मोदी की कुर्सी पर संकट? सुप्रीम कोर्ट का पूरा सच

2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून की पृष्ठभूमि और विवाद की शुरुआत
भारत के संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान है। लंबे समय तक इसके लिए कोई स्पष्ट संसदीय कानून नहीं था और राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर ये नियुक्तियां की जाती थीं। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयुक्तों का चयन 3 सदस्यीय समिति करेगी। इस समिति में देश के प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल थे।
हालांकि, 2023 के अंत में केंद्र सरकार ने संसद में नया कानून पारित कराया। इस नए कानून के तहत चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर कर दिया गया। नई व्यवस्था में समिति के तीन सदस्य बनाए गए:
- भारत के प्रधानमंत्री (अध्यक्ष)
- केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री (प्रधानमंत्री द्वारा नामित)
- लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता)
इस बदलाव का सीधा गणित यह था कि 3 सदस्यीय समिति में सरकार के पास हमेशा 2-1 का स्पष्ट बहुमत रहेगा। इस कानून के लागू होने के बाद ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था, जिसे याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
मोदी की कुर्सी पर संकट? सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पूरा सच
नई दिल्ली / 23 सितंबर 2026 / अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुर्सी जाने, सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई और 2019 के वाराणसी लोकसभा चुनाव से जुड़े एक पुराने मामले को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चा में कई तरह के दावे सामने आ रहे हैं। इसी संदर्भ में वायरल हो रहे एक वीडियो का शीर्षक भी सवाल उठाता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई से प्रधानमंत्री पद पर कोई संकट खड़ा हो गया है। लेकिन अदालत के रिकॉर्ड और उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्टों को अलग-अलग देखने पर वास्तविक कानूनी स्थिति कुछ और सामने आती है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पद पर बने रहने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का कोई ऐसा हालिया आदेश सामने नहीं आया है, जिसमें उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाने या उनकी सरकार को समाप्त करने का निर्देश दिया गया हो। 2026 में जिस मामले का उल्लेख इस तरह की चर्चाओं में किया जा रहा है, उसकी जड़ 2019 के वाराणसी लोकसभा चुनाव और पूर्व बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव के नामांकन से जुड़ी है। सुप्रीम कोर्ट का मुख्य फैसला इस मामले में चुनाव याचिका की वैधता और याचिकाकर्ता के कानूनी अधिकार से संबंधित था।
2019 में क्या हुआ था?
2019 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी सीट देश की सबसे चर्चित सीटों में शामिल थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में यहां से चुनाव मैदान में थे। पूर्व बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने भी वाराणसी से चुनाव लड़ने की कोशिश की थी, लेकिन उनका नामांकन रद्द हो गया था।
तेज बहादुर यादव को बीएसएफ से 2017 में बर्खास्त किया गया था। चुनाव के दौरान उनके नामांकन के साथ Representation of the People Act, 1951 की धारा 33(3) से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल उठा। कानून के अनुसार, सरकारी सेवा से बर्खास्त ऐसे व्यक्ति को नामांकन के साथ निर्वाचन आयोग से संबंधित प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना होता है कि उसकी बर्खास्तगी भ्रष्टाचार या राज्य के प्रति अवफादारी के कारण नहीं हुई थी।
तेज बहादुर यादव ने वाराणसी से अपना नामांकन दाखिल किया, लेकिन आवश्यक प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं होने के कारण उनका नामांकन स्वीकार नहीं किया गया। इसके बाद उन्होंने नरेंद्र मोदी के वाराणसी से निर्वाचन को चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका दायर की। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, जहां याचिका को प्रारंभिक स्तर पर खारिज कर दिया गया।
मामले में मुख्य सवाल यह था कि क्या तेज बहादुर यादव, जिनका नामांकन कानून के अनुसार वैध रूप से स्वीकार नहीं हुआ था, स्वयं को “उम्मीदवार” मानते हुए चुनाव याचिका दाखिल कर सकते थे। इसी कानूनी प्रश्न पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी विचार किया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
24 नवंबर 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने Tej Bahadur v. Shri Narendra Modi मामले में फैसला सुनाया। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार अदालत ने माना कि आवश्यक प्रमाणपत्र के अभाव में तेज बहादुर यादव की उम्मीदवारी कानून की नजर में वैध रूप से स्थापित नहीं हुई थी। इसलिए वह Representation of the People Act की धारा 81 के तहत ऐसी चुनाव याचिका दाखिल करने के लिए आवश्यक कानूनी स्थिति यानी locus standi हासिल नहीं कर सके।
सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर उनकी चुनौती को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी। इसका सीधा अर्थ यह था कि अदालत ने नरेंद्र मोदी के 2019 के वाराणसी चुनाव को इस याचिका के आधार पर रद्द नहीं किया। यह फैसला चुनाव कानून में “कौन चुनाव याचिका दाखिल कर सकता है” जैसे महत्वपूर्ण सवाल से जुड़ा था।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी चुनाव को चुनौती देने के लिए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि किसी उम्मीदवार का नामांकन विवादित था। कानून यह भी तय करता है कि चुनाव याचिका कौन व्यक्ति दाखिल कर सकता है और उस व्यक्ति का चुनाव से कानूनी संबंध क्या होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बड़ा हिस्सा इसी प्रश्न पर केंद्रित था।
2026 में फिर क्यों चर्चा में आया मामला?
2026 में इस पुराने चुनाव विवाद से जुड़ी कानूनी चर्चा फिर सामने आई। एक न्यायिक रिकॉर्ड में 27 अगस्त 2026 की तारीख का उल्लेख मिलता है और इसमें तेज बहादुर से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपील खारिज किए जाने की जानकारी दी गई है। उपलब्ध केस-सार के अनुसार, अदालत ने फिर उसी मूल कानूनी स्थिति को बरकरार रखा कि आवश्यक प्रमाणपत्र के बिना दाखिल नामांकन को वैध रूप से “दुर्ली नामांकित” उम्मीदवार की स्थिति नहीं मिलती।
इस मामले में अदालत ने Representation of the People Act की धारा 33(3), धारा 36(5), धारा 79(b) और धारा 81 जैसे प्रावधानों पर विचार किया। केस-सार के अनुसार, अदालत ने यह भी देखा कि संबंधित प्रमाणपत्र नामांकन दाखिल करते समय, जांच के समय या बाद के संबंधित चरणों में भी उपलब्ध नहीं था। इसलिए उम्मीदवार के रूप में कानूनी स्थिति स्थापित करने की दलील स्वीकार नहीं की गई।
इसका मतलब यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पद से हटाने का आदेश दिया। उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसा कोई आदेश नहीं है। मामला 2019 के वाराणसी लोकसभा चुनाव को चुनौती देने वाली कानूनी प्रक्रिया से संबंधित था और अदालत ने याचिकाकर्ता की वैधानिक स्थिति के आधार पर मामले को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी।
क्या सुप्रीम कोर्ट प्रधानमंत्री को सीधे हटा सकता है?
प्रधानमंत्री पद की संवैधानिक व्यवस्था को समझे बिना इस पूरे विवाद को समझना मुश्किल है। संविधान के अनुच्छेद 75(1) के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करते हैं। अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से जिम्मेदार होती है।
इसका व्यावहारिक महत्व यह है कि केंद्र सरकार की राजनीतिक स्थिरता लोकसभा में उसके समर्थन और बहुमत से जुड़ी होती है। प्रधानमंत्री किसी राज्य के मुख्यमंत्री की तरह सीधे किसी एक विधानसभा से नहीं, बल्कि संसदीय व्यवस्था के तहत लोकसभा में बहुमत का समर्थन रखने वाली सरकार के प्रमुख के रूप में कार्य करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट किसी चुनाव या संवैधानिक मामले में फैसला दे सकता है, लेकिन किसी पुराने चुनाव संबंधी याचिका के खारिज होने को अपने आप प्रधानमंत्री पद से हटने के आदेश के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। प्रधानमंत्री पद के बने रहने का सवाल संवैधानिक व्यवस्था, संसद में बहुमत और संबंधित कानूनी परिस्थितियों से जुड़ा होता है।
संविधान के अनुच्छेद 75 में यह भी स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से जिम्मेदार है। इसलिए “सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया और प्रधानमंत्री की कुर्सी चली जाएगी” जैसी सीधी व्याख्या संवैधानिक प्रक्रिया को बहुत सरल बनाकर पेश करती है।
2024 के लोकसभा चुनाव का क्या महत्व है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 जून 2024 को तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक वेबसाइट भी उनकी तीसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ की तारीख 9 जून 2024 दर्ज करती है।
2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 240 सीटें मिलीं। 543 सदस्यीय लोकसभा में सरकार बनाने के लिए 272 का आंकड़ा सामान्य बहुमत का महत्वपूर्ण आधार है। भाजपा अकेले 272 से नीचे रही, लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA ने 293 सीटों के साथ सरकार बनाने की स्थिति हासिल की।
इस चुनाव परिणाम ने केंद्र की राजनीतिक संरचना को 2014 और 2019 की तुलना में अलग रूप दिया। 2014 और 2019 में भाजपा को अकेले लोकसभा में बहुमत मिला था, जबकि 2024 में सरकार गठबंधन के समर्थन से बनी। यही कारण है कि 2024 के बाद प्रधानमंत्री की राजनीतिक स्थिति को समझने में NDA के घटक दलों और लोकसभा के समर्थन की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई।
6 जून 2024 की रिपोर्टों के अनुसार NDA ने नरेंद्र मोदी को अपना नेता चुना और सरकार बनाने का दावा पेश करने का निर्णय लिया था। इसके बाद 9 जून 2024 को मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
क्या 2024 के बाद सरकार अल्पमत में है?
