राष्ट्रीय सेवा योजना : युवाओं में सेवा, करुणा और राष्ट्र दायित्व का भाव जगाने का अनूठा दर्शन

राष्ट्रीय सेवा योजना : युवाओं में सेवा, करुणा और राष्ट्र दायित्व का भाव जगाने का अनूठा दर्शन

राष्ट्रीय सेवा योजना देश के युवाओं में सेवा, करुणा और राष्ट्र दायित्व का भाव जगाने का एक महत्वपूर्ण दर्शन है। देश का भविष्य देश के युवा होते हैं। यदि युवा केवल अपनी पढ़ाई, अपनी नौकरी और अपने भविष्य तक सीमित रह जाएँ, तो देश की आत्मा दुर्बल हो जाती है। युवा को किताब से निकालकर समाज से जोड़ना और उसके भीतर सेवा, करुणा तथा राष्ट्र के प्रति दायित्व का भाव जगाना ही इस योजना का मुख्य उद्देश्य है। यह योजना केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि युवाओं के चरित्र निर्माण की एक बड़ी प्रयोगशाला है।

स्वतंत्रता के बाद देश के नेताओं और शिक्षाविदों के मन में यह विचार आया कि शिक्षा केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। महात्मा गाँधी कहते थे कि शिक्षा वही है जो समाज के काम आए। इसी भावना को मूर्त रूप देने के लिए कई आयोग बने। सन उन्नीस सौ अठावन में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने एक सुझाव दिया कि छात्रों को समाज सेवा का अवसर मिलना चाहिए। लंबे विचार-विमर्श के बाद सन उन्नीस सौ उनहत्तर में, जो कि गाँधी जी की जन्म शताब्दी का वर्ष था, इस योजना का शुभारंभ किया गया। पहले वर्ष में केवल चालीस हजार स्वयंसेवकों के साथ सैंतीस विश्वविद्यालयों में इसे प्रारंभ किया गया था। आज इस योजना में लाखों महाविद्यालयों और विद्यालयों के पचास लाख से अधिक स्वयंसेवक जुड़े हुए हैं। यह विश्व की सबसे बड़ी छात्र सेवा योजनाओं में से एक बन गई है।

योजना का उद्देश्य, प्रतीक चिन्ह और मुख्य लक्ष्य

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इस योजना का मुख्य उद्देश्य वाक्य मैं नहीं, तुम रखा गया है। यह छोटा सा वाक्य ही इसके पूरे दर्शन को स्पष्ट करता है। इसका अर्थ यह है कि मैं अपने लिए नहीं, तुम्हारे लिए, समाज के लिए और राष्ट्र के लिए जीऊँगा। यह अहंकार से परमार्थ की ओर जाने का एक विशेष मंत्र है। इसका प्रतीक चिन्ह कोणार्क के सूर्य मंदिर के रथ के चक्र से लिया गया है। इस चक्र में आठ तीलियाँ हैं जो दिन के आठ पहरों का प्रतीक हैं और साथ ही जीवन की गति को भी दर्शाती हैं। चक्र के मध्य में लाल रंग है जो शक्ति का प्रतीक है और किनारे पर नीला रंग है जो अनंत आकाश और व्यापकता का प्रतीक है। यह चिन्ह बताता है कि स्वयंसेवक को दिन-रात निरंतर चलते रहना है, वह भी समाज के कल्याण के लिए।

राष्ट्रीय सेवा योजना के कुछ स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। पहला लक्ष्य छात्रों में समाज सेवा के प्रति रुचि जागृत करना है। दूसरा लक्ष्य शिक्षा और समाज के बीच की दूरी को समाप्त करना है। तीसरा लक्ष्य युवाओं में अनुशासन, त्याग और परिश्रम की भावना भरना है। चौथा लक्ष्य लोकतंत्र में जीने और नेतृत्व करने का प्रशिक्षण देना है। पाँचवा लक्ष्य देश की एकता और सामाजिक समरसता को मजबूत करना है। छठा लक्ष्य श्रम के प्रति सम्मान पैदा करना है ताकि यह भाव जागे कि कोई भी काम छोटा नहीं होता है।

नियमित कार्यक्रम और विशेष शिविर

राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रमों को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा जाता है, जिनमें नियमित कार्यक्रम और विशेष शिविर कार्यक्रम शामिल हैं। इसके अंतर्गत स्वयंसेवक वर्ष भर अपने महाविद्यालय या विद्यालय के आस-पास के क्षेत्र में काम करते हैं। इसके लिए प्रत्येक स्वयंसेवक को वर्ष में कम से कम एक सौ बीस घंटे का श्रम करना होता है। इन घंटों में वे कई प्रकार के कार्य करते हैं जैसे सफाई अभियान, वृक्षारोपण, रक्तदान के लिए लोगों को जागृत करना, साक्षरता अभियान, टीकाकरण में सहायता, पर्यावरण संरक्षण, नशामुक्ति का प्रचार और सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता फैलाना शामिल है।

