हिसार अतिक्रमण कार्रवाई पर सवाल, रेहड़ी वाली महिला क्यों?

हिसार में अतिक्रमण हटाओ अभियान: गरीब महिला की रेहड़ी पर कार्रवाई और सवालों के घेरे में प्रशासनिक संवेदनशीलता
हिसार /02 अक्टूबर /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
शहर को व्यवस्थित और सुंदर बनाना हर नगर निगम की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। लेकिन जब हिसार में अतिक्रमण हटाने के नाम पर एक रेहड़ी वाली महिला का सामान फेंके जाने का दृश्य सामने आता है, तो यह सवाल केवल एक अकेली रेहड़ी का नहीं रह जाता। यह सीधा सवाल पूरे प्रशासनिक रवैये, कार्यशैली और न्याय की निष्पक्षता पर उठता है। सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों तथा रास्तों पर अनधिकृत कब्जे हटाए जाने चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। हालांकि, कानून की असली परीक्षा और उसकी साख तब आंकी जाती है, जब उसके सामने कोई प्रभावशाली रसूखदार नहीं, बल्कि रोज कमाकर अपने परिवार का पेट पालने वाली एक असहाय महिला खड़ी हो। यदि नियम समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए समान रूप से बने हैं, तो फिर ज़मीन पर होने वाली कार्रवाई का तरीका और पैमाना भी हर किसी के लिए बिल्कुल एक समान होना चाहिए।
अतिक्रमण हटाने की यह प्रशासनिक कार्रवाई यदि वाकई जरूरी है, तो यह केवल छोटे रेहड़ी-वालों तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह अभियान दुकानदार, ठेले वाले, बड़े शोरूम मालिक या शहर के किसी भी अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान पर एक समान रूप से लागू होना चाहिए। यदि सड़क पर कुछ फीट तक सामान फैलाकर बैठी किसी गरीब की रेहड़ी को अतिक्रमण मानकर हटाना पूरी तरह उचित है, तो फिर दुकानों के बाहर फुटपाथ और मुख्य सड़क तक फैलाया गया सामान भी उसी पैमाइश की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। बड़े-बड़े शोरूमों के बाहर लगे विशाल बोर्ड, स्थायी-अस्थायी ढांचे, सामान रखने के लिए घेरे गए अतिरिक्त स्थान और सड़क की सीमा तक फैला व्यापार भी शहर की सार्वजनिक और खुली जगह को बुरी तरह प्रभावित करता है। ऐसे में बड़ा सवाल यह नहीं है कि आखिर किसके खिलाफ कार्रवाई की गई, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या प्रशासन द्वारा हर एक अतिक्रमण के खिलाफ एक जैसी निष्पक्ष कार्रवाई की जा रही है?
आम तौर पर देखा जाता है कि एक गरीब की छोटी सी रेहड़ी प्रशासन को बहुत जल्दी दिखाई दे जाती है, लेकिन बड़े-बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के अवैध कब्जे अक्सर व्यवस्था की खुली आंखों के सामने भी पूरी तरह सामान्य मान लिए जाते हैं। यदि हिसार में या अन्य किसी भी शहर में ऐसा हो रहा है, तो यह प्रशासनिक पारदर्शिता और निष्पक्षता पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। नगर निगम को चाहिए कि वह शहर के सभी प्रमुख बाजारों का विस्तृत सर्वे करे और यह सूची सार्वजनिक करे कि निर्धारित सीमा से बाहर वास्तव में किस-किस के कब्जे हैं। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि उन प्रभावशाली लोगों के खिलाफ निगम द्वारा क्या कानूनी कदम उठाए गए। इस प्रकार की पारदर्शिता से किसी भी कार्रवाई पर किसी भी तरह के पक्षपात या भेदभाव का आरोप लगने की कोई गुंजाइश ही नहीं बचेगी।

रेहड़ी-पटरी पर अपना छोटा-मोटा कारोबार कर आजीविका चलाने वाले लोग भी शहर की अर्थव्यस्था का एक अभिन्न और महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ताजा सब्जियां, मौसमी फल, कपड़े, खाने-पीने की वस्तुएं या छोटे-मोटे घरेलू सामान बेचने वाले ये अनगिनत लोग अपनी बेहद सीमित पूंजी से अपने परिवार का गुजारा करते हैं। इनमें एक बहुत बड़ी संख्या महिलाओं की भी होती है, जिनके लिए यह रेहड़ी केवल व्यापार का साधन मात्र नहीं है, बल्कि उनके घर की आजीविका का एकमात्र मुख्य स्रोत होती है। इसलिए यदि कोई रेहड़ी किसी गलत या प्रतिबंधित स्थान पर लग भी रही है, तो उसे वहां से हटाने से पहले नियमों के अनुकूल किसी उचित वैकल्पिक व्यवस्था की दिशा में भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। हरियाणा सरकार द्वारा स्ट्रीट वेंडरों के लिए पहले से ही एक मजबूत कानूनी व्यवस्था बनाई गई है, जिसमें समय-समय पर सर्वे, उचित पंजीकरण, वेंडिंग जोन का निर्माण और टाउन वेंडिंग कमेटी जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।
