कचहरी न जाना कविता: कैलाश गौतम का व्यंग्य आज भी क्यों सही?

नई दिल्ली/03 अक्टूबर 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
चंदौली के जनकवि कैलाश गौतम की प्रसिद्ध कविता ‘कचहरी न जाना’ अदालती व्यवस्था की खामियों पर तीखा व्यंग्य करती है। कवि बेटे को सलाह देते हैं कि कचहरी में सच्चाई का क्या हाल होता है। यह रचना आज भी सोशल मीडिया और कवि सम्मेलनों में सुनाई जाती है और लोगों को सोचने पर मजबूर करती है।
कविता की पहली पंक्ति सुनते ही दिल में एक टीस सी उठती है। “कचहरी न जाना बेटे” – यह सलाह सिर्फ शब्दों की नहीं, बल्कि अनुभव की आवाज लगती है। कैलाश गौतम ने जब यह कविता लिखी तो शायद उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि दशक बाद भी लोग इसे सुनकर सिर हिलाएंगे। अदालत की जटिलताओं और आम आदमी की मजबूरी को उन्होंने इतने सरल अंदाज में पेश किया कि आज भी यह प्रासंगिक बनी हुई है।
कैलाश गौतम का जन्म 8 जनवरी 1944 को उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले (तत्कालीन वाराणसी) के डिग्धी गांव में हुआ था। वे हिंदी और भोजपुरी दोनों भाषाओं के जनकवि माने जाते हैं। 9 दिसंबर 2006 को उनका निधन हो गया। उनकी कविताएं गांव की जिंदगी, परिवार और समाज की सच्चाई को बिना लाग-लपेट के पेश करती हैं। ‘कचहरी न जाना’ उनकी सबसे चर्चित रचनाओं में से एक है।
कविता में कवि अपने बेटे को सलाह देते हैं कि घर पर झगड़ा करना, बीवी को खिलाना-पिलाना या जंगल में आग जलाना बेहतर है, लेकिन कचहरी न जाना। वे कहते हैं कि कचहरी हमारी-तुम्हारी नहीं है। वहां रिश्तेदारी नहीं चलती। पहले तिवारी थे, अब तिवारी नहीं रहे। कचहरी वकीलों की थाली है और पुलिस के लिए छोटी साली जैसी है। यहां पैरवी अब दलाली बन गई है।
भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे-तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है
कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
यहाँ पैरवी अब दलाली है बेटे
कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटे
यही ज़िन्दगी उनको देती है बेटे
खुले आम कातिल यहाँ घूमते हैं
सिपाही दरोगा चरण चूमते है
कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
भला आदमी किस तरह से फँसा है
यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे
यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे
कचहरी का मारा कचहरी में भागे
कचहरी में सोये कचहरी में जागे
मर जी रहा है गवाही में ऐसे
है तांबे का हंडा सुराही में जैसे
लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगे
हथेली पर सरसों उगाते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है
उसी की कसम लो जो हाज़िर नहीं है
है बासी मुँह घर से बुलाती कचहरी
बुलाकर के दिन भर रुलाती कचहरी
मुकदमें की फाइल दबाती कचहरी
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी
कचहरी का पानी जहर से भरा है
कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है
मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे
मेरे जैसा कैसे निभाता है बेटे
दलालों नें घेरा सुझाया-बुझाया
वकीलों नें हाकिम से सटकर दिखाया
धनुष हो गया हूँ मैं टूटा नहीं हूँ
मैं मुट्ठी हूँ केवल अंगूंठा नहीं हूँ
नहीं कर सका मैं मुकदमें का सौदा
जहाँ था करौदा वहीं है करौदा
कचहरी का पानी कचहरी का दाना
तुम्हे लग न जाये तू बचना बचाना
भले और कोई मुसीबत बुलाना
कचहरी की नौबत कभी घर न लाना
कभी भूल कर भी न आँखें उठाना
न आँखें उठाना न गर्दन फँसाना
जहाँ पांडवों को नरक है कचहरी
वहीं कौरवों को सरग है कचहरी। ।
आगे कवि बताते हैं कि कचहरी में सच्चाई की दुर्दशा है। अच्छा आदमी कैसे फंस जाता है। सिपाही और इंस्पेक्टर खुलेआम पांव चूमते हैं और हत्यारे खुले घूमते हैं। गवाह में मुर्दा जिंदा हो जाता है। तांबे की चाबुक घड़े में फेंक दी जाती है। कवि चेतावनी देते हैं कि कचहरी की स्थिति घर में न लाओ।
