राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस 1 अक्टूबर पर विशेष लेख: रक्तदान है महादान, जानिए इसका वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व

राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस 1 अक्टूबर के अवसर पर जानिए रक्तदान का महत्व। रक्त जीवन का आधार है। मनुष्य के शरीर में निरंतर प्रवाहित होने वाला रक्त शरीर के प्रत्येक अंग तक प्राणवायु और आवश्यक पोषक तत्व पहुंचाने का कार्य करता है।
रक्त का महत्व और आवश्यकता
दुर्घटना में घायल व्यक्ति हो, विभिन्न कारणों से रक्तस्राव की समस्या का सामना करा रहो कोई व्यक्ति हो, गंभीर व्याधि से पीड़ित कोई व्यक्ति हो अथवा किसी बड़ी शल्य चिकित्सा से गुजर रहा व्यक्ति—कई परिस्थितियों में रक्त की उपलब्धता जीवन और मृत्यु के बीच निर्णायक भूमिका निभाती है। चिकित्सा विज्ञान ने अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन रक्त का कोई पूर्ण कृत्रिम विकल्प आज भी उपलब्ध नहीं है। इसका निर्माण किसी कारखाने में नहीं हो सकता। इसलिए स्वस्थ और पात्र व्यक्ति का स्वैच्छिक रक्तदान मानवता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सामाजिक दायित्व और जन-जागरण
1 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस मनाया जाता है। यह अवसर हमें स्मरण कराता है कि रक्तदान किसी एक संस्था, चिकित्सालय या व्यक्ति का उत्तरदायित्व नहीं, बल्कि पूरे समाज का साझा दायित्व है। रक्त की आवश्यकता किसी विशेष दिन नहीं होती; आपात स्थिति कभी भी सामने आ सकती है। इसलिए स्वैच्छिक रक्तदान की भावना भी वर्ष भर जीवित रहनी चाहिए। मेरे लिए रक्तदान केवल सामाजिक सेवा का एक कार्य नहीं, बल्कि जीवन का संकल्प है। मेरे पिता स्वर्गीय कली राम खिप्पल जी कहा करते थे—“रक्तदान महादान है।” उनके इन शब्दों ने मेरे मन में सेवा का बीज बोया। धीरे-धीरे रक्तदान मेरे व्यक्तिगत संकल्प से आगे बढ़कर जन-जागरण का माध्यम बन गया।
रक्तदान के आंकड़े और अनुभव
अब तक मुझे 185 बार रक्तदान, 90 बार प्लेटलेट्स तथा एक बार प्लाज्मा दान करने का अवसर मिला है। इसके साथ ही 610 से अधिक रक्तदान शिविरों के आयोजन, संयोजन और जन-जागरण से जुड़ने का सौभाग्य मिला जिसमें 22000 से अधिक रक्त इकाई के माध्यम से 66000 से अधिक लोगों को रक्त की उपलब्धता हुई है। इन वर्षों में अनेक रक्तदाताओं को स्वेच्छा से आगे आते हुए देखकर यह विश्वास और सुदृढ़ हुआ कि हमारे समाज में सेवा और संवेदना की भावना आज भी अत्यंत प्रबल है। इन आंकड़ों को मैं उपलब्धि से अधिक जिम्मेदारी का स्मरण मानता हूं। प्रत्येक रक्तदान के पीछे किसी अपरिचित व्यक्ति के जीवन की आशा छिपी होती है। रक्तदाता यह नहीं जानता कि उसका रक्त किस व्यक्ति तक पहुंचेगा, फिर भी वह बिना किसी स्वार्थ के अपना रक्त देता है। यही निस्वार्थ भाव रक्तदान को मानवता की सबसे सुंदर सेवाओं में स्थान देता है।
रक्तदान का वैज्ञानिक आधार
रक्त केवल एक पदार्थ नहीं, बल्कि शरीर की जटिल जीवन-व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है। इसमें लाल रक्त कणिकाएं, श्वेत रक्त कणिकाएं, प्लेटलेट्स और प्लाज्मा जैसे प्रमुख घटक होते हैं। लाल रक्त कणिकाएं शरीर के विभिन्न अंगों तक प्राणवायु पहुंचाती हैं, प्लेटलेट्स रक्तस्राव को नियंत्रित करने में सहायता करती हैं और प्लाज्मा रक्त के अनेक आवश्यक घटकों के परिवहन का माध्यम है। दान किए गए रक्त को आवश्यकता के अनुसार विभिन्न घटकों में विभाजित किया जा सकता है। इससे एक रक्तदान से प्राप्त अलग-अलग रक्त घटक अलग-अलग रोगियों के उपचार में उपयोग किए जा सकते हैं। इस दृष्टि से स्वैच्छिक रक्तदान का महत्व और भी बढ़ जाता है।
