखना चाहता था। उन्होंने वेश्यावृत्ति, हिंसा, सांप्रदायिकता और सामाजिक पाखंड पर लिखा तो इसलिए नहीं कि समाज उनसे खुश हो, बल्कि इसलिए कि समाज का वास्तविक चेहरा सामने आ सके। मंटो के नाम से आज कई कथन सोशल मीडिया पर प्रचलित हैं, लेकिन हर प्रचलित कथन को उनका प्रमाणित उद्धरण मान लेना ठीक नहीं होगा। मंटो की असली ताकत उनके वास्तविक लेखन में है, जहां उन्होंने समाज की दोहरी नैतिकता पर लगातार सवाल खड़े किए।

आज पत्रकारिता में भी दो चेहरे दिखाई देते हैं। एक पत्रकार वह है जो खबर के लिए दस्तावेज तलाशता है, आरटीआई लगाता है, अधिकारियों से सवाल करता है, महीनों मेहनत करता है और खबर प्रकाशित होने के बाद दबाव, नोटिस या मुकदमे का सामना भी करता है। दूसरा पत्रकार वह है जिसके लिए खबर से पहले यह तय हो जाता है कि किसे नाराज नहीं करना है और किसे खुश रखना है।

एक पत्रकार जनता के बीच जाकर खबर खोजता है और दूसरा सत्ता के गलियारों में अपनी जगह खोजता है। एक पत्रकार खबर के पीछे सबूत तलाशता है और दूसरा खबर से पहले संपर्क तलाशता है। एक पत्रकार को अपनी खबर पर भरोसा होता है और दूसरे को अपने संबंधों पर।

यहीं से पत्रकारिता का असली संकट शुरू होता है।

ईमानदार पत्रकार हमेशा संख्या में कम रहे हैं, लेकिन पत्रकारिता की ताकत संख्या में नहीं होती। कई बार एक अकेली कलम वह सवाल पूछ देती है जिसे हजारों लोग मन में दबाए बैठे होते हैं। एक छोटी-सी खबर किसी बड़े भ्रष्टाचार का पर्दाफाश कर सकती है। एक दस्तावेज किसी अधिकारी की पूरी कहानी बदल सकता है। एक पत्रकार की लगातार उठाई गई आवाज किसी पीड़ित को न्याय तक पहुंचा सकती है।

लेकिन ऐसे पत्रकारों के सामने सबसे बड़ा संघर्ष यह है कि उन्हें केवल सत्ता से नहीं, बल्कि बाजार से भी लड़ना पड़ता है। उन्हें अपने संस्थान के दबाव से भी जूझना पड़ता है और कभी-कभी अपने ही पेशे के उन लोगों से भी, जिन्होंने पत्रकारिता को सुविधा और पहचान हासिल करने का रास्ता बना लिया है।

पत्रकारिता में सबसे खतरनाक स्थिति यह नहीं है कि पत्रकार की अपनी विचारधारा है। सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब पत्रकार अपनी कलम का विवेक खो देता है। क्योंकि पत्रकारिता की सबसे बड़ी पूंजी पैसा नहीं, विश्वास है। पाठक को जब तक लगता है कि उसके सामने रखी खबर सच की तलाश है, तब तक अखबार और पत्रकार दोनों की विश्वसनीयता बनी रहती है। जिस दिन पाठक को लगने लगे कि खबर के पीछे कोई सौदा है, उस दिन पत्रकारिता की नींव कमजोर हो जाती है।

पत्रकारिता कोई नोटों का बिस्तर नहीं है जिस पर खबर को सुलाकर उसकी कीमत तय की जाए। पत्रकारिता वह आईना है जिसमें सत्ता को अपना चेहरा देखना पड़ता है। पत्रकार का काम आईने को इस तरह चमकाना नहीं है कि चेहरा सुंदर दिखाई दे। पत्रकार का काम यह दिखाना है कि चेहरे पर दाग है तो दाग दिखाई दे।

आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि हम किसके लिए लिख रहे हैं। सरकार के लिए, विज्ञापनदाता के लिए, संस्थान के मालिक के लिए, अपने निजी लाभ के लिए या उस आम आदमी के लिए जिसकी आवाज सत्ता तक पहुंचने से पहले ही दब जाती है।

पत्रकार का काम सरकार बनाना या सरकार गिराना नहीं है। पत्रकार का काम जनता के सामने तथ्य रखना और सत्ता से जवाब मांगना है। सरकार किसी भी दल की हो, मुख्यमंत्री कोई भी हो, मंत्री कोई भी हो, अधिकारी कोई भी हो—सवाल पूछने का अधिकार पत्रकारिता की आत्मा है। सत्ता बदलने से पत्रकारिता का धर्म नहीं बदल सकता।

आज भी हजारों पत्रकारों के बीच ऐसे पत्रकार मौजूद हैं जो सुविधाओं के बजाय संघर्ष चुन रहे हैं। वे शायद सबसे ज्यादा मंचों पर दिखाई नहीं देते, लेकिन उनकी कलम अब भी जिंदा है। वे जानते हैं कि पत्रकारिता की सबसे बड़ी कमाई कोई पुरस्कार, विज्ञापन या सत्ता के गलियारे में मिला सम्मान नहीं है। सबसे बड़ी कमाई यह है कि किसी गरीब की आवाज खबर बनकर सामने आई, किसी अन्याय पर सवाल उठा और किसी जिम्मेदार व्यक्ति को जनता के सामने जवाब देना पड़ा।

पत्रकारिता तब तक जिंदा रहेगी जब तक पत्रकार के भीतर यह सवाल जिंदा रहेगा कि साहब, यह हुआ क्यों, पैसा कहां गया, जिम्मेदार कौन है और जनता को जवाब कब मिलेगा।

जिस दिन पत्रकार ने सवाल पूछना छोड़ दिया, उस दिन सिर्फ एक पत्रकार नहीं हारेगा। जनता की आवाज कमजोर होगी और लोकतंत्र का एक जरूरी प्रहरी अपनी जिम्मेदारी से दूर हो जाएगा।

इसलिए आज भी फर्क साफ है। एक पत्रकार अपनी कलम को सच की तलाश में घिस रहा है और दूसरा उसी कलम को सुविधा की कीमत पर चला रहा है। एक पत्रकार खबर के लिए संघर्ष कर रहा है और दूसरी ओर बिकाऊ पत्रकारिता नोटों के बिस्तर पर आराम कर रही है।

लेकिन इतिहास नोटों के बिस्तर को याद नहीं रखता। इतिहास उन शब्दों को याद रखता है जिन्हें लिखने के लिए किसी पत्रकार ने अपनी कलम को बिकने नहीं दिया।

लेखक — राजेन्द्र सिंह जादौन
लेखक — राजेन्द्र सिंह जादौन
Share:

Comments

Leave a comment