यह कविता सिर्फ हास्य नहीं बल्कि गहरी सामाजिक टिप्पणी है। उस दौर में भी अदालती प्रक्रिया लंबी, महंगी और जटिल थी। आम आदमी के लिए न्याय पाना मुश्किल लगता था। कैलाश गौतम ने लोक भाषा में इसे व्यक्त कर दिया। उनकी शैली में व्यंग्य इतना सहज है कि सुनने वाला हंसते-हंसते सोचने लगता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखें तो स्वतंत्रता के बाद भारतीय न्याय व्यवस्था में कई सुधार हुए। संविधान ने सबको समान अधिकार दिए। लेकिन व्यावहारिक स्तर पर देरी, खर्च और प्रक्रिया की जटिलता आम शिकायत रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और विभिन्न आयोगों की रिपोर्ट्स में लंबित मामलों की संख्या हमेशा चर्चा में रही है। कविता इन्हीं मुद्दों को लोक शैली में छूती है।
विशेषज्ञ साहित्यकारों का मानना है कि कैलाश गौतम की यह रचना लोक कविता की परंपरा को आगे बढ़ाती है। वे कबीर और तुलसी की तरह समाज की कमजोरियों को उजागर करते हैं लेकिन हल्के-फुल्के अंदाज में। उनकी भाषा बोलचाल की है इसलिए गांव से शहर तक हर कोई समझ लेता है। कवि सम्मेलनों में यह कविता अक्सर सुनाई जाती रही है।
आज सोशल मीडिया ने इस कविता को नई जिंदगी दी है। फेसबुक रील्स, यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर विभिन्न आवाजों में इसकी रिकॉर्डिंग वायरल हो रही है। युवा पीढ़ी जो अदालती मामलों से दूर रहना चाहती है, इस कविता के जरिए व्यवस्था की सच्चाई समझ रही है। कई वीडियो में कवि के पुत्र डॉ. श्लेष गौतम की आवाज में भी यह सुनाई गई है।
स्थानीय स्तर पर चंदौली और वाराणसी क्षेत्र में लोग आज भी उनकी पुण्यतिथि और जन्मदिन पर उनकी रचनाओं का स्मरण करते हैं। साहित्यिक आयोजनों में ‘कचहरी न जाना’ का पाठ होता है। यह कविता याद दिलाती है कि न्याय व्यवस्था को आम आदमी के अनुकूल बनाना जरूरी है। लंबी प्रक्रिया और खर्च से लोग न्याय से दूर होते हैं।
सरकारी प्रयासों में ई-कोर्ट, ऑनलाइन फाइलिंग और वैकल्पिक विवाद समाधान जैसे कदम उठाए गए हैं। फिर भी कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि जागरूकता और प्रक्रिया को सरल बनाने की जरूरत बनी हुई है। कैलाश गौतम की कविता इन्हीं मुद्दों को भावनात्मक स्तर पर छूती है।
कविता का संदेश साफ है। झगड़े घर पर सुलझा लो। अदालत अंतिम विकल्प हो। लेकिन जब जाना पड़े तो व्यवस्था ऐसी हो कि आम आदमी आसानी से न्याय पा सके। उनकी रचनाएं सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि समाज को आईना दिखाने का काम भी करती हैं
आज जब लोग सोशल मीडिया पर इस कविता को शेयर कर रहे हैं तो लगता है कि कैलाश गौतम की आवाज अभी भी जिंदा है। चंदौली की मिट्टी से निकले इस कवि ने लोक जीवन को अपनी कलम से अमर कर दिया। ‘कचहरी न जाना’ जैसी रचनाएं हमें याद दिलाती हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है।
पाठकों को जागरूक करने के लिए जरूरी है कि हम ऐसी रचनाओं को पढ़ें, सुनें और आगे बढ़ाएं। न्याय व्यवस्था में सुधार की चर्चा करते समय इन लोक आवाजों को भी याद रखना चाहिए। कैलाश गौतम की कविता हंसाती है, रुलाती है और सोचने पर मजबूर करती है। यही उसकी ताकत है।
स्थानीय संस्कृति को मजबूत रखने के लिए ऐसी कविताओं का संरक्षण जरूरी है। स्कूल-कॉलेजों में लोक कविताएं पढ़ाई जाएं तो नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ेगी। कैलाश गौतम जैसे कवियों की विरासत को जीवित रखना हमारे समाज की जिम्मेदारी है।
डिस्क्लेमरभारत की वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हमने जनकवि कैलाश गौतम जी की प्रसिद्ध कविता “कचहरी न जाना बेटे” अटलहिंद पर प्रकाशित की है। इसका उद्देश्य केवल गौतम जी द्वारा दी गई सीख को जनता तक पहुँचाना और हिंदी काव्य के प्रचार-प्रसार में योगदान देना है।यदि किसी रचनाकार, उत्तराधिकारी या कॉपीराइट-धारक को इस प्रकाशन से कोई आपत्ति हो, तो उनसे विनम्र अनुरोध है कि वे हिंदी साहित्य और लोक काव्य के प्रसार को ध्यान में रखते हुए किसी भी अनजाने में हुई भूल को क्षमा कर दें। कॉपीराइट संबंधी कोई भी आपत्ति होने पर कृपया हमें atalhind@gmail.com (mailto:atalhind@gmail.com) पर सूचित करें। जिन रचनाओं के संबंध में कॉपीराइट-धारक आपत्ति प्रकट करेंगे, उन्हें तुरंत हटा दिया जाएगा। हम साहित्य के सम्मान और कानूनी प्रावधानों का पूरा ध्यान रखते हैं।