हरियाणा में 1646 वार्ड कमेटियां अवैध? जानें क्या है बड़ा विवाद!

हरियाणा में 1646 वार्ड कमेटियां अवैध? जानें क्या है बड़ा विवाद!

हरियाणा की शहरी निकायों में गठित 1646 वार्ड समितियों के अस्तित्व पर कानूनी और संवैधानिक संकट

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243(एस) और हरियाणा नगर-निकाय नागरिक भागीदारी अधिनियम, 2008 का धारा 2(जी) का हवाला देकर एडवोकेट ने प्रदेश सरकार को लिखा

चंडीगढ़ / 27 सितंबर 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स

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हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की ओर से गत दिवस शुक्रवार 25 सितम्बर को जारी एक आधिकारिक बयान अनुसार आमजन की सुविधा और शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए प्रदेश के सभी शहरी निकायों में 1646 वार्ड समितियों का गठन किया गया है.

इसी बीच पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट एडवोकेट और म्यूनिसिपल कानून जानकार हेमंत कुमार ने आज बार पुन: हरियाणा के सभी 87 मुनिसिपलिटीस ( शहरी-निकायों) में गठित

वार्ड कमेटियों को गैर-कानूनी (नगर निगमों-म्युनिसिपल कारपोरेशन के संबध में) और गैर-संवैधानिक (नगर परिषदों-म्युनिसिपल कौंसिल और नगरपालिका समितियों-म्युनिसिपल कमेटी के सम्बन्ध में) करार करते हुए प्रदेश सरकार के शहरी स्थानीय निकाय विभाग के आयुक्त एवं सचिव, महानिदेशक और विभाग के उच्च अधिकारियों को नोटिस भेजा है.

वर्ष 2008 का कानून नगर निगमों पर लागू ही नहीं

हेमंत ने बताया कि प्रदेश की सभी 87 मुनिसिपलिटीस ( शहरी-निकायों) में वार्ड कमेटियों के गठन का आधार हरियाणा म्युनिसिपल सिटिजन्स पार्टिसिपेशन एक्ट, 2008 को बनाया है, जबकि इस कानून की धारा 2(जी) स्पष्ट रूप से "म्युनिसिपेलिटी (नगर-निकाय)" की परिभाषा केवल हरियाणा म्युनिसिपल एक्ट, 1973 के अंतर्गत गठित नगर परिषदों और नगर पालिकाओं तक सीमित करती है।

उन्होंने कहा कि हरियाणा में स्थापित सभी 11 नगर निगमों

का गठन हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994 के तहत हुआ है, इसलिए 2008 का अधिनियम उन पर लागू ही नहीं होता। ऐसे में उक्त कानून के आधार पर हरियाणा की सभी 11 नगर निगमों में वार्ड कमेटियों का गठन पूर्णतः अधिकारविहीन और असंवैधानिक है।

1994 के कानून में भी निगम को नहीं मिला अधिकार

नोटिस में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि नगर निगमों में वार्ड कमेटियों का गठन किया जाना हो, तो उसका प्रावधान हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994 की धारा 10 में है।

हेमंत के अनुसार इस धारा में वार्ड कमेटियों के गठन का अधिकार केवल राज्य सरकार को दिया गया है। नगर निगम महापौर (मेयर), निगम सदन अथवा नगर आयुक्त को ऐसा कोई अधिकार नहीं सौंपा गया है। इसलिए नगर निगम के सदनों द्वारा स्वयं वार्ड कमेटियां गठित करना कानून के स्पष्ट प्रावधानों का उल्लंघन है।

'दो-दो कानूनों का उल्लंघन'

हेमंत ने दावा किया कि इस प्रकार हरियाणा के निगमों में वार्ड समितियों का गठन दो अलग-अलग कानूनी आधारों पर अवैध है—

पहला, जिस वर्ष 2008 के अधिनियम का सहारा लिया गया, वह नगर निगमों पर लागू ही नहीं होता। दूसरा, 1994 के नगर निगम अधिनियम के अनुसार भी वार्ड कमेटियां गठित करने का अधिकार केवल राज्य सरकार के पास है, नगर निगम के पास नहीं।

उन्होंने कहा कि किसी भी वैधानिक संस्था को वही अधिकार प्राप्त होते हैं, जो कानून स्पष्ट रूप से प्रदान करता है। कोई भी सार्वजनिक प्राधिकरण (जैसे नगर निगम सदन स्वयं अपने लिए ऐसे अधिकार नहीं बना सकता) जो विधानसभा ने उसे दिए ही न हों।

जहाँ तक प्रदेश की कुल 76 नगर परिषदों और नगरपालिका समितियों का विषय है, इस बारे में हेमंत ने भारत देश के संविधान के अनुच्छेद 243 (एस) का हवाला देते हुए नोटिस में लिखा है कि उसमें स्पष्ट तौर पर उल्लेख है कि वार्ड समितियों का गठन केवल उन मुनिसिपलिटीस ( शहरी-निकायों) में किया जा सकता है जहाँ की जनसँख्या तीन लाख या उससे अधिक हो.

अब चूँकि हरियाणा म्युनिसिपल (नगरपालिका) कानून, 1973 के अनुसार प्रदेश में नगरपालिका समिति (म्युनिसिपल कमेटी) के लिए जनसँख्या पचास (50) हज़ार से अधिक नहीं होती जबकि नगर परिषद के लिए आबादी की सीमा पचास (50) हज़ार से अधिक परन्तु तीन लाख से कम होती है, इसलिए इस आधार पर हरियाणा के सभी

76 नगर परिषदों और नगरपालिका समितियों में संवैधानिक तौर पर वार्ड समितियों का गठन किया ही नहीं जा सकता है.

हेमंत ने कहा कि यदि बिना कानूनी अधिकार (नगर निगमों के सम्बन्ध में) और बगैर संवैधानिक मान्यता (नगर परिषदों और नगरपालिका समितियों के संबध में) के गठित इन वार्ड कमेटियों को जारी रहने दिया गया तो यह वर्ष 2008 के कानून और संवैधानिक प्रवाधों का खुला उल्लंघन होगा. यही नहीं इस आधार पर वार्ड समितियों के गठन को अदालत में भी चुनौती दी जा सकती है.

हालांकि हेमंत ने बताया कि अगर प्रदेश विधानसभा द्वारा हरियाणा नगर-निकाय नागरिक भागीदारी अधिनियम, 2008 की धारा 2 (जी) में संशोधन कर उसमें

स्पष्ट रूप से "म्युनिसिपेलिटी (नगर-निकाय)" की परिभाषा में हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994 के अंतर्गत गठित नगर निगमों को शामिल कर लिया जाता है और साथ साथ उपरोक्त हरियाणा नगर निगम कानून, 1994 की धारा 10 में भी संशोधन कर नगर निगमों में वार्ड समितियों के गठन का अधिकार प्रदेश सरकार की बजाय निगम सदन को दे दिया जाता है, तो हरियाणा में कम से कम 11 नगर निगमों के सदनों द्वारा गठित सभी वार्ड समितियों को वैधता अर्थात कानूनी मान्यता प्राप्त हो सकती है हालांकि प्रदेश की 76 नगर परिषदों और नगरपालिका समितियों में गठित वार्ड कमेटियों को प्रदेश सरकार द्वारा कोई भी कानूनी संशोधन करके मान्यता प्रदान नहीं की जा सकता है चूँकि भारत के संविधान में स्पष्ट उल्लेख है कि वार्ड समितियों का गठन केवल उन मुनिसिपलिटीस ( शहरी-निकायों) में किया जा सकता है जहाँ की जनसँख्या तीन लाख या उससे अधिक हो और हरियाणा में सभी नगर परिषदों और नगरपालिका समितियों की आबादी तीन लाख से कम है.

विवाद का मुख्य कारण और संवैधानिक पहलू: गौरतलब है कि भारतीय संविधान के 74वें संशोधन (1992) के तहत शामिल अनुच्छेद 243S में यह व्यवस्था दी गई थी कि 3 लाख से अधिक आबादी वाले बड़े शहरों में ही वार्ड कमेटियों का गठन किया जाएगा, ताकि बड़े शहरी क्षेत्रों में शासन को विकेंद्रीकृत किया जा सके।

कानूनी जानकारों के अनुसार, हरियाणा की 76 नगर परिषदों और नगरपालