महाराष्ट्र में सूखे के हालात पर गंभीर सवाल, खेतों की प्याس और व्यवस्था की नाकामी

महाराष्ट्र में इस बार सूखे ने सिर्फ खेत नहीं सुखाए, बल्कि व्यवस्था की तैयारी भी पूरी तरह से उजागर कर दी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने लातूर, धाराशिव और सोलापुर के हालात को 1972 के सूखे से भी गंभीर और भयावह बताया है। 1972 का साल महाराष्ट्र के लिए सिर्फ सूखे का साल नहीं बल्कि एक बड़ी त्रासदी था। तब पानी नहीं था और आज पानी के साथ सर्वेक्षण, पंचनामे, समितियाँ, जीआर यानी शासन निर्णय और घोषणाएँ भी मौजूद हैं। इसके बावजूद किसान की जरूरत आज भी वही पुरानी है, जो पानी और राहत है। पहले किसान आसमान देखता था लेकिन आज वह आसमान के साथ सरकार की ओर भी देखता है। अब असली सवाल यह नहीं है कि सूखा कैसे पहचाना जाए, बल्कि यह है कि कार्रवाई पानी की तरह खेत तक पहुँचेगी या फिर किसी फाइल की तरह वहीं सूख जाएगी।
सोलापुर से लातूर और धाराशिव तक खेतों की हालत सरकारी आँकड़ों से कहीं ज्यादा भयावह बनी हुई है। फसलें पूरी तरह सूख चुकी हैं, कुएँ जवाब दे चुके हैं और किसान की उम्मीद अब केवल मौसम की भविष्यवाणी पर टिकी हुई है। लातूर और धाराशिव में सामान्य से करीब आधी बारिश ही दर्ज की गई है और सोयाबीन जैसी फसलों को बहुत भारी नुकसान उठाना पड़ा है। किसान के लिए यह सिर्फ फसल का नुकसान नहीं है, बल्कि उसका बीज, उसकी मेहनत, उसकी मजदूरी, उसका कर्ज और उसके परिवार की उम्मीद सब कुछ दाँव पर लग चुका है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि खेत में पानी बिल्कुल नहीं है, लेकिन सरकारी शब्दावली में भरपूर पानी यानी सर्वेक्षण, पंचनामा, मदद, व्यवस्था और समीक्षा भरे पड़े हैं। किसान का सीधा और स्पष्ट सवाल यही है कि इनमें से कौन-सा शब्द उसके सूखे कुएँ में पानी उतारने का काम करेगा।
विकास ने पानी को पीछे छोड़ दिया है और यही 1972 तथा आज के सूखे का सबसे बड़ा और मुख्य अंतर है। उस समय उपग्रह, डिजिटल रिकॉर्ड, मौसम अलर्ट और आधुनिक जल-संरक्षण तकनीकें हमारे पास नहीं थीं, लेकिन आज यह सब कुछ हमारे पास मौजूद है। इसके बावजूद मोबाइल पर बारिश की चेतावनी तो पहुँच जाती है, लेकिन खेत तक पानी नहीं पहुँच पाता है। ड्रिप सिंचाई और जल-संरक्षण की तकनीकें आज मौजूद हैं, लेकिन सूखे खेत अब भी किसान की लाचार नियति बने हुए हैं। शहरों में लगातार स्मार्ट सुविधाएँ बढ़ रही हैं और गाँवों में पानी का घड़ा दिन-प्रतिदिन भारी होता जा रहा है। हमने अपनी सूचना को तो पूरी तरह डिजिटल कर लिया है, लेकिन पानी की व्यवस्था को डिजिटल या दुरुस्त नहीं किया है। प्रकृति ने इस बार कम पानी दिया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल हमारी व्यवस्था से है कि जो पानी हमें मिला, उसे हमने कितनी दूरदृष्टि के साथ बचाया और आपस में बाँटा है।
किसान के हिस्से में हमेशा केवल जोखिम आता है, राहत कभी नहीं आती है। मौसम की मार वही अकेला झेलता है, बाजार का उतार-चढ़ाव वही सहता है, अपना कर्ज वही चुकाता है और फसल सूखने पर सरकारी प्रक्रिया के चक्कर भी उसी को काटने पड़ते हैं। बीज उसका होता है, मेहनत उसकी होती है और नुकसान भी उसी का होता है, और अब राहत की प्रतीक्षा भी वही अकेला करे। मुख्यमंत्री फडणवीस ने प्रभावित किसानों को सहायता का पूरा भरोसा दिया है और सरकार दुष्काल संबंधी निर्णय व राहत प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की बात कह रही है। अब असली कसौटी कोई घोषणा करना नहीं है, बल्कि उस घोषणा का सही सलामत खेत तक पहुँचना है कि वह कितनी जल्दी, कितनी पारदर्शिता के साथ और कितने परिवारों तक पहुँचती है। किसान को अपनी पीड़ा पर कोई सरकारी मुहर नहीं चाहिए, बल्कि उसके साथ सीधी मदद चाहिए। भूख को कभी कोई प्रमाणपत्र नहीं चाहिए होता, उसे भोजन चाहिए और प्यास को कोई अधिसूचना नहीं चाहिए, उसे पानी चाहिए।
हमारी जल-व्यवस्था की आदत हमेशा से बहुत अजीब रही है, जब पानी प्रचुर मात्रा में रहता है तब उसकी कोई चिंता नहीं की जाती और जैसे ही संकट आता है सब लोग पानी-पानी चिल्लाने लगते हैं। यदि बारिश अधिक हो जाए तो बाढ़ आ जाती है और यदि कम हो तो सूखा पड़ जाता है, इन दोनों स्थितियों के बीच हमारी प्रशासनिक तैयारी कहीं भी दिखाई नहीं देती है। तालाबों का पुनर्जीवन, भूजल पुनर्भरण, नदियों का संरक्षण, जलागम विकास, सिंचाई दक्षता और फसल-पद्धति बदलने की बातें वर्षों से हो रही हैं, लेकिन जमीन पर उनका वास्तविक हिसाब आज भी बाकी है। हर सूखे के बाद हमेशा वही पुराना सवाल लौटकर आता है कि आखिर पानी गया कहाँ। सच तो यह है कि पानी जितना आसमान ने नहीं रोका, उससे कहीं अधिक हमने उस पानी को रोकने, बचाने और आपस में बाँटने की व्यवस्था को कभी अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया। यह सूखा आधा तो मौसम की देन है, और आधा हमारी अपनी नीतियों का ही परिणाम है।
प्रकृति को कटघरे में खड़ा करना हमेशा से बहुत आसान होता है, लेकिन अपनी खुद की जल-व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करना नहीं। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान लगातार बढ़ा है, बारिश का मिजाज पूरी तरह बदला है और लंबे सूखे ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मुश्किलों को और अधिक बढ़ा दिया है। लेकिन हर संकट का पूरा दोष सीधे प्रकृति पर डाल देना भी बहुत सुविधाजनक रास्ता है। हमने अपने तालाबों को पूरी तरह उपेक्षित किया, नदियों पर लगातार दबाव बढ़ाया, भूजल को बेहिसाब खींचा और पानी को यूं ही बहाया, और बाद में बादलों से शिकायत करने लगे कि वे बरसे क्यों नहीं। सूखा केवल बारिश की कमी नहीं है, बल्कि यह हमारी जल-बुद्धि की एक कड़ी परीक्षा है। जहाँ पानी की योजना केवल संकट आने तक सीमित हो, वहाँ सूखा एक प्राकृतिक आपदा से आगे बढ़कर बड़ी प्रशासनिक चुनौती बन जाता है। इसलिए राहत के साथ-साथ हिसाब होना भी बहुत जरूरी है कि कितना पानी आया, कितना बचा और कितना हमारी अपनी लापरवाही के कारण बह गया।
सूखा हर साल कोई नया रूप लेकर नहीं आता, हमारी प्रशासनिक तैयारी ही हमेशा पुरानी रह जाती है। आज राज्य के दो-तिहाई से अधिक जिलों से सूखा-सदृश स्थिति की खबरें लगातार आ रही हैं और प्रशासन दुष्काल के मानकों की समीक्षा करने में जुटा हुआ है। इससे यह बिल्कुल साफ हो जाता है कि यह संकट किसी एक तहसील या फसल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र की व्यापक जल-सुरक्षा से जुड़ा हुआ मामला है। इसलिए राहत पैकेज देना जरूरी तो है, लेकिन वह पूरी तरह पर्याप्त नहीं है। किसानों को तत्काल आर्थिक सहायता के साथ-साथ पीने का पानी, पशुओं के लिए चारा, रबी की फसल की तैयारी और अगले वर्ष के लिए पुख्ता जल-सुरक्षा चाहिए। वरना हर साल सूखे का एक नया रिकॉर्ड बनता रहेगा और सरकार अपनी तैयारी का वही पुराना रिकॉर्ड बार-बार दोहराती रहेगी। आज की दी जाने वाली राहत यदि कल की पुख्ता तैयारी नहीं बनती है, तो आने वाला अगला सूखा केवल मौसम की मार नहीं कहलाएगा।
अब असली सवाल फडणवीस के बयान का नहीं है, बल्कि उनके उस बयान के बाद उठाए जाने वाले ठोस कदमों का है। उन्होंने इस संकट को बहुत गंभीर बताया है और प्रभावित इलाकों का दौरा भी किया है। महाराष्ट्र की जनता अब यह देखेगी कि खेत तक पहुँची सरकारी गाड़ी के साथ राहत भी वास्तव में पहुँचती है या नहीं। क्योंकि सूखा कभी भाषण देने से नहीं बुझता है और न ही फाइलों से कम होता है, जब पानी सचमुच खेत तक पहुँचेगा, किसान का नुकसान उसके बैंक खाते में दिखेगा और उसकी अगली फसल की उम्मीद फिर से लौटेगी, तभी यह सूखा कम माना जाएगा। 1972 से भी ज्यादा भयावह सूखा बताना एक गंभीर चेतावनी है, और उसे 1972 से भी मजबूत तैयारी में बदलना ही असली परीक्षा है। इतिहास कभी यह नहीं पूछेगा कि इस सूखे को सबसे भयावह किसने बताया था, इतिहास तो सिर्फ यह पूछेगा कि जब यह धरती प्यासी थी, तब पानी को अपनी प्राथमिकता किसने दी थी।