केवल इस तथ्य से कि भाजपा के पास 240 सीटें हैं, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि केंद्र सरकार अल्पमत में है। संसदीय व्यवस्था में सरकार गठबंधन के समर्थन से भी चल सकती है। 2024 के परिणामों में NDA के पास 293 सीटें थीं, जो 272 के बहुमत के आंकड़े से ऊपर थी।
इसलिए प्रधानमंत्री की वर्तमान संवैधानिक स्थिति को केवल भाजपा की 240 सीटों के आधार पर देखना सही नहीं होगा। सरकार का समर्थन NDA के संसदीय आंकड़े और उसके घटक दलों के सहयोग से जुड़ा है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि संसद में सरकार के बहुमत का सवाल राजनीतिक और संसदीय प्रक्रिया से तय होता है। यदि किसी समय सरकार लोकसभा का विश्वास खोती है, तो उसके बाद संवैधानिक और संसदीय प्रक्रियाएं लागू होती हैं। केवल किसी पुराने चुनाव मामले में याचिका खारिज होने से यह स्थिति स्वतः पैदा नहीं होती।
2019 के वाराणसी चुनाव की पृष्ठभूमि
2019 में नरेंद्र मोदी वाराणसी से लोकसभा चुनाव जीते थे। उनके चुनाव को चुनौती देने की कोशिश तेज बहादुर यादव की ओर से की गई थी। उनकी याचिका में चुनाव प्रक्रिया और नामांकन से जुड़े मुद्दे उठाए गए थे।
लेकिन चुनाव कानून में किसी चुनाव को चुनौती देने के लिए याचिकाकर्ता की कानूनी पात्रता महत्वपूर्ण होती है। Representation of the People Act की धारा 81 के अनुसार चुनाव याचिका प्रस्तुत करने का अधिकार निर्धारित श्रेणी के लोगों को होता है। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के फैसले में इसी कानूनी स्थिति पर विस्तार से विचार किया था।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति का नामांकन कानून के अनुसार वैध उम्मीदवार के रूप में स्वीकार ही नहीं हुआ, तो केवल चुनाव मैदान में उतरने की कोशिश उसे हर स्थिति में “candidate” की कानूनी परिभाषा में नहीं ला देती। तेज बहादुर मामले में यही कानूनी प्रश्न निर्णायक बना।
इसलिए इस मामले को प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई सामान्य आपराधिक या भ्रष्टाचार का फैसला समझना भी सही नहीं होगा। यह मुख्य रूप से चुनाव कानून, नामांकन की वैधता और चुनाव याचिका दाखिल करने के अधिकार से जुड़ा मामला था।
नामांकन प्रमाणपत्र का मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों था?