इन تمام कानूनी प्रावधानों और व्यवस्थाओं का मुख्य उद्देश्य यही है कि सड़क किनारे होने वाले छोटे कारोबार को पूरी तरह अनियंत्रित भी न छोड़ा जाए और इसके साथ ही गरीब और मेहनतकश विक्रेताओं की रोजी-रोटी भी अनावश्यक रूप से न छीनी जाए। इसलिए स्थानीय प्रशासन को अतिक्रमण हटाने की बलपूर्वक कार्रवाई और वैध स्ट्रीट वेंडिंग के अधिकारों के बीच एक बहुत स्पष्ट अंतर समझना होगा। इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण पहलू बातचीत और व्यवहार की भाषा का होता है। यदि किसी ने नियम तोड़ा है तो उसका सामान हटाया जा सकता है, नियमानुसार कानूनी चालान काटा जा सकता है और आवश्यकता पड़ने पर जब्ती की प्रक्रिया भी अपनाई जा सकती है। लेकिन कानून के नाम पर किसी भी महिला के साथ अपमानजनक भाषा का प्रयोग करना, धक्का-मुक्की करना या कोई भी अमानवीय व्यवहार करना किसी भी सभ्य समाज और स्थिति में कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता। कोई भी प्रशासनिक अधिकार देश के किसी भी साधारण नागरिक के मानवीय सम्मान से कभी भी बड़ा नहीं हो सकता।
यदि सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से सामने आए वीडियो में दिखाई दे रहा प्रशासनिक व्यवहार किसी वास्तविक घटना का एक हिस्सा है, तो इस पूरे प्रकरण की एक उच्च-स्तरीय और निष्पक्ष जांच अवश्य होनी चाहिए। केवल वीडियो के एक छोटे से हिस्से के आधार पर किसी भी प्रकार का अंतिम निष्कर्ष जल्दबाजी में निकालना पूरी तरह उचित नहीं होगा, लेकिन ऐसा गंभीर वीडियो सामने आ जाने के बाद निष्पक्ष जांच से मुंह मोड़ना या बचना भी किसी भी सूरत में सही नहीं है। नगर निगम प्रशासन को यह स्थिति बिल्कुल स्पष्ट करनी चाहिए कि उस निश्चित दिन कौन सा अभियान चलाया गया था, मौके पर किस-किस अधिकारी या कर्मचारी की ड्यूटी लगाई गई थी, क्या उस महिला को कार्रवाई से पहले कोई पूर्व सूचना दी गई थी या नहीं, सामान जब्त करने की क्या निर्धारित प्रक्रिया अपनाई गई थी और क्या बाद में उसे अपना सामान विधिवत वापस पाने का कोई उचित अवसर दिया गया था या नहीं।
यदि जांच के दौरान यह सिद्ध हो जाता है कि किसी अधिकारी या कर्मचारी द्वारा अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए नियमों का उल्लंघन किया गया या फिर किसी के साथ अभद्र व्यवहार किया गया, तो बिना किसी देरी के सख्त जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। इस तरह की जांच का मुख्य उद्देश्य किसी भी अधिकारी या कर्मचारी का मनोबल गिराना बिल्कुल नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके विपरीत प्रशासनिक अधिकारों के जिम्मेदार और मानवीय इस्तेमाल का एक कड़ा संदेश देना होना चाहिए। जिस प्रकार एक आम नागरिक और अतिक्रमण करने वाले व्यक्ति से यह सख्त अपेक्षा की जाती है कि वह देश के सभी नियमों का पूरी निष्ठा से पालन करे, ठीक उसी प्रकार कार्रवाई करने वाले सरकारी अधिकारी से भी यह बुनियादी अपेक्षा होती है कि वह कानून की मर्यादा और मानवीय संवेदनाओं का पूरा ध्यान रखे।
शहर के नागरिकों के मन में यह सवाल भी लगातार उठ रहा है कि क्या अतिक्रमण हटाने के इस तरह के अभियानों की शुरुआत हमेशा केवल कमजोर वर्ग की छोटी-छोटी रेहड़ियों से ही होनी चाहिए? यदि हिसार शहर को वाकई में एक व्यवस्थित और सुंदर शहर बनाना है, तो नगर निगम को पक्षपात छोड़कर एक व्यापक, पारदर्शी और दूरदर्शी अभियान चलाना चाहिए। शहर के मुख्य फुटपाथों पर बने पक्के और कच्चे अवैध कब्जे, दुकानों के बाहर फैला हुआ व्यावसायिक सामान, सड़क तक निकले हुए बड़े-बड़े बोर्ड, अनधिकृत अस्थायी निर्माण और अन्य तमाम तरह के कमर्शियल अतिक्रमणों की एक जैसी जांच होनी चाहिए। इस कार्रवाई से जुड़ी हर जानकारी को समय-समय पर सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि आम नागरिकों को भी यह विश्वास हो सके कि शहर के नियम केवल समाज के कमजोर वर्ग पर ही लागू नहीं होते।