चिकित्सकीय मानक और प्रक्रिया
रक्तदान से पहले दाता की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यक जांच की जाती है। स्वस्थ एवं पात्र व्यक्ति से निर्धारित चिकित्सकीय मानकों के अनुसार ही रक्त लिया जाता है। रक्तदान के बाद शरीर खोए हुए रक्त और उसके घटकों की पूर्ति की प्राकृतिक प्रक्रिया आरंभ करता है। हालांकि रक्तदान की पात्रता, मात्रा और दो रक्तदानों के बीच आवश्यक अंतर व्यक्ति की आयु, स्वास्थ्य, हीमोग्लोबिन तथा निर्धारित चिकित्सकीय मानकों पर निर्भर करता है। इसलिए रक्तदान हमेशा अधिकृत रक्त केंद्र और चिकित्सकीय मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए।
रक्त की कोई जाति नहीं होती
रक्तदान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जाति-पाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं। रक्त का परिचय उसके रक्त समूह से होता है, दाता की जाति या धर्म से नहीं। जब एक व्यक्ति किसी अनजान व्यक्ति के जीवन की रक्षा के लिए अपना रक्त देता है, तब वह मानवता की उस भावना को मजबूत करता है जो समाज को जोड़ती है। इसी भावना को जन-जन तक पहुंचाना आवश्यक है।
युवाओं की भागीदारी अत्यंत आवश्यक
रक्तदान के क्षेत्र में युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। युवा स्वयं रक्तदान करें और अपने मित्रों तथा परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करें। जन्मदिन, विवाह की वर्षगांठ, प्रियजन की स्मृति अथवा किसी विशेष अवसर को रक्तदान से जोड़ना सेवा की सुंदर परंपरा बन सकती है। युवाओं को रक्तदान के साथ नशामुक्ति, सड़क सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और अन्य सामाजिक कार्यों से भी जोड़ना चाहिए। स्वस्थ शरीर, सकारात्मक सोच और सेवा-भावना से ही सशक्त समाज का निर्माण होता है।
सेवा की शुरुआत घर से
रक्तदान की भावना को आगे बढ़ाने में परिवार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। मेरे परिवार के सदस्यों ने भी रक्तदान और सामाजिक सेवा में सहभागिता की है। पत्नी सुषमा, पुत्र अक्षय तथा बेटियां प्रियंका और दिव्या सहित परिवार के सदस्यों ने इस सेवा-भाव को अपनाया है। मेरे स्वर्गीय भाई विनोद कुमार ने भी अनेक बार रक्तदान किया। मैंने नेत्रदान और देहदान का संकल्प भी लिया है। मेरा मानना है कि मनुष्य का जीवन तभी सार्थक है, जब उसके रहते भी उसका जीवन दूसरों के काम आए और उसके बाद भी उसका अस्तित्व किसी जरूरतमंद के लिए उपयोगी हो सके।
रक्तदान को संस्कार बनाना होगा
राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस केवल रक्तदान करने का अवसर नहीं, बल्कि समाज में स्वैच्छिक रक्तदान की स्थायी संस्कृति विकसित करने का आह्वान है। हमें यह समझना होगा कि रक्त की आवश्यकता अस्पताल में भर्ती किसी व्यक्ति तक सीमित नहीं है। किसी भी समय किसी भी परिवार को इसकी आवश्यकता पड़ सकती है। इसलिए हमें रक्तदान को भय या भ्रांति से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक समझ और मानवीय संवेदना से देखना चाहिए। स्वस्थ एवं पात्र व्यक्ति अधिकृत रक्त केंद्र में चिकित्सकीय नियमों के अनुसार रक्तदान करे और दूसरों को भी प्रेरित करे।