सोनीपत के नितेश ने एशियाई ग्रीको-रोमन कुश्ती खेलों में रजत पदक जीतकर रचा इतिहास

सोनीपत के जागसी गांव के रहने वाले नितेश सिवाच ने एशियाई खेलों में रजत पदक जीतकर भारतीय कुश्ती में एक नया इतिहास रच दिया है। जापान के यूरी नकाजातो से ग्रीको-रोमन कुश्ती के फाइनल मुकाबले में हार मिलने के बावजूद यह पदक देश के लिए बेहद खास है। नितेश का यह रजत पदक लंबे अंतराल के बाद ग्रीको-रोमन कुश्ती में भारत के पदक का सूखा खत्म करने वाला रहा है। इससे पहले साल 1962 के एशियाई खेलों में गणपत अंदलकर ने 97 किलोग्राम से अधिक भारवर्ग में भारत के लिए पदक जीता था। इसके बाद से कोई भी भारतीय ग्रीको-रोमन पहलवान इस प्रतियोगिता में पदक नहीं जीत सका था।
- जापान के यूरी नकाजातो के खिलाफ फाइनल में हार के बावजूद नितेश ने जीता रजत।
- साल 1962 के बाद ग्रीको-रोमन कुश्ती में भारत का पदक का सूखा हुआ खत्म।
- सुमित और अमन बरोनिया क्वार्टर फाइनल मुकाबले में हारकर प्रतियोगिता से बाहर हुए।
फाइनल मुकाबले का रोमांच और अन्य पहलवानों का प्रदर्शन
फाइनल मुकाबले में नितेश के पास जापानी पहलवान को हराकर स्वर्ण पदक जीतने का पूरा मौका था। हालांकि कड़े मुकाबले के बाद उन्हें रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा। इस एशियाई प्रतियोगिता से पहले भारत के अन्य पहलवानों का सफर भी चर्चा में रहा। भारत के सुमित ने 60 किलोग्राम भारवर्ग और अमन बरोनिया ने 77 किलोग्राम भारवर्ग में हिस्सा लिया था। लेकिन ये दोनों ही पहलवान अपने-अपने वर्ग के क्वार्टर फाइनल मैच में हारकर प्रतियोगिता से बाहर हो गए थे।
पिता का सपना और बचपन से कड़ा संघर्ष
नितेश के पिता आनंद ने जानकारी देते हुए बताया कि नितेश उनका इकलौता बेटा है। बचपन से ही पिता का यह बड़ा सपना था कि उनका बेटा एक बड़ा पहलवान बने। पिता खुद भी पहलवानी करना चाहते थे लेकिन किसी कारणवश उन्हें मौका नहीं मिल पाया था। वर्ष 2008 में जब नितेश की उम्र करीब छह साल की थी, तब पिता उन्हें गांव के अखाड़े में अभ्यास के लिए ले जाने लगे थे। पिता करीब चार साल तक रोज सुबह और शाम को बेटे को अखाड़े में ले जाते और अभ्यास के बाद घर वापस लाते थे।
गंभीर चोट और दूध बेचने का संघर्ष
वर्ष 2012 में खरखौदा के एक निजी स्कूल में पढ़ाई के साथ नितेश ने अपनी कुश्ती का सफर जारी रखा। लेकिन वर्ष 2014 में प्रताप स्पोर्ट्स स्कूल में अभ्यास के दौरान उनके घुटने में बहुत गंभीर चोट लग गई थी। सफल ऑपरेशन के बाद नितेश को करीब एक साल तक बिस्तर पर ही रहना पड़ा था। इस गंभीर चोट के कारण वह मानसिक रूप से भी काफी परेशान रहने लगे थे। तब पिता ने उन्हें परिवार के दूध के कारोबार में हाथ बंटाने की सलाह दी थी। इसके बाद करीब एक साल तक नितेश ने गांव से दूध खरीदकर पानीपत में दुकान पर और घर-घर जाकर बेचा था।
कुश्ती में वापसी और मासिक खर्च
कुछ समय बाद नितेश ने एक बार फिर से कुश्ती खेलने की अपनी गहरी इच्छा जाहिर की थी। पिता की अनुमति मिलने के बाद वर्ष 2017 में उन्होंने खरखौदा की एक निजी कुश्ती अकादमी में दोबारा अभ्यास शुरू किया। पिता आनंद के अनुसार नितेश की पहलवानी के अभ्यास पर हर महीने करीब 15 हजार रुपये का खर्च आता था। करीब 12 साल पहले उनका पूरा परिवार जागसी गांव से आकर पानीपत के सेक्टर-6 में रहने लगा था। यहीं पर परिवार ने आकर नया दूध का कारोबार शुरू किया था जिससे घर का खर्च चलता था।
शिक्षा, नौकरी और संयुक्त परिवार का सहयोग
कुश्ती के साथ-साथ नितेश ने अपनी पढ़ाई को भी लगातार जारी रखा था। वर्ष 2025 में स्नातक के अंतिम वर्ष की परीक्षा के दौरान उनकी कंपार्टमेंट आ गई थी। दोबारा परीक्षा देने के बावजूद वह वर्ष 2026 में भी इस परीक्षा को पास नहीं कर सके थे। इन सब के बीच उन्होंने कुश्ती के मैदान में अपनी कड़ी मेहनत कभी कम नहीं होने दी। वर्ष 2022 में उन्हें भारतीय रेलवे में टिकट निरीक्षक के पद पर सरकारी नौकरी मिल गई थी। आनंद ने बताया कि संयुक्त परिवार में रहने के कारण नितेश को हमेशा से पूरे परिवार का भरपूर सहयोग मिला। उनके चाचा नवीन के दोनों बेटे भी खरखौदा की उसी कुश्ती अकादमी में जमकर अभ्यास करते हैं। परिवार के इसी मजबूत कुश्ती वाले माहौल और खुद नितेश की दिन-रात की कड़ी मेहनत का यह नतीजा सामने आया है। आज इसी मेहनत और लगन के बल पर नितेश ने एशियाई खेलों में रजत पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है।