फीते से नहीं, फिटनेस से चलती है सरकार की बस: इंदौर हादसे पर उठे गंभीर सवाल

फीते से नहीं, फिटनेस से चलती है सरकार की बस: इंदौर हादसे पर उठे गंभीर सवाल
  • मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा की पीएम ई-बस ने इंदौर के राजवाड़ा पर हादसा किया।
  • हादसे में एक नागरिक की मौत हो गई और दो-तीन लोग घायल हो गए।
  • बस ने राहगीरों और ऑटो/ई-रिक्शा को टक्कर मारते हुए दुकान के काउंटर तक पहुंचकर टक्कर मारी।
  • प्रारंभिक रिपोर्टों में ब्रेक फेल होने या चालक की गफलत की बात कही जा रही है।

मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा का तीसरा दिन और बड़ा हादसा

मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा का तीसरे दिन ही ऐसा इम्तिहान हुआ कि नाम सुगम और नतीजा गम बन गया। दो दिन पहले ढोल-नगाड़ों, कैमरों और भाषणों के बीच जिस सेवा का शुभारंभ हुआ था, उसी की पीएम ई-बस यानी इलेक्ट्रिक बस ने तीसरे दिन इंदौर के राजवाड़ा पर राहगीरों और ऑटो व ई-रिक्शा को टक्कर मारते हुए दुकान के काउंटर तक पहुँचकर हादसा कर दिया। प्रारंभिक रिपोर्टों में ब्रेक फेल होने या चालक की गफलत की बात कही जा रही है। एक नागरिक की मौत हुई और दो-तीन लोग घायल हो गए। जनता के लिए शुरू हुई सेवा यदि तीसरे दिन अस्पताल पहुँचाने लगे, तो सवाल बस का नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की तैयारी का है। उद्घाटन में सरकार ने फीता काटा था, लेकिन तीसरे दिन बस ने जनता की सुरक्षा का भरोसा काट दिया। सरकारी योजना का इससे करारा परिणाम क्या हो सकता है।

AtalHind की हर खबर सबसे पहलेJoin Channel

रंग बदलने से नहीं बदलती व्यवस्था और सुरक्षा

बस पर नया रंग चढ़ जाने से व्यवस्था नई नहीं हो जाती है। सुगम सेवा में कुछ पुरानी और सेकंड-हैंड बसों को रंग-रोगन कर उतारने के आरोप पर विपक्ष ने शुभारंभ के तुरंत बाद सवाल उठाए थे। हालांकि हादसे वाली बस नई पीएम ई-बस यानी इलेक्ट्रिक बस बताई गई है। सवाल फिर चाहे नई बस हो या पुरानी, यह है कि सुरक्षा आख़िर कहाँ है। रंग कभी भी ब्रेक नहीं लगाता है। फिटनेस और सुरक्षा की जगह चमक दिखाना सीधे तौर पर जनता की आँखों में धूल झोंकना है। सड़क पर रंग की नहीं बल्कि फिटनेस की जरूरत होती है। यात्री को बस में बैठते वक्त सिर्फ इतना भरोसा चाहिए कि वह सुरक्षित अपने घर पहुँचे, किसी सरकारी विज्ञापन में न चमके।

फिटनेस प्रमाणपत्र और तकनीकी जाँच पर उठे सवाल

सवाल बस के ब्रेक का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का है जिसने उसे सड़क पर उतारा। बस को फिटनेस किसने दी। प्रमाणपत्र किसने जारी किया। ब्रेक किसने जाँचे। ड्राइवर को कितना प्रशिक्षण मिला। क्या स्वतंत्र तकनीकी जाँच हुई थी या सिर्फ कागजों नहीं बस को सड़क पर भेज दिया। योजना शुरू होने और उद्घाटन के तुरंत बाद विपक्ष यानी कांग्रेस ने पुरानी, रंग-रोगन वाली और अनफिट बसों पर सवाल उठाए थे। उन सवालों को राजनीतिक शोर मानकर दबाया गया या फिर उसकी कोई तकनीकी जाँच हुई थी, अब यह पूरी तरह साफ होना चाहिए। क्योंकि ब्रेक फेल होने या हादसे के बाद जाँच करना सुरक्षा व्यवस्था नहीं, बल्कि सीधे तौर पर किसी हादसे का इंतजार करना है।

