सोनीपत के युवा तीरंदाज कुशल दलाल ने जापान में आयोजित एशियन गेम्स-2026 में जीता स्वर्ण पदक

सोनीपत के गोहाना के गांव सिवानका से युवा तीरंदाज कुशल दलाल ने जापान में आयोजित आइची-नागोया एशियन गेम्स-2026 में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतकर देश, हरियाणा और सोनीपत का नाम रोशन किया है। - कुशल दलाल ने एशियन गेम्स में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया है। - कुशल दलाल के इस स्वर्ण पदक के पीछे उनके माता-पिता का कड़ा संघर्ष और बड़ा त्याग जुड़ा हुआ है।
कंपाउंड पुरुष टीम स्पर्धा में चीन को हराया
कंपाउंड पुरुष टीम स्पर्धा के फाइनल मुकाबले में कुशल दलाल, साहिल जाधव और गणेश मणि रत्नम की भारतीय टीम ने चीन को 238-237 के बेहद रोमांचक अंतर से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। मुकाबले के बिल्कुल निर्णायक क्षण में कुशल दलाल ने बेहद सटीक निशाना लगाते हुए 10 अंक हासिल किए और इसके साथ ही भारत की जीत पूरी तरह से पक्की कर दी थी।
दबाव के बीच भारतीय टीम ने की शानदार वापसी
फाइनल मुकाबले की शुरुआत में भारतीय टीम शुरुआती दौर में चीन की टीम से कुछ अंक पीछे चल रही थी, लेकिन सभी खिलाड़ियों ने भारी दबाव के बीच लगातार बेहद सटीक निशाने लगाए और मुकाबले में शानदार वापसी की। अंतिम दौर के खेल में दोनों ही टीमों के बीच बेहद कड़ा मुकाबला देखने को मिला था। कुशल दलाल के आखिरी सटीक निशाने की वजह से ही भारतीय टीम केवल एक अंक के अंतर से जीत दर्ज कर पाई और स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया।
माता-पिता का वर्षों का त्याग और कड़ा संघर्ष
कुशल दलाल की इस बहुत बड़ी उपलब्धि के पीछे उनके माता-पिता का वर्षों पुराना त्याग और पूरे परिवार का कठिन संघर्ष भी गहराई से जुड़ा हुआ है। कुशल के पिता संजय दलाल खेती-बाड़ी का काम करते हैं, जबकि उनकी माता गीता हरियाणा राज्य कृषि विभाग से जुड़े कृषि विपणन क्षेत्र में लेखाकार के पद पर खरखौदा में सेवारत हैं। अपने बेटे को तीरंदाजी के खेल में लगातार आगे बढ़ाने के लिए परिवार ने हमेशा उसकी सभी जरूरतों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी थी।
महंगे खेल उपकरण और नियमित कड़ा अभ्यास
खेल के महंगे उपकरण होने के बावजूद उनके पिता ने करीब 3.50 लाख रुपये की कीमत का धनुष और तीर खरीदकर अपने बेटे के अभ्यास में किसी भी तरह की कोई कमी नहीं आने दी थी। वर्ष 2017 के दौरान कुशल ने अपनी माता गीता के साथ रोहतक के सेक्टर-1 में रहकर राजीव गांधी स्टेडियम में तीरंदाजी का नियमित अभ्यास करना शुरू किया था। वह रोजाना शाम को तीन बजे से लेकर छह बजे तक तीरंदाजी का अभ्यास किया करता था। इसके तुरंत बाद वह शाम को छह बजे से लेकर साढ़े सात बजे तक अपना शारीरिक प्रशिक्षण भी लिया करता था।
मां का साथ और सरकारी नौकरी की तैयारी
बेटे की नियमित प्रैक्टिस के दौरान उनकी माता गीता भी लगातार मैदान में उनके साथ ही मौजूद रहती थीं। उस समय वह अपनी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रही थीं और बेटे के अभ्यास के दौरान मैदान में ही बैठकर अपनी पढ़ाई करती थीं। इस तरह बेटा अपनी खेल की तैयारी लगातार करता रहा और मां भी अपनी मंजिल को पाने के लिए लगातार मेहनत करती रहीं। गीता के अनुसार, बेटे के खेल में किसी भी तरह की कोई बाधा न आए, इसके लिए उनके परिवार ने कई बार सामाजिक और पारिवारिक कार्यक्रमों से पूरी तरह दूरी बना ली थी। कुशल के अभ्यास और उसकी प्रतियोगिताओं को हमेशा सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी गई थी। लगातार कड़ी मेहनत के बाद गीता ने अपनी सरकारी नौकरी हासिल कर ली और आज वह लेखाकार के पद पर पूरी निष्ठा से कार्यरत हैं। अपने बेटे की इस सफलता में मां की मैदान पर मौजूदगी और उनका प्रोत्साहन लगातार हमेशा बना रहा था।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शानदार सफर
कुशल ने वर्ष 2018 में आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में अंडर-14 वर्ग के दौरान अपना सबसे पहला स्वर्ण पदक जीता था और इसके बाद उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसका चयन खेलो इंडिया के लिए हुआ और उसे हरियाणा की खेल नीति का भी पूरा लाभ मिला था। राष्ट्रीय स्कूल खेलों सहित देश भर की विभिन्न प्रतियोगिताओं में उसने लगातार कई पदक हासिल किए हैं। वर्ष 2021 में पोलैंड में आयोजित यूथ वर्ल्ड चैंपियनशिप के दौरान कुशल ने दो स्वर्ण पदक अपने नाम किए थे। वह अब तक सब-जूनियर, जूनियर और सीनियर आयु वर्गों में कुल मिलाकर 15 से भी अधिक पदक जीत चुका है। हर एक नई प्रतियोगिता के साथ उसका लक्ष्य और भी ज्यादा बड़ा होता चला गया था। एशियन गेम्स में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर उसने अपनी कड़ी मेहनत के साथ-साथ अपने माता-पिता के त्याग को भी पूरी तरह से सार्थक कर दिखाया है।
मुख्यमंत्री की बधाई और खेल व्यवस्था का योगदान
कुशल दलाल की इस शानदार उपलब्धि पर हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने उसे फोन करके अपनी तरफ से बधाई दी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हरियाणा राज्य के सभी खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर लगातार बहुत बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं और पूरे प्रदेश तथा देश का गौरव लगातार बढ़ा रहे हैं। कुशल की इस बड़ी सफलता में उसके परिवार के साथ-साथ उसके सभी प्रशिक्षकों और खेल व्यवस्था का भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है। नियमित अभ्यास, शारीरिक प्रशिक्षण, महंगे खेल उपकरण, प्रतियोगिताओं की बेहतरीन तैयारी और परिवार के निरंतर सहयोग ने ही उसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बड़ी पहचान दिलाई है।