हिसार : धान उत्पादक जिलों में पराली प्रबंधन अभियान तेज, 6000 किसानों तक पहुंचेगा एचएयू

हिसार : धान उत्पादक जिलों में पराली प्रबंधन अभियान तेज, 6000 किसानों तक पहुंचेगा एचएयू

हिसार में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी), जोधपुर के सहयोग से प्रदेश के प्रमुख धान उत्पादक जिलों में पराली प्रबंधन अभियान तेज कर दिया है। 89 जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए किसानों को पराली न जलाने के लिए प्रेरित किया जाएगा। कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से चलाए जा रहे इस अभियान का उद्देश्य धान की पराली जलाने की समस्या पर रोक लगाना है। इसके साथ ही किसानों को इन-सीटू और एक्स-सीटू फसल अवशेष प्रबंधन की व्यावहारिक, किफायती और स्थानीय तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित करना है।

कुलपति की अपील और वैज्ञानिक प्रबंधन के लाभ

कुलपति प्रो. बीआर कम्बोज ने शनिवार को कहा कि फसल अवशेषों का वैज्ञानिक प्रबंधन वायु प्रदूषण रोकने के लिए बहुत जरूरी है। यह मृदा स्वास्थ्य, नमी संरक्षण और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी के लिए भी महत्वपूर्ण है। इससे गेहूं की समय पर बिजाई में भी मदद मिलती है। उन्होंने किसानों से पराली को कचरा नहीं बल्कि कृषि संसाधन मानने की अपील की। उन्होंने किसानों से वैज्ञानिक प्रबंधन तकनीक अपनाने तथा फसल अवशेष न जलाने को सामूहिक संकल्प बनाने का आह्वान किया।

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6000 किसानों तक पहुंचने का लक्ष्य और कार्यक्रम

सितंबर महीने में विश्वविद्यालय ने करीब 6000 किसानों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है। इसके तहत विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। इनमें 46 ग्राम स्तरीय, 14 खंड स्तरीय, 12 जिला स्तरीय जागरूकता कार्यक्रम और 17 विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल हैं। इन कार्यक्रमों में किसानों को खेत स्तर पर प्रदर्शन और व्यावहारिक प्रशिक्षण के माध्यम से पराली प्रबंधन की उपयुक्त तकनीकों की जानकारी दी जाएगी। यह अभियान आगामी महीनों में भी जारी रहेगा और गेहूं की बिजाई शुरू होने तक किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन दिया जाएगा।

संस्थानों का समन्वय और वैकल्पिक उपयोग

कुलपति ने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र कई अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। ये केंद्र कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, जिला प्रशासन, किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों और कस्टम हायरिंग सेंटरों के साथ समन्वय कर रहे हैं। इससे किसानों को आवश्यक मशीनरी, संसाधन और तकनीकी सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हो सकेंगी। किसानों को पराली को खेत में ही प्रबंधित करने के तरीके बताए जा रहे हैं। इसके साथ ही पशु चारे, जैव ऊर्जा और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों में इसके उपयोग के विकल्प भी बताए जा रहे हैं।

विस्तार शिक्षा निदेशक के अनुसार संसाधन का महत्व

विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. नरेश कौशिक ने बताया कि किसानों को सरकारी योजनाओं के तहत उपलब्ध वित्तीय सहायता और अन्य सहयोग की जानकारी भी दी जा रही है। उन्होंने कहा कि फसल अवशेष कोई कचरा नहीं है, बल्कि एक मूल्यवान संसाधन है। केवीके नेटवर्क का मुख्य उद्देश्य फसल अवशेष प्रबंधन को कई अहम चीजों से जोड़ना है। इसमें मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, संसाधन बचत, गेहूं की समय पर बिजाई, ग्रामीण उद्यमिता और जलवायु-सक्षम कृषि शामिल हैं।

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