हादसे के बाद केवल जाँच और समितियों का दौर

हादसा होते ही व्यवस्था का सबसे आसान हथियार बाहर निकल आता है, जिसे जाँच कहा जाता है। मौत हुई तो जाँच, लापरवाही मिली तो जाँच और कार्रवाई पूछी गई तो फिर से जाँच शुरू हो जाती है। समितियाँ इतनी बन चुकी हैं कि यदि उन्हें पहिए लगा दें तो शायद शहर की परिवहन व्यवस्था ही अपने आप चल पड़े। मगर जिस परिवार ने अपना अपना सदस्य खोया है, उसे कोई रिपोर्ट नहीं बल्कि केवल न्याय चाहिए। घायलों को किसी भी तरह के सरकारी बयान नहीं बल्कि सही इलाज चाहिए। नागरिक को आश्वासन नहीं, यह भरोसा चाहिए कि अगली बस उसके घर से किसी को अस्पताल नहीं पहुँचाएगी। किसी भी दुर्भाग्यपूर्ण घटना कहना बहुत आसान होता है, लेकिन जिम्मेदार तय करना बहुत मुश्किल काम है। इसलिए व्यवस्था हमेशा की तरह फिर से जाँच बैठा देती है।

जनता का गुस्सा और व्यवस्था की जवाबदेही

बस पर पथराव और तोड़फोड़ करना बिल्कुल गलत है, लेकिन जनता के गुस्से के असली कारण को भी समझना होगा। हादसे के बाद उग्र भीड़ ने कांच फोड़े और बस में जमकर तोड़फोड़ की। जब नागरिक को यह लगने लगे कि उसकी जान से ज्यादा अहमियत उद्घाटन और प्रचार को दी जा रही है, तो गुस्सा शीशे से आगे बढ़कर सीधे व्यवस्था तक पहुँच जाता है। जनता को संयम सिखाना बहुत आसान होता है, लेकिन सत्ता को सावधानी सिखाना बेहद कठिन होता है। जो व्यवस्था आम नागरिक से ट्रैफिक नियमों का कड़ाई से पालन करवाती है, उसे पहले अपनी खुद की सरकारी बस की फिटनेस का पूरा हिसाब देना चाहिए। एक तरफ नियम तोड़ने पर भारी चालान कटता है, और दूसरी तरफ सरकारी बस की फिटनेस पूरी तरह संदिग्ध होती है, यह कोई अनुशासन नहीं बल्कि दो अलग-अलग तराजू हैं। नियम हमेशा जनता के लिए और सुरक्षा केवल कागजों के लिए कब तक चलती रहेगी।

उद्घाटन की चमक और सड़क पर असली परीक्षा

सरकार के लिए कोई भी नई बस शुरू करना एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है, मगर उसे सुरक्षित चलाना ही उसकी असली परीक्षा होती है। यहाँ अक्सर फीता पहले कटता है, और फिटनेस बाद में देखी जाती है। कैमरे हमेशा पहले आते हैं, और तकनीकी जाँच उसके बहुत बाद में होती है। प्रचार समय पर होता है, लेकिन जवाबदेही हमेशा बहुत देर से आती है। सार्वजनिक परिवहन की असली सफलता कोई उद्घाटन नहीं है, बल्कि वह दिन होता है जब बस बिना किसी हादसे के रोज चले, ड्राइवर सुरक्षित लौटे और यात्री पूरी तरह सकुशल अपने घर पहुँचे, भले ही इसकी तस्वीर कहीं अखबार में न छपे। मंच पर तालियाँ मिल सकती हैं, लेकिन सड़क पर सुरक्षा कभी ऐसे नहीं मिलती। शासन की असली परीक्षा किसी कैमरे के सामने नहीं, बल्कि हमेशा सड़क पर होती है।

