क्या भारत "वेनेजुएला" बन रहा है?

पेट्रोल-डीजल के दाम: ₹5 और ₹3 की बढ़ोतरी का पूरा सच
नई दिल्ली / 3 अक्टूबर 2026 / अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
सारांश
निजी ईंधन विक्रेता नायरा एनर्जी ने 3 अक्टूबर 2026 से पेट्रोल के दाम ₹5 और डीजल के दाम ₹3 प्रति लीटर बढ़ा दिए हैं। यह बढ़ोतरी उसके देशभर के 7,000 से अधिक पेट्रोल पंपों पर लागू हुई है। दूसरी ओर सरकारी तेल कंपनियों के पंपों पर उस समय समान बढ़ोतरी नहीं हुई थी।
इस खबर के पीछे सिर्फ आज की कीमत नहीं, बल्कि 2014 से 2026 तक कच्चे तेल, टैक्स, रुपये की विनिमय दर, तेल कंपनियों की लागत, रूस से खरीद और वैश्विक भू-राजनीति की पूरी कहानी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88 प्रतिशत आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में बदलाव का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
पेट्रोल ₹5 और डीजल ₹3 महंगा, लेकिन पूरे देश में नहीं
3 अक्टूबर 2026 को सामने आई सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पेट्रोल और डीजल में ₹5 और ₹3 की बढ़ोतरी नायरा एनर्जी ने की है। कंपनी ने अपने देशभर के 7,000 से अधिक पंपों पर यह बदलाव तत्काल प्रभाव से लागू किया। रिपोर्टों के अनुसार बढ़ोतरी का कारण अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ी लागत तथा घरेलू बिक्री कीमत और अंतरराष्ट्रीय लागत के बीच बढ़ता अंतर है।
इसलिए इसे सीधे यह कहना सही नहीं होगा कि भारत में हर पेट्रोल पंप पर आज पेट्रोल ₹5 और डीजल ₹3 महंगा हो गया है। सरकारी तेल कंपनियों के पंपों की कीमत अलग रही। उदाहरण के लिए 3 अक्टूबर को दिल्ली में पेट्रोल ₹102.12 और डीजल ₹95.20 प्रति लीटर दर्ज किया गया था और इन दरों में उस दिन बदलाव नहीं बताया गया।
यानी उपभोक्ता को पेट्रोल पंप पर जाने से पहले यह देखना जरूरी है कि वह किस कंपनी के पंप से ईंधन खरीद रहा है। राज्य सरकारों के VAT, स्थानीय शुल्क और परिवहन लागत के कारण एक शहर से दूसरे शहर में भी कीमत अलग हो सकती है।
2014 से पहले पेट्रोल और डीजल कितना था?
पेट्रोल के दामों का इतिहास देखने पर तस्वीर और स्पष्ट होती है। सरकारी PPAC आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में 14 सितंबर 2013 को पेट्रोल ₹76.06 प्रति लीटर था। उसी अवधि में 31 अगस्त 2013 को डीजल ₹58.97 प्रति लीटर दर्ज किया गया था।
2014 में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट आई। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दिसंबर 2014 में भारतीय बास्केट क्रूड करीब 61.21 डॉलर प्रति बैरल था और दिल्ली में महीने की शुरुआत में पेट्रोल ₹63.33 तथा डीजल ₹52.51 था। 16 दिसंबर 2014 को पेट्रोल ₹61.33 और डीजल ₹50.51 तक आ गया था।
यही वह दौर था जब यह तर्क सामने आया कि अगर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमत गिरती है तो भारत में भी पेट्रोल-डीजल सस्ता होना चाहिए। वास्तव में अक्टूबर और दिसंबर 2014 में इंडियन ऑयल की ओर से कई कटौती की गई थीं और कंपनी ने अंतरराष्ट्रीय तेल कीमत तथा रुपये-डॉलर विनिमय दर को कीमत निर्धारण के प्रमुख कारणों में बताया था।
2014 से 2026 तक कीमतों में क्या-क्या बदला?
हर दिन हुए सभी बदलावों की पूरी सूची बहुत लंबी है, लेकिन कुछ बड़े पड़ाव समझना जरूरी है।
2014: पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की गिरावट के साथ कई कटौती हुईं। 19 अक्टूबर 2014 से डीजल की कीमतों को भी बाजार-निर्धारित व्यवस्था में लाया गया। सरकार के अनुसार पेट्रोल पहले से 2010 में बाजार-निर्धारित हो चुका था।
2016-17: दिल्ली में पेट्रोल की औसत कीमत ₹64.61 और डीजल की ₹53.24 प्रति लीटर रही। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय कीमतों, करों और रुपये की स्थिति के कारण कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव चलता रहा।
2020-21: कोविड-19 के बाद अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव आया। दिल्ली में पेट्रोल की औसत कीमत ₹80.84 और डीजल की ₹73.58 रही।
2021-22: फरवरी 2022 तक दिल्ली में पेट्रोल की औसत कीमत ₹98.43 और डीजल ₹87.44 प्रति लीटर तक पहुंच गया था। नवंबर 2021 में केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर ₹5 और डीजल पर ₹10 प्रति लीटर केंद्रीय उत्पाद शुल्क घटाया।
मई 2022: केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर अतिरिक्त ₹8 और डीजल पर ₹6 प्रति लीटर उत्पाद शुल्क कम किया। सरकार के अनुसार नवंबर 2021 और मई 2022 की दोनों कटौतियों को मिलाकर पेट्रोल पर कुल ₹13 और डीजल पर ₹16 प्रति लीटर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में कमी हुई।
मार्च 2024: तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल दोनों में ₹2 प्रति लीटर की खुदरा कटौती की। उस समय दिल्ली में पेट्रोल ₹94.72 और डीजल ₹87.62 प्रति लीटर बताया गया।
मार्च 2025: दिल्ली में पेट्रोल ₹94.77 और डीजल ₹87.67 प्रति लीटर बताया गया। सरकार ने फिर कहा कि कीमतें बाजार-निर्धारित हैं और तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमत, विनिमय दर और दूसरे लागत तत्वों के आधार पर निर्णय लेती हैं।
मई 2026: अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज बदलाव के बीच सरकारी तेल कंपनियों ने मई में कई चरणों में कीमतें बढ़ाईं। 19 मई 2026 को दिल्ली में पेट्रोल ₹98.64 और डीजल ₹91.58 प्रति लीटर बताया गया।
इसके बाद सरकारी तेल कंपनियों ने घरेलू उपभोक्ताओं के लिए कीमतों को काफी हद तक स्थिर रखा। 1 अक्टूबर को Reuters ने रिपोर्ट किया कि मई 2026 के बाद सरकारी खुदरा कीमतों में अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुरूप समान गति से बदलाव नहीं हुआ था और तेल कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ा था।
| समय सीमा / वर्ष | पेट्रोल औसतन दर (₹/लीटर) | डीजल औसतन दर (₹/लीटर) | अंतरराष्ट्रीय क्रूड स्थिति (अनुमानित) |
|---|---|---|---|
| 2014 (मई) | ~ ₹71.41 | ~ ₹55.49 | $100 - $105 / बैरल |
| 2016 - 2018 | ~ ₹65 - ₹78 | ~ ₹54 - ₹66 | $45 - $75 / बैरल |
| 2020 (कोविड काल) | ~ ₹69 - ₹80 | ~ ₹62 - ₹73 | $20 - $40 / बैरल |
| 2022 (चरम स्तर) | ~ ₹100 - ₹110+ | ~ ₹90 - ₹98+ | $110 - $120 / बैरल |
| 2026 (वर्तमान) | ~ ₹97.77 - ₹102+ | ~ ₹90.67 - ₹93+ | $70 - $85 / बैरल |
सवाल यह है कि क्रूड सस्ता होने पर पेट्रोल-डीजल उसी अनुपात में क्यों नहीं घटता?
यह सवाल सिर्फ राजनीतिक नहीं, आर्थिक भी है। पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमत केवल कच्चे तेल की कीमत से तय नहीं होती।
इसमें कच्चे तेल की लागत के अलावा रिफाइनिंग लागत, समुद्री परिवहन, बीमा, रुपये-डॉलर विनिमय दर, पेट्रोलियम उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय कीमत, केंद्रीय कर, राज्य VAT और डीलर कमीशन जैसे कई तत्व शामिल होते हैं। सरकार ने संसद में भी कहा है कि कीमत निर्धारण में अंतरराष्ट्रीय उत्पाद कीमत, विनिमय दर, टैक्स, अंतर्देशीय मालभाड़ा और अन्य लागत शामिल हैं।
इसलिए कच्चा तेल 20 प्रतिशत सस्ता होने का अर्थ यह नहीं कि पेट्रोल भी 20 प्रतिशत सस्ता हो जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ यह सवाल जरूर जायज है कि जब अंतरराष्ट्रीय लागत लंबे समय तक नीचे रहती है, तब उसका कितना लाभ उपभोक्ता तक पहुंचता है।
यही वजह है कि पेट्रोल की कीमत पर केवल क्रूड ऑयल देखकर निष्कर्ष निकालना अधूरा होगा। क्रूड की कीमत, डॉलर-रुपया दर और सरकार तथा राज्य के करों—तीनों को साथ देखना होगा।
भारत कितना तेल इस्तेमाल करता है?
भारत दुनिया के बड़े तेल उपभोक्ताओं में शामिल है और घरेलू उत्पादन उसकी जरूरत का छोटा हिस्सा पूरा करता है। PPAC के आंकड़ों में 2023-24 में कुल घरेलू पेट्रोलियम उत्पाद खपत लगभग 234.3 मिलियन मीट्रिक टन दर्ज हुई। इसी अवधि में घरेलू कच्चे तेल से उत्पादन और खपत की तुलना करने पर आत्मनिर्भरता करीब 12.2 प्रतिशत थी।
2024-25 में भारत ने करीब 300 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए तथा करीब 65 मिलियन मीट्रिक टन निर्यात किया। सरकार के अनुसार भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88 प्रतिशत आयात से पूरा करता है।
इसका सीधा अर्थ है कि भारत की अर्थव्यवस्था अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार से अलग होकर नहीं चल सकती। कच्चा तेल महंगा होगा तो आयात बिल, परिवहन लागत और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत को तेल कहां-कहां से मिलता है?
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपने कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता बढ़ाई है। मध्य-पूर्व के देशों के अलावा रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों से भी तेल खरीदा जाता है। सरकार ने स्वयं कहा है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए तेल खरीद को किसी एक क्षेत्र पर निर्भर रखने के बजाय अलग-अलग भौगोलिक स्रोतों से खरीद की नीति अपनाई गई है।
रूस इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह कहना कि भारत रूस से तेल नहीं खरीद रहा, वर्तमान आंकड़ों से सही नहीं है। सितंबर 2026 तक उपलब्ध रिपोर्टों में रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ था। 27 सितंबर तक रूस से भारत को लगभग 1.74 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल आने की रिपोर्ट थी।
अगस्त 2026 में रूस से भारत का आयात करीब 2.1 मिलियन बैरल प्रतिदिन था, हालांकि जुलाई के रिकॉर्ड स्तर से यह कम था। रूस के बाद UAE और Venezuela जैसे स्रोत भी महत्वपूर्ण रहे।
फिर रूस से खरीद कम होने की बात क्यों उठ रही है?
यहां अमेरिका और रूस-यूक्रेन युद्ध का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव सामने आता है। अमेरिकी प्रतिबंधों, संभावित अतिरिक्त शुल्क और रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव ने भारतीय रिफाइनरों के लिए जोखिम बढ़ाया है।
लेकिन इसे केवल यह कहकर समझना कि "भारत ट्रंप के डर से रूस से तेल खरीदना बंद कर रहा है", उपलब्ध आंकड़ों से साबित नहीं होता। जुलाई 2026 में रूस भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 50.83 प्रतिशत तक पहुंच गया था। अगस्त में यह हिस्सा घटा, लेकिन रूस फिर भी सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रहा।
सितंबर में अमेरिकी प्रतिबंध संबंधी कानून और संभावित 100 प्रतिशत टैरिफ की चर्चा के बीच भारतीय अधिकारियों ने कहा कि भारत ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीदता रहेगा।
इसलिए वास्तविक तस्वीर यह है कि भारत रूस से खरीद रहा है, लेकिन रूस से खरीद का स्तर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, अमेरिकी व्यापार नीति, चीन की मांग, रूसी आपूर्ति और मध्य-पूर्व की स्थिति से प्रभावित हो रहा है।
जनता पर पेट्रोल-डीजल महंगा होने का असर क्या होगा?