Representation of the People Act, 1951 में सरकारी सेवा से बर्खास्त व्यक्ति के चुनाव लड़ने से संबंधित विशेष प्रावधान हैं। धारा 9(2) और धारा 33(3) के संदर्भ में यदि बर्खास्तगी भ्रष्टाचार या राज्य के प्रति अवफादारी के कारण हुई थी या नहीं, इसे लेकर प्रमाणपत्र की आवश्यकता का प्रश्न उठता है।
कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी सरकारी कर्मचारी की बर्खास्तगी से जुड़ी स्थिति चुनाव प्रक्रिया में स्पष्ट हो। ऐसे मामलों में नामांकन पत्र की जांच के दौरान निर्वाचन अधिकारी को कानून में दिए गए दस्तावेजों और शर्तों को देखना होता है।
तेज बहादुर यादव के मामले में आवश्यक प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं था। उपलब्ध न्यायिक केस-सार के अनुसार अदालत ने पाया कि यह प्रमाणपत्र नामांकन दाखिल करने के समय भी उपलब्ध नहीं था और बाद के महत्वपूर्ण चरणों में भी पेश नहीं किया गया। इसलिए उनकी ओर से यह तर्क स्वीकार नहीं किया गया कि उन्हें बाद में दस्तावेज देने का अवसर नहीं मिला।
यही वजह है कि इस मामले को केवल राजनीतिक विवाद के रूप में देखना अधूरा होगा। इसके केंद्र में चुनाव कानून की तकनीकी लेकिन महत्वपूर्ण व्यवस्था थी।
वीडियो के दावे और कानूनी रिकॉर्ड में अंतर
जिस वीडियो का लिंक सामने आया है, उसका शीर्षक “क्या मोदी की कुर्सी जाने वाली है” जैसे सवाल के साथ सुप्रीम कोर्ट को जोड़ता है। लेकिन किसी वीडियो का शीर्षक अपने आप अदालत के आदेश का प्रमाण नहीं होता। अदालत के फैसले को समझने के लिए मूल निर्णय या विश्वसनीय न्यायिक रिपोर्ट देखना जरूरी है।
उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं मिला कि सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2026 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद से हटाने का आदेश दिया हो। इसके उलट प्रधानमंत्री कार्यालय की सितंबर 2026 की आधिकारिक अपडेट्स में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में सरकारी कार्यक्रमों में सक्रिय दिखाई देते हैं। 19 सितंबर 2026 को प्रधानमंत्री ने नई दिल्ली के विज्ञान भवन में “The Future of Environment and Climate Dynamics” विषय पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण की अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन किया।
इसी कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत भी मौजूद थे। सम्मेलन में 17 देशों के न्यायिक प्रतिनिधियों सहित न्यायपालिका, सरकार और पर्यावरण क्षेत्र के विशेषज्ञों ने भाग लिया। इस कार्यक्रम का विषय पर्यावरण, जलवायु और न्याय से जुड़ा था, न कि प्रधानमंत्री पद से संबंधित कोई संवैधानिक विवाद।
इसलिए वीडियो के शीर्षक में “कुर्सी” को लेकर उठाया गया सवाल और अदालत के वास्तविक आदेश को अलग-अलग देखना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट और प्रधानमंत्री पद के बीच संवैधानिक संबंध
भारत की संसदीय व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट संविधान की व्याख्या और कानूनों की न्यायिक समीक्षा करने वाली सर्वोच्च अदालत है। वहीं प्रधानमंत्री सरकार के राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व का पद है। दोनों संस्थाओं की संवैधानिक भूमिकाएं अलग हैं।
यदि किसी चुनाव को लेकर अदालत में याचिका दायर होती है, तो अदालत संबंधित चुनाव कानून के तहत उस मामले की सुनवाई करती है। यदि किसी व्यक्ति की याचिका कानूनी रूप से सुनवाई योग्य नहीं पाई जाती, तो उसका अर्थ यह नहीं होता कि अदालत ने राजनीतिक सरकार पर कोई नया आदेश जारी कर दिया।
तेज बहादुर मामले में भी अदालत ने मुख्य रूप से चुनाव याचिका की maintainability और याचिकाकर्ता की locus standi पर विचार किया था। सुप्रीम कोर्ट के 2020 के फैसले के बाद यह मामला चुनाव कानून के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बना।
इसलिए “मोदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का फैसला” और “मोदी को प्रधानमंत्री पद से हटाने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला”—इन दोनों को एक ही बात मानना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।
2026 में प्रधानमंत्री की आधिकारिक गतिविधियां
सितंबर 2026 में प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर नरेंद्र मोदी के कई कार्यक्रम दर्ज हैं। 18 सितंबर को UAE के राष्ट्रपति के साथ उनकी टेलीफोन पर बातचीत का उल्लेख किया गया। 19 सितंबर को उन्होंने 20वें रोजगार मेले में 51,000 से अधिक नियुक्ति पत्र वितरित किए और पर्यावरण एवं जलवायु सम्मेलन का उद्घाटन किया।
13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा के साथ प्रधानमंत्री की बैठक भी आधिकारिक रूप से दर्ज है। इसी सम्मेलन में कई अन्य देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें हुईं।
इन आधिकारिक गतिविधियों का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे सितंबर 2026 की वर्तमान संवैधानिक स्थिति स्पष्ट होती है। उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में कार्य कर रहे हैं।
असली राजनीतिक सवाल क्या है?
