पत्रकारों पर झूठी FIR का कानूनी इलाज: BNSS 528 से समझें अपने अधिकार

पत्रकारों पर झूठी FIR का कानूनी इलाज: BNSS 528 से समझें अपने अधिकार

पत्रकारों पर मुकदमे दर्ज हों तो डरिए मत, कानून का दरवाजा खटखटाइए

मध्यप्रदेश में पत्रकारों पर FIR के बाद क्या करें? BNSS 528, हाईकोर्ट की क्वैशिंग शक्ति और कानूनी बचाव के जरूरी रास्ते समझिए।

मध्यप्रदेश में इन दिनों पत्रकारिता करना आसान काम नहीं रह गया है। सवाल पूछिए तो शिकायत, खबर प्रकाशित कीजिए तो मुकदमा, किसी अधिकारी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाइए तो नोटिस और यदि सत्ता के किसी ताकतवर व्यक्ति की नाराजगी मोल ले ली तो एफआईआर तक पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगता। लेकिन ऐसे समय में एक बात पत्रकारों को समझनी होगी—हर एफआईआर का मतलब अपराध सिद्ध होना नहीं है और हर मुकदमे के सामने पत्रकार का झुक जाना भी जरूरी नहीं है।

मेरा मानना है कि हर मामले में पुलिस अधिकारी को ही दोषी मान लेना भी उचित नहीं होगा। पुलिस पर राजनीतिक, प्रशासनिक या स्थानीय प्रभाव का आरोप अलग बात है और किसी पुलिस अधिकारी की व्यक्तिगत भूमिका सिद्ध होना अलग बात। इसलिए लड़ाई व्यक्ति से नहीं, कानून के इस्तेमाल और उसके दुरुपयोग के बीच का फर्क अदालत के सामने रखने की होनी चाहिए।

AtalHind की हर खबर सबसे पहलेJoin Channel

आज पत्रकारों के सामने सबसे बड़ा हथियार सोशल मीडिया पर गुस्सा नहीं, बल्कि कानूनी दस्तावेज और न्यायालय का दरवाजा है।

एक महत्वपूर्ण कानूनी रास्ता हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्ति है। वर्तमान आपराधिक प्रक्रिया कानून में इसका प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 528 में है, जो पुराने CrPC की धारा 482 के समकक्ष है। इसका उद्देश्य अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना और न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करना है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि चार्जशीट दाखिल हो जाने मात्र से हाईकोर्ट की क्वैशिंग की शक्ति समाप्त नहीं हो जाती। सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय में साफ कहा गया कि धारा 482 के तहत चार्जशीट को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार किया जा सकता है; कानून में ऐसी याचिका को केवल इस आधार पर रोकने की व्यवस्था नहीं है कि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है या आरोप तय होने वाले हैं। वर्तमान व्यवस्था में इसका संबंध BNSS की धारा 528 से है।

यानी किसी पत्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई, जांच पूरी हो गई और चार्जशीट भी अदालत में दाखिल हो गई, तब भी यदि उसके पास यह दिखाने के ठोस आधार हैं कि एफआईआर में अपराध के आवश्यक तत्व ही नहीं बनते, कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है या उपलब्ध सामग्री के आधार पर मुकदमा जारी रखना न्याय के विरुद्ध होगा, तो हाईकोर्ट की शरण ली जा सकती है। लेकिन यहां एक भ्रम दूर करना जरूरी है।

सिर्फ धारा 528 की याचिका दाखिल कर देने से गिरफ्तारी पर स्वतः रोक नहीं लगती। गिरफ्तारी से सुरक्षा के लिए अदालत से अलग और स्पष्ट राहत मांगनी पड़ सकती है। परिस्थितियों के अनुसार अग्रिम जमानत या अंतरिम संरक्षण का रास्ता उपलब्ध हो सकता है। इसलिए पत्रकारों को आधी-अधूरी कानूनी जानकारी लेकर यह मानकर नहीं बैठ जाना चाहिए कि हाईकोर्ट में याचिका डालते ही पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकती। कानून में अधिकार है, लेकिन उसका इस्तेमाल सही प्रक्रिया के साथ करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट का एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि हाईकोर्ट को क्वैशिंग के मामले में मिनी ट्रायल नहीं करना चाहिए। अदालत मुख्य रूप से यह देखती है कि एफआईआर, चार्जशीट और उपलब्ध सामग्री को प्रथमदृष्टया देखने पर अपराध के आवश्यक तत्व बनते हैं या नहीं। जहां आपराधिक कार्यवाही अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग के रूप में सामने आती है, वहां हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है।

मध्यप्रदेश में पत्रकारों से जुड़े एक हालिया मामले में भी हाईकोर्ट के समक्ष यह आरोप रखा गया कि पत्रकार की रिपोर्टिंग के बाद उसके खिलाफ प्रतिशोधात्मक कार्रवाई हुई। उस मामले में याचिकाकर्ता ने पुलिस अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए और एफआईआर को पत्रकारिता को दबाने की कार्रवाई बताया। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जहां आरोप और तथ्य विवादित हों तथा प्रथमदृष्टया अपराध की सामग्री मौजूद हो, वहां धारा 528 के तहत हस्तक्षेप सीमित रहता है। यही पत्रकारों के लिए सबसे बड़ा सबक है। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि एफआईआर राजनीतिक दबाव में हुई।

अदालत में आपको दस्तावेज दिखाने होंगे। खबर कब प्रकाशित हुई? खबर में क्या तथ्य थे? आपके पास उनके प्रमाण क्या थे? शिकायत कब हुई? शिकायतकर्ता और पत्रकार के बीच पहले से कोई विवाद था या नहीं? एफआईआर दर्ज करने में असामान्य देरी हुई या नहीं? पुलिस ने उपलब्ध दस्तावेजों की जांच की या नहीं? पत्रकार को पहले कोई नोटिस दिया गया या सीधे एफआईआर दर्ज कर दी गई? आरोप और उपलब्ध रिकॉर्ड में विरोधाभास क्या हैं? जांच में कौन-कौन से दस्तावेज शामिल किए गए और कौन से छोड़े गए? यही वह सामग्री है जिससे अदालत के सामने पूरी तस्वीर रखी जा सकती है।

और यदि किसी पत्रकार को लगता है कि उसके खिलाफ जानबूझकर झूठी शिकायत की गई है, तो केवल एफआईआर रद्द कराने की कोशिश ही एकमात्र रास्ता नहीं है। मामले के तथ्यों और लागू कानून के आधार पर सक्षम न्यायालय के समक्ष निजी शिकायत/परिवाद या अन्य वैधानिक उपचार पर भी वकील से सलाह ली जा सकती है।

लेकिन यहां भी एक सावधानी बहुत जरूरी है। थाना प्रभारी, एसपी या किसी मंत्री को सिर्फ इसलिए आरोपी बना देना कि पत्रकार के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है, कानूनी रूप से अपने-आप उचित नहीं हो जाता। प्रत्येक व्यक्ति के खिलाफ विशिष्ट भूमिका, कथित अपराध के आवश्यक तत्व और उपलब्ध साक्ष्य दिखाने पड़ेंगे। सरकारी अधिकारी के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्य से संबंधित कथित कृत्य में अभियोजन शुरू करने से पहले कानून में लागू पूर्व स्वीकृति अथवा अन्य वैधानिक शर्तें भी प्रासंगिक हो सकती हैं। इसलिए भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय दस्तावेजी और कानूनी रणनीति जरूरी है।

यानी पत्रकार को यह नहीं कहना चाहिए कि "सरकार ने मुकदमा किया तो हम भी सबको आरोपी बना देंगे।" पत्रकार को कहना चाहिए जिसने कानून का दुरुपयोग किया है, उसके खिलाफ कानून के भीतर रहकर जवाब मांगा जाएगा।यही लोकतंत्र का रास्ता है।

आज जरूरत इस बात की है कि पत्रकार मुकदमे से घबराकर अपनी कलम बंद न करे। अगर खबर गलत है तो कानून अपना रास्ता अपनाए, लेकिन यदि खबर तथ्यों, दस्तावेजों और जनहित पर आधारित है और उसके बाद पत्रकार को डराने के लिए आपराधिक प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जा रहा है, तो उस पूरी प्रक्रिया की न्यायिक जांच मांगना पत्रकार का वैधानिक अधिकार है।

पत्रकारिता कोई अपराध नहीं है। सवाल पूछना अपराध नहीं है। सरकार की आलोचना अपराध नहीं है। लेकिन पत्रकारिता के नाम पर अपराध करना भी पत्रकारिता नहीं है। इसलिए लड़ाई दोनों तरफ से कानून के भीतर होनी चाहिए।

मध्यप्रदेश के पत्रकार भाइयों से मेरी सीधी अपील है एफआईआर देखकर घर में बैठकर डरने के बजाय एफआईआर की कॉपी उठाइए, चार्जशीट पढ़िए, अपने दस्तावेज जुटाइए और सक्षम आपराधिक वकील से तत्काल कानूनी राय लीजिए। यदि मामला वास्तव में कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग का है तो हाईकोर्ट की धारा 528 की शक्ति का इस्तेमाल करने का रास्ता मौजूद है। और हां, अदालत में सिर्फ नारा लेकर मत जाइए।

तथ्य लेकर जाइए। दस्तावेज लेकर जाइए। तारीख लेकर जाइए। खबर की मूल कॉपी लेकर जाइए। स्रोत और रिकॉर्ड लेकर जाइए। क्योंकि सत्ता के सामने पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत उसका शोर नहीं, उसका साक्ष्य है।

पुलिस से लड़ाई नहीं, गलत कार्रवाई से लड़ाई होनी चाहिए। अधिकारी से दुश्मनी नहीं, कानून के दुरुपयोग का सवाल होना चाहिए। सरकार से व्यक्तिगत बदला नहीं, जवाबदेही मांगनी चाहिए।

और जब मामला अदालत में पहुंच जाए तो फैसला अदालत को करने दीजिए। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार ताकतवर हो सकती है, पुलिस के पास अधिकार हो सकते हैं, शिकायतकर्ता के पास प्रभाव हो सकता है, लेकिन अंततः कानून के सामने हर कार्रवाई को कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है।

यही वह जगह है जहां डरे हुए पत्रकार और जागरूक पत्रकार के बीच फर्क पैदा होता है। मुकदमा दर्ज होना अंत नहीं है। कई बार वहीं से कानून की असली लड़ाई शुरू होती है।

राजेन्द्र सिंह जादौन
राजेन्द्र सिंह जादौन
Share:

Comments

Leave a comment