किसी भी शहर की सुंदरता और भव्यता का वास्तविक अर्थ केवल चमक-धमक वाले बड़े शोरूम और मॉल नहीं होते। जिस फुटपाथ पर किसी मशहूर बड़े ब्रांड का सामान अनधिकृत रूप से फैलता है, वह भी इस देश की आम जनता का ही हिस्सा है और जिस फुटपाथ पर कोई गरीब महिला अपनी दो जून की रोटी के लिए छोटी-सी रेहड़ी लगाती है, वह भी उसी जनता की संपत्ति है। सार्वजनिक और खुली जगहों पर किसी भी प्रकार के अधिकार का निर्धारण किसी व्यक्ति की आर्थिक हैसियत या रसूख के आधार पर बिल्कुल नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका निर्धारण केवल और केवल कानून के दायरे में होना चाहिए। नगर निगम अगर चाहे तो इस पूरे हालिया विवाद को एक बेहतरीन अवसर में बदलकर शहर की व्यवस्था को सुधार सकता है। शहर के तमाम बाजारों का डिजिटल सर्वे कराया जाना चाहिए ताकि भविष्य में इस तरह के विवादों से बचा जा सके।
प्रशासन को चाहिए कि वह प्रत्येक दुकान और शोरूम की व्यावसायिक रूप से स्वीकृत सीमा को बिल्कुल स्पष्ट कर दे। इसके साथ ही, रेहड़ी-पटरी और फड़ी लगाने वाले छोटे दुकानदारों के लिए शहर में सुरक्षित और सुविधाजनक वेंडिंग जोन का निर्माण किया जाए ताकि उन्हें बार-बार भटकना न पड़े। आम और आम राहगीरों के चलने के लिए शहर के सभी फुटपाथों को हर प्रकार के अवैध कब्जों से पूरी तरह खाली रखा जाना चाहिए। नियमों का किसी भी स्तर पर उल्लंघन करने वाले लोगों को कार्रवाई से पहले हमेशा स्पष्ट और लिखित चेतावनी दी जानी चाहिए, और उसके बाद ही निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत निष्पक्ष कार्रवाई अमल में लाई जानी चाहिए। समाज की महिलाओं, वृद्धों और अन्य कमजोर वर्गों से जुड़े मामलों में हमेशा पूरी संवेदनशीलता और मानवीय व्यवहार सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति आम जनता का भरोसा और अधिक मजबूत हो सके।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि शहर को सुचारू चलाने के लिए अतिक्रमण हटाना एक जरूरी प्रशासनिक कदम है, लेकिन अतिक्रमण हटाने की यह पूरी प्रक्रिया खुद किसी बड़े अन्याय या उत्पीड़न का कारण नहीं बननी चाहिए। शहर में कानून का राज और व्यवस्था जरूर कायम होनी चाहिए, मगर ऐसी व्यवस्था कदापि नहीं होनी चाहिए जिसमें किसी गरीब की खून-पसीने की रोजी-रोटी इस तरह सड़क पर बिखरती हुई दिखाई दे और दूसरी तरफ रसूखदारों के बड़े-बड़े अवैध कब्जे पूरी तरह नजरअंदाज होते रहें। हिसार जिला प्रशासन और स्थानीय नगर निगम को यह कड़ा संदेश बहुत स्पष्ट रूप से देना होगा कि कानून की नजर में एक छोटी रेहड़ी वाला और एक बड़ा शोरूम मालिक अलग-अलग दर्जे के नागरिक नहीं हैं, और इसलिए उनके लिए न्याय के नियम कभी भी अलग-अलग नहीं हो सकते।
यदि कानून की नजर में किसी गरीब महिला से कोई गलती या नियम का उल्लंघन हुआ भी है, तो उसे प्यार से समझाया जा सकता है और कानून के मुताबिक उचित दंड भी दिया जा सकता है; लेकिन किसी भी परिस्थिति में उसका सार्वजनिक अपमान करने का हक किसी को नहीं दिया जा सकता। और यदि इसके विपरीत किसी बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान या संस्थान ने सार्वजनिक स्थान पर अवैध कब्जा किया है, तो उसके खिलाफ भी कानून का शिकंजा कसते हुए उतनी ही दृढ़ता और सख्ती दिखाई जानी चाहिए जितनी एक गरीब पर दिखाई जाती है। यदि वास्तव में इस शहर को अतिक्रमण मुक्त और सुंदर बनाना है, तो सबसे पहले प्रशासन को अपनी कार्रवाई का पैमाना हर व्यक्ति के लिए बिल्कुल समान करना होगा। शहर की मुख्य सड़कों को अवैध कब्जों से जरूर खाली कराइए, लेकिन इस प्रक्रिया में किसी गरीब की आत्मसम्मान और गरिमा को बिल्कुल मत कुचलिए। हिसार को एक सुव्यवस्थित शहर बनाने के साथ-साथ एक बेहद संवेदनशील शहर भी बनाइए।