यदि किसी सरकार की राजनीतिक स्थिरता पर चर्चा करनी हो तो उसका आधार अदालत के किसी पुराने चुनावी मामले से अलग होगा। इसके लिए लोकसभा में सरकार के समर्थन, गठबंधन की स्थिति, संसद के भीतर विश्वास और संबंधित संवैधानिक प्रक्रियाओं को देखा जाता है।
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 240 सीटें और NDA को 293 सीटें मिली थीं। इसलिए 2024 के बाद केंद्र सरकार की संरचना गठबंधन आधारित हुई। यह तथ्य सार्वजनिक और आधिकारिक चुनाव परिणामों से जुड़ा है।
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री पद के लिए संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 75 में निर्धारित है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से जिम्मेदार होती है। इसलिए प्रधानमंत्री के पद पर बने रहने का प्रश्न संसदीय बहुमत और संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।
यही अंतर इस पूरे विवाद को समझने की कुंजी है। अदालत में किसी चुनाव याचिका का परिणाम और केंद्र सरकार के बहुमत का सवाल दो अलग कानूनी-राजनीतिक विषय हैं।
निष्कर्ष: दावे को समझने के लिए क्या देखना चाहिए?
उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड और सितंबर 2026 तक की आधिकारिक जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पद से हटाने का आदेश दिया है। 2019 के वाराणसी चुनाव से जुड़ा तेज बहादुर यादव मामला नामांकन की वैधता, आवश्यक प्रमाणपत्र और चुनाव याचिका दाखिल करने के कानूनी अधिकार से संबंधित था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में याचिका की कानूनी स्थिति को स्वीकार नहीं किया था।
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 240 और NDA को 293 सीटें मिली थीं। नरेंद्र मोदी ने 9 जून 2024 को तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। सितंबर 2026 की प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक सूचनाएं भी उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में दर्ज करती हैं।
इसलिए सोशल मीडिया या वीडियो शीर्षक में इस्तेमाल किए गए “कुर्सी जाने वाली है” जैसे सवाल को अदालत के आदेश का सीधा निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। किसी भी ऐसे दावे की पुष्टि के लिए सुप्रीम कोर्ट का मूल आदेश, केस नंबर, तारीख और आदेश में कही गई वास्तविक बात देखना जरूरी है।
फिलहाल उपलब्ध विश्वसनीय रिकॉर्ड में ऐसा कोई सुप्रीम कोर्ट आदेश सामने नहीं है जो नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद से हटाता हो। 2019 के चुनाव से जुड़े कानूनी विवाद का निष्कर्ष अलग है और प्रधानमंत्री पद की संवैधानिक स्थिति अलग। दोनों को जोड़कर देखने से खबर का अर्थ बदल सकता है।
फैक्ट चेक: 23 सितंबर 2026 तक उपलब्ध न्यायिक, निर्वाचन और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पद से हटाने वाला कोई ऐसा सुप्रीम कोर्ट आदेश प्रमाणित नहीं होता, जैसा वीडियो के शीर्षक से संकेत मिल सकता है। 2019 वाराणसी चुनाव मामले में अदालत का प्रमुख मुद्दा तेज बहादुर यादव की नामांकन वैधता और चुनाव याचिका दाखिल करने की कानूनी पात्रता था।
स्रोत संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट से संबंधित न्यायिक रिकॉर्ड, Representation of the People Act, भारत का संविधान, निर्वाचन आयोग के 2024 लोकसभा चुनाव आंकड़े और प्रधानमंत्री कार्यालय की सितंबर 2026 की आधिकारिक अपडेट्स