कागजी खानापूर्ति और अनदेखी का परिणाम

हर हादसे के पीछे सिर्फ एक क्षण नहीं होता, बल्कि उससे पहले की पूरी व्यवस्था जिम्मेदार होती है। यदि ब्रेक फेल हुआ तो सवाल सिर्फ किसी तकनीकी खराबी का नहीं है, बल्कि यह भी है कि उसे पहले क्यों नहीं पकड़ा गया। घायल कोई संख्या नहीं हैं, राजवाड़ा की अफरातफरी कोई मामूली घटना नहीं है और टूटा हुआ काउंटर सिर्फ संपत्ति का नुकसान नहीं है। पुरानी बसों का सवाल भी किसी एक वाहन तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि योजना कैसे बनी, बसें कैसे चुनी गईं और सुरक्षा कहाँ पर जाँची गई। यदि इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही या नियमों की अनदेखी हुई है, तो इसे महज एक दुर्घटना कहकर फाइल बंद करना हादसे के बाद किया जाने वाला दूसरा बड़ा अन्याय होगा।

अब भाषण नहीं, सरकार को देना होगा स्पष्ट जवाब

अब समय आ गया है कि सरकार कोई भाषण न दे बल्कि सीधा जवाब दे। मृतक परिवार को न्याय मिले, घायलों को पूरा इलाज मिले और नागरिकों को बिल्कुल साफ जानकारी दी जाए। बस को किसने पास किया, फिटनेस प्रमाणपत्र किसने दिया, संचालन की अनुमति किसने दी और उसकी निगरानी कहाँ हुई, इन सभी सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। यदि बस सभी मानकों पर पूरी तरह खरी उतरी थी तो फिर ब्रेक फेल होने की मुख्य वजह सामने आनी चाहिए। यदि मानकों की भारी अनदेखी हुई है तो फिर जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। वरना नया मंच सजेगा, नया रंग चढ़ेगा और पुरानी लापरवाही फिर से सड़क पर उतर आएगी।

प्रदेश में संचालित बसों की फिटनेस पर बड़ा सवाल

एक बस का हादसा हुआ है, लेकिन जोखिम सिर्फ एक बस तक सीमित बिल्कुल नहीं है। इंदौर में सुगम सेवा की करीब 145 बसें जिनमें 50 इंटरसिटी और 95 इंट्रासिटी शामिल हैं तथा पीएम ई-बस सेवा की बसों समेत प्रदेश में प्रारंभिक चरण में कुल 351 बसें शुरू हुई हैं। सवाल यह है कि क्या इन सभी की फिटनेस, ब्रेक सिस्टम और चालक प्रशिक्षण की तत्काल प्रभाव से दोबारा जाँच होगी, या फिर अगला कोई दुर्भाग्यपूर्ण हादसा होने तक बसें यूँ ही धड़ल्ले से चलती रहेंगी। इस मौत के बाद भी यदि बिना ताजा तकनीकी जाँच के बसें यूँ ही सड़क पर उतारी गईं, तो यह महज कोई साधारण लापरवाही नहीं, बल्कि जानबूझकर जोखिम उठाने वाली व्यवस्था का बड़ा सवाल बनेगा।

व्यवस्था की सोच का आईना है राजवाड़ा का हादसा

राजवाड़ा का हादसा सिर्फ एक बस की उम्र का सवाल नहीं है, बल्कि यह पूरी व्यवस्था की सोच का एक आईना है। आखिर कब तक पुराने ढर्रे पर नया रंग चढ़ाकर उसे एक नई योजना बताया जाता रहेगा। जनता को बस की केवल चमक दिखाई जाती है, उसके भीतर की सुरक्षा कभी नहीं दिखाई जाती है। सड़क पर रंग कभी काम नहीं आते, बल्कि ब्रेक काम आते हैं। भाषण देने से हादसे नहीं रुकते, बल्कि तकनीकी जाँच हादसे रोकती है। उद्घाटन करने से सुरक्षा नहीं मिलती, बल्कि जवाबदेही से सुरक्षा मिलती है। अगर अब भी कोई सबक नहीं लिया गया तो अगली दुर्घटना भी फिर से दुर्भाग्यपूर्ण कहलाएगी, एक नई समिति बैठेगी और फाइल चलती रहेगी। हमारे यहाँ हादसा खत्म होते ही जिम्मेदारी कभी शुरू नहीं होती, बल्कि जिम्मेदारी को खत्म करने की पूरी प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

Share:

Comments

Leave a comment