न्यायमूर्ति अवनीन्द्र कुमार सिंह की अनूठी विदाई, जीपीएफ की एक करोड़ से अधिक राशि और देह समाज को समर्पित

एक दिन सब छूट जाना है और उन्होंने इसे पहले ही छोड़ दिया है। जिस देह ने जीवन जिया है, वही कल किसी को जीवन सिखाएगी। जीवनभर न्याय देने के बाद अंत में खुद को भी समाज के नाम कर दिया गया है। सेवानिवृत्ति सामान्यतः वह घड़ी होती है, जब आदमी अपनी उपलब्धियों का हिसाब लगाता है और आगे के जीवन की सुविधाओं की चिंता करता है। लेकिन न्यायमूर्ति अवनीन्द्र कुमार सिंह की विदाई ने इस अर्थ को पूरी तरह से उलट दिया है। 36 वर्षों की न्यायिक सेवा के बाद जब वे मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से विदा हुए, तब उनके साथ उपलब्धियों की लंबी सूची नहीं बल्कि समाज के नाम दो बड़े संकल्प थे। उन्होंने जीवन में अर्जित जीपीएफ की लगभग एक करोड़ एक लाख रुपये की राशि प्रधानमंत्री केयर्स फंड को देने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही उन्होंने मृत्यु के बाद अपनी देह चिकित्सा शिक्षा को समर्पित करने का भी संकल्प लिया है। फुल कोर्ट फेयरवेल में उनका कहना था कि अपने लिए जिए तो क्या जिए, और यह वाक्य विदाई का वाक्य नहीं बल्कि जीवन की कसौटी बन गया है।
रकम के आकार से बड़ी है यह मानसिकता
इस प्रसंग की असली ताकत रकम के बड़े आकार में नहीं है, बल्कि उस मानसिकता में है जिसने रकम को अपना मानने के बजाय समाज का मान लिया है। एक करोड़ एक लाख रुपये वर्षों की कमाई और भविष्य की सुरक्षा का बड़ा आधार हो सकते हैं। लेकिन न्यायमूर्ति सिंह ने उस धन को निजी उपलब्धि मानने के बजाय सार्वजनिक उपयोग में लगाने का संकल्प लिया है। यह फर्क देखने में बहुत छोटा लगता है, लेकिन यहीं पर एक व्यक्ति और एक सच्चे नागरिक के बीच की दूरी पूरी तरह मिट जाती है। धन का संचय मनुष्य को सुरक्षित जरूर कर सकता है, मगर उसका सार्थक उपयोग किसी दूसरे जीवन को बेहतरीन तरीके से संभाल सकता है। यहीं पर दान आर्थिक व्यवहार से बहुत आगे बढ़कर एक बड़ा सामाजिक उत्तरदायित्व का वक्तव्य बन जाता है।
मृत्यु के बाद देहदान का ऐतिहासिक और मार्मिक संकल्प
मनुष्य मृत्यु के बाद आखिर क्या पीछे छोड़ जाता है, यही वह मुख्य प्रश्न है जो इस संकल्प को पूरी तरह असाधारण बनाता है। न्यायमूर्ति सिंह और उनकी पत्नी इंदिरा ने जबलपुर के सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में देहदान का पंजीकरण कराया है। उन्होंने अपनी इस देह को समाज की एक अनमोल धरोहर बना दिया है। मृत्यु के बाद यही शरीर चिकित्सा विद्यार्थियों के अध्ययन का मुख्य माध्यम बनेगा। यही विद्यार्थी आगे चलकर अनेक जीवन बचाने वाले बेहतरीन चिकित्सक तैयार करेंगे। हम जीवनभर जिस देह को अपनी एकमात्र पहचान मानते हैं, वह अंततः किसी और के ज्ञान और जीवन की राह पूरी तरह रोशन कर सकती है। जीवन की आज की कमाई किसी पीड़ित के काम आएगी और देहदान कल चिकित्सा-विज्ञान के काम आएगा। एक संकल्प वर्तमान को मजबूत सहारा देगा और दूसरा भविष्य को एक सही दिशा दिखाएगा। यही इस दान की सबसे बड़ी और मार्मिक सार्थकता है।
दांपत्य का गंभीर सत्य और परिवार की साझा चेतना
इस पूरी कहानी में पत्नी इंदिरा की भूमिका केवल एक साधारण पारिवारिक प्रसंग नहीं है। न्यायमूर्ति सिंह ने खुद बताया कि समाज के लिए कुछ बड़ा करने की मुख्य प्रेरणा उनकी पत्नी की इच्छा से ही आई थी। उन्होंने पूरी विनम्रता के साथ उस इच्छा का हमेशा सम्मान किया है। उन्होंने अपने ही अंदाज में कहा कि पूरे कार्यकाल में उन्होंने पत्नी की बात मानी है और अब समाज के लिए देहदान की उनकी बात भी पूरी तरह मानी जाएगी। इस हल्के-फुल्के हास्य के पीछे दांपत्य का एक बहुत ही गंभीर सत्य छिपा हुआ है। कोई भी बड़ा सामाजिक निर्णय अक्सर किसी अकेले व्यक्ति का नहीं होता है, बल्कि परिवार की चेतना ही उसका मुख्य आधार बनती है। जब पति और पत्नी दोनों ही मृत्यु के बाद अपनी देह समाज के लिए उपयोगी बनाने पर पूरी तरह सहमत हों, तो सेवा कोई प्रदर्शन नहीं बल्कि एक साझा जीवन-दृष्टि बन जाती है।
न्यायिक यात्रा और सेवा का लंबा सफर