वर्ष में एक बार सात दिन का विशेष शिविर लगाया जाता है जो इस योजना का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है। यह शिविर किसी गाँव या बस्ती में लगाया जाता है, जहाँ छात्र वहीं रहकर पूरी तन्मयता से काम करते हैं। शिविर में सुबह से शाम तक एक कठोर दिनचर्या होती है जिसमें प्रातःकाल योग और प्रार्थना, फिर श्रमदान, दोपहर में बौद्धिक चर्चा और संध्या में सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल होते हैं। शिविर के दौरान स्वयंसेवकगाँव की गलियाँ साफ करते हैं, शौचालय बनाते हैं, तालाब की सफाई करते हैं, विद्यालय की दीवारों पर शिक्षा संबंधी चित्र बनाते हैं और ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं की जानकारी देते हैं। सात दिन तकगाँव में रहने से छात्रों को ग्रामीण जीवन की सच्ची कठिनाइयों का ज्ञान होता है।

छात्रों के व्यक्तित्व का विकास और जीवन दृष्टि में परिवर्तन

यह योजना न केवल समाज को बल्कि स्वयं छात्रों को भी बहुत कुछ सकारात्मक प्रदान करती है। इसका पहला बड़ा लाभ यह है कि इससे छात्रों के व्यक्तित्व का विकास होता है। जो छात्र कक्षा में बोलने से डरता था, वह शिविर में मंच संचालन करता है और इस प्रकार उसके भीतर नेतृत्व क्षमता का विकास होता है। दूसरा लाभ प्रमाण पत्र और नए अवसर मिलना है। दो वर्ष तक निरंतर कार्य करने और एक विशेष शिविर पूरा करने पर स्वयंसेवक को प्रमाण पत्र मिलता है। इस प्रमाण पत्र के आधार पर उच्च शिक्षा और नौकरी में कुछ स्थानों पर विशेष प्राथमिकता मिलती है। इसके अलावा श्रेष्ठ स्वयंसेवकों को गणतंत्र दिवस परेड, साहसिक शिविर, राष्ट्रीय एकता शिविर और विदेशों में युवा आदान-प्रदान कार्यक्रमों में जाने का अवसर मिलता है। तीसरा और सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे छात्र की जीवन दृष्टि में परिवर्तन आ जाता है। छात्र यह समझने लगता है कि देश केवल नक्शे में नहीं, बल्कि गाँव की झोपड़ी में, मजदूर की हथेली में और कचरा बीनने वाले बच्चे की आँखों में बसता है।

राष्ट्रीय सेवा योजना ने देश के निर्माण में अनेक क्षेत्रों में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। स्वच्छता के क्षेत्र में जब स्वच्छ भारत अभियान प्रारंभ हुआ था, तब इसके सबसे बड़े सैनिक यही स्वयंसेवक थे। बाढ़, सूखा और भूकंप जैसी आपदाओं के समय यही युवा सबसे पहले सहायता के लिए पहुँचते हैं। कोरोना काल में जब सभी लोग अपने घरों में बंद थे, तब इन स्वयंसेवकों ने घर-घर जाकर दवा, भोजन और जागरूकता पहुँचाने का काम किया था। रक्तदान के क्षेत्र में इनका योगदान अतुलनीय है क्योंकि ये युवा प्रतिवर्ष लाखों यूनिट रक्त का दान करते हैं। सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध भी इन्होंने अपनी मजबूत आवाज उठाई है। दहेज, बाल विवाह, छुआछूत और अंधविश्वास के विरुद्ध इन्होंनेगाँव-गाँव में नाटक, गीत और चर्चा के माध्यम से लोगों में जागरूकता फैलाई है।

चुनौतियाँ और सुधार की आवश्यकता

इतनी विशाल योजना के सामने आज कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी खड़ी हैं। कई स्थानों पर यह योजना केवल कागजों पर ही चलती है और शिविर केवल एक खानापूर्ति बनकर रह जाते हैं। प्रमाण पत्र पाने के लोभ में छात्र आते हैं, लेकिन उनके मन में सच्चा सेवा भाव नहीं होता है। कई महाविद्यालयों में कार्यक्रम अधिकारी के पास समय का अभाव होता है और धन की कमी भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है। इन सभी चुनौतियों को दूर करने के लिए कुछ सुधारों का होना अति आवश्यक है।

कार्यक्रम अधिकारियों को उचित प्रशिक्षण और पूरा सम्मान मिलना चाहिए। शिविरों की संख्या बढ़ाने के बजाय उनकी गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों, सेवानिवृत्त सैनिकों, किसानों और वैज्ञानिकों को शिविरों में बुलाकर छात्रों के साथ उनका संवाद कराना चाहिए। सेवा कार्यों का मूल्यांकन केवल काम के घंटों से नहीं, बल्कि समाज पर पड़े उनके प्रभाव से होना चाहिए। राष्ट्रीय सेवा योजना केवल एक सरकारी योजना नहीं है, बल्कि यह एक महान संस्कार है जो युवाओं को जीवन का सही पाठ पढ़ाती है।

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