ईंधन महंगा होने का सबसे पहला असर वाहन चलाने वाले व्यक्ति के बजट पर दिखाई देता है। इसके बाद इसका असर माल ढुलाई, टैक्सी, ट्रक, बस, कृषि मशीनरी और छोटे कारोबार की लागत में पड़ सकता है।
डीजल का प्रभाव विशेष रूप से व्यापक होता है क्योंकि देश में माल परिवहन का बड़ा हिस्सा सड़क मार्ग से होता है। डीजल की लागत बढ़ने पर फल-सब्जी, खाद्यान्न, निर्माण सामग्री और अन्य वस्तुओं की ढुलाई महंगी हो सकती है।
लेकिन हर ईंधन वृद्धि का पूरा असर तुरंत खुदरा महंगाई में बदल जाए, ऐसा जरूरी नहीं है। कंपनियां कुछ लागत अपने मार्जिन में समायोजित कर सकती हैं, परिवहन कंपनियां कुछ हिस्सा वहन कर सकती हैं और मांग कमजोर होने पर कीमतों का असर भी अलग हो सकता है।
क्या सरकार कीमतें बढ़ने के अनुपात में घटाती नहीं?
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। सरकार का आधिकारिक पक्ष है कि पेट्रोल और डीजल बाजार-निर्धारित हैं और तेल विपणन कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमत, विनिमय दर तथा अन्य लागतों को देखकर कीमत तय करती हैं।
दूसरी ओर 2026 में एक अलग तस्वीर दिखाई दी। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी के बावजूद सरकारी खुदरा कीमतों को कुछ समय तक स्थिर रखा गया, जिससे तेल कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ा। 1 अक्टूबर की Reuters रिपोर्ट में सरकारी तेल कंपनियों के डीजल पर करीब ₹50 प्रति लीटर के संभावित नुकसान का उल्लेख कंपनी अधिकारियों के हवाले से किया गया था।
इससे यह समझ आता है कि तेल की कीमत और पंप पर उपभोक्ता से ली जाने वाली कीमत हमेशा एक ही गति से नहीं चलतीं। कभी उपभोक्ता को तत्काल राहत मिलती है, तो कभी कंपनियां लागत का भार उठाती हैं।
क्या भारत "वेनेजुएला" बन रहा है? पेट्रोल-डीजल के दाम और आर्थिक वास्तविकता का पूरा सच
ईंधन की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी होते ही देश भर में महंगाई और सरकारी नीतियों को लेकर तीखी बहस छिड़ जाती है। हाल ही में जब पेट्रोल ₹5 और डीजल ₹3 महंगा हुआ, तो कुछ विश्लेषकों और आम नागरिकों ने यह सवाल उठाना शुरू कर दिया कि क्या भारत वेनेजुएला जैसे महा-मुद्रास्फीति (Hyperinflation) और आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है। इस तरह की आशंकाओं की सच्चाई जानने के लिए हमें अंतरराष्ट्रीय बाजार, घरेलू अर्थशास्त्र और भारत की वास्तविक वित्तीय स्थिति का गहराई से अध्ययन करना होगा।
वेनेजुएला का संकट मुख्यतः उसकी एकतरफा अर्थव्यवस्था, नीतिगत विफलताओं, अत्यधिक कर्ज और कच्चे तेल के उत्पादन पर पूर्ण निर्भरता के कारण आया था। इसके विपरीत, भारत एक अत्यधिक विविध (Diversified) अर्थव्यवस्था है, जहाँ सेवा क्षेत्र (Service Sector), कृषि, मैन्युफैक्चरिंग और आईटी का बड़ा योगदान है। इसलिए केवल ईंधन की दरें बढ़ने से भारत के वेनेजुएला बनने की तुलना आर्थिक सिद्धांतों के आधार पर सटीक नहीं बैठती है।
क्या भारत में आर्थिक संकट या भुखमरी जैसी स्थिति आ सकती है?
'वेनेजुएला' या 'श्रीलंका' जैसे संकटों की तुलना में भारत की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत है। वेनेजुएला का विदेशी मुद्रा भंडार समाप्त हो गया था और उसका कृषि व औद्योगिक ढांचा ठप पड़ गया था। इसके विपरीत, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार $600 अरब डॉलर के सुरक्षित स्तर से ऊपर है, जो कई महीनों के आयात के लिए पर्याप्त है।
खाद्य सुरक्षा के मामले में भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर है और दुनिया के सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादकों में शामिल है। यद्यपि ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है और सब्जियों व दैनिक सामानों पर महंगाई (Inflation) का दबाव आता है, लेकिन इसे 'गृहयुद्ध' या 'दिवालियापन' जैसी चरम स्थितियों से जोड़ना तथ्यों से परे और भ्रामक है।
5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था और वित्तीय पारदर्शिता
5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि यह देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर पर आधारित आर्थिक रोडमैप है। भारत में कर संग्रह (GST Collection) रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच रहा है, और इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में भारी निवेश हो रहा है। इसके साथ ही पीएम केयर्स फंड, चुनावी बांड और सरकारी वित्तीय रिपोर्टों पर पारदर्शिता को लेकर संसद और न्यायपालिका में बहसें चलती रहती हैं, जो कि एक जीवित लोकतंत्र का हिस्सा हैं।
ईंधन पर निर्भरता कम करने के लिए भारत तेजी से ग्रीन एनर्जी, सौर ऊर्जा, इथेनॉल ब्लेंडिंग (20% लक्ष्य) और इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की ओर कदम बढ़ा रहा है। दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा हासिल करने के लिए यह बदलाव अनिवार्य है ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार के झटकों से भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिक का बजट सुरक्षित रह सके।
क्या सरकार कुछ छिपा रही है?
पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ने मात्र से यह निष्कर्ष निकालना कि सरकार कोई बड़ा घोटाला छिपा रही है, तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। ऐसे आरोप के लिए दस्तावेज, ऑडिट, जांच या न्यायिक निष्कर्ष जरूरी होंगे।
इसी तरह PM CARES Fund और राजनीतिक चंदे को पेट्रोल कीमत से सीधे जोड़ना भी बिना प्रमाण के उचित नहीं है। PM CARES की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार फंड का स्वतंत्र ऑडिटर नियुक्त किया गया है और उसके खातों के ऑडिट का उल्लेख किया गया है।
इलेक्टोरल बॉन्ड के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी 2024 को योजना और संबंधित कानूनी प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित किया था और बाद में SBI से बॉन्ड संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। चुनाव आयोग ने संबंधित खरीद और रिडेम्पशन डेटा सार्वजनिक किया है।
इसलिए सवाल पूछना लोकतंत्र में जरूरी है, लेकिन सवाल और साबित तथ्य में अंतर बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का सवाल
भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य लंबे समय से आर्थिक नीति की चर्चा में रहा है। लेकिन किसी देश की आर्थिक ताकत केवल GDP के आंकड़े से तय नहीं होती।
आम नागरिक के लिए रोजगार, वास्तविक आय, खाद्य और परिवहन लागत, ऊर्जा की कीमत, स्वास्थ्य और शिक्षा की लागत भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए पेट्रोल-डीजल की कीमत पर बहस को केवल सरकार बनाम विपक्ष के राजनीतिक विवाद में सीमित करने के बजाय व्यापक आर्थिक तस्वीर के साथ देखना चाहिए।
आज का सबसे बड़ा तथ्य यह है कि भारत की ऊर्जा जरूरत तेजी से बढ़ रही है और देश अभी भी कच्चे तेल के लिए आयात पर बहुत निर्भर है। सरकार ने आयात निर्भरता घटाने के लिए प्राकृतिक गैस, इथेनॉल, बायोफ्यूल, इलेक्ट्रिक वाहन, ऊर्जा दक्षता और घरेलू तेल-गैस उत्पादन बढ़ाने जैसी नीतियों का उल्लेख किया है।
निष्कर्ष: असली सवाल कीमत से आगे का है
3 अक्टूबर 2026 की ₹5 पेट्रोल और ₹3 डीजल की बढ़ोतरी को सिर्फ "मोदी सरकार ने पेट्रोल महंगा कर दिया" कहना पूरी तस्वीर नहीं है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार इस दिन बढ़ोतरी नायरा एनर्जी ने की थी, जबकि सरकारी तेल कंपनियों के पंपों पर समान वृद्धि नहीं हुई थी।
लेकिन इस घटना ने एक बड़ा पुराना सवाल फिर सामने ला दिया है—जब भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार से करीब 88 प्रतिशत कच्चा तेल खरीदता है, तब वैश्विक कीमतों का जोखिम आखिर कितना उपभोक्ता उठाएगा, कितना तेल कंपनियां और कितना सरकार तथा राज्य सरकारें?
रूस से तेल खरीदना बंद हुआ है, ऐसा कहना वर्तमान आंकड़ों के विपरीत है। हां, रूस से खरीद पर अमेरिका और पश्चिमी प्रतिबंधों तथा संभावित टैरिफ का दबाव एक वास्तविक आर्थिक कारक है।
इसलिए भारत के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न किसी एक पार्टी या नेता के भविष्य का नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, पारदर्शी कीमत निर्धारण, कर नीति और आम उपभोक्ता को वैश्विक तेल संकट से बचाने की नीति का है। इन सवालों के जवाब आंकड़ों और सार्वजनिक दस्तावेजों से तलाशना ही सबसे उपयोगी रास्ता है।