न्यायमूर्ति सिंह की पूरी न्यायिक यात्रा को देखा जाए तो यह संकल्प उनके सार्वजनिक जीवन से अलग कोई अचानक उगा हुआ विचार बिल्कुल नहीं लगता है। उन्होंने 31 मई 1990 को सिविल जज के रूप में अपनी सेवा की शुरुआत की थी। इसके बाद 1 मई 2023 को उन्होंने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी। अपने करीब तीन वर्ष के हाई कोर्ट के कार्यकाल के दौरान उन्होंने कुल 8788 मामलों के निपटारे का बड़ा आंकड़ा दर्ज किया है। लेकिन किसी भी न्यायाधीश के पूरे जीवन को केवल मुकदमों की संख्या से कभी नहीं समझा जा सकता है। फेयरवेल के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने भी उनके फैसलों की गुणवत्ता को सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बताया था। यही बात इस पूरे प्रसंग को वास्तविक अर्थ देती है। अदालत के भीतर न्याय करना उनका संवैधानिक दायित्व था, लेकिन सेवानिवृत्ति के वक्त समाज के लिए कुछ पीछे छोड़ जाना उनका एक पूरी तरह स्वैच्छिक और मानवीय निर्णय रहा है।
समाज के लिए प्रेरणा और देहदान की जरूरत
आज इस पूरे प्रसंग को केवल एक साधारण प्रेरणादायक कहानी कहकर आगे बढ़ जाना इसके सामाजिक अर्थ को बहुत छोटा करना होगा। भारत देश में देहदान और अंगदान के प्रति जागरूकता की आवश्यकता हमेशा से लंबे समय से महसूस की जाती रही है। इस तरह के बड़े सार्वजनिक संकल्प इस बेहद जरूरी विषय को निजी संकोच से पूरी तरह बाहर निकालकर सामाजिक संवाद के दायरे में लाते हैं। इतनी बड़ी राशि का सार्वजनिक हित में दान करना यह गंभीर सवाल भी खड़े करता है कि हमारी अपनी कमाई का आखिर कितना हिस्सा केवल निजी सुविधाओं तक ही सीमित रहता है और कितना समाज तक पहुँच पाता है। न्यायमूर्ति सिंह ने किसी को भी कोई लंबा उपदेश नहीं दिया है, बल्कि अपने खुद के संसाधनों को समाज के लिए पूरी तरह समर्पित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। शायद यही वजह है कि उनका यह संदेश किसी भी भाषण से कहीं अधिक प्रभावशाली है, क्योंकि यहाँ शब्दों से पहले एक ठोस उदाहरण खुद सामने खड़ा है।
सेवानिवृत्ति को उपयोगिता के विस्तार में बदलना
वास्तव में अपने लिए जिए तो क्या जिए का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि मनुष्य अपने या अपने परिवार के लिए जीना बिल्कुल छोड़ दे। यह समाज भी आखिरकार परिवारों से ही मिलकर बनता है और व्यक्तिगत सुरक्षा भी जीवन की एक बड़ी आवश्यकता होती है। इस प्रसिद्ध वाक्य का गहरा अर्थ यह है कि जीवन की अंतिम उपलब्धि केवल यह नहीं होनी चाहिए कि हमने अपने लिए कितना धन बचाया है। एक दिन पद समाप्त होता है, वेतन पूरी तरह रुकता है, कार्यालय छूटता है और नामपट्टिका भी नीचे उतार ली जाती है। तब केवल वही चीज़ बचती है, जिसे हम अपने पीछे इस दुनिया में छोड़ जाते हैं। न्यायमूर्ति सिंह की यह विदाई इसलिए सबसे अलग है क्योंकि उन्होंने रिटायरमेंट को उपभोग की शुरुआत नहीं बनाया, बल्कि उसे उपयोगिता का एक बड़ा विस्तार दिया है। पद से मुक्ति के इस खास क्षण को उन्होंने समाज के साथ अपने रिश्ते की एक नई पुनर्पुष्टि में बदल दिया है।
जीवन की सार्थकता और अंत में छोड़े गए प्रश्न
मनुष्य की असली पहचान उसके पास बची हुई भौतिक चीज़ों से नहीं होती है, बल्कि उसके इस दुनिया से जाने के बाद बची हुई उसकी उपयोगिता से होती है। न्यायमूर्ति सिंह की यह विदाई ठीक इसी सत्य को बहुत मजबूती से रेखांकित करती है। न्याय की कुर्सी पर बैठकर उन्होंने कानून का अपना पूरा दायित्व निभाया और विदा होते वक्त अपनी कमाई तथा देह दोनों ही समाज को सौंप दी। उनका एक करोड़ एक लाख रुपये का यह दान जरूरतमंदों का बड़ा सहारा बनेगा। उनकी यह देह भावी चिकित्सकों के ज्ञान का मुख्य आधार बनेगी और यह अनूठा संकल्प समाज के लिए कई सवाल पीछे छोड़ जाएगा। जब हमें यह अनमोल जीवन मिला है तो हमने अपने लिए कितना रखा और दूसरों के लिए क्या कुछ छोड़ा है? विदाई की असली सार्थकता यही है कि व्यक्ति भले ही इस दुनिया से चला जाए, लेकिन उसकी उपयोगिता हमेशा बनी रहे। अपने लिए जिए तो क्या जिए यह वाक्य अब केवल उनका नहीं रहा, बल्कि यह हम सभी के और समाज के लिए एक गहरा छोड़ा हुआ प्रश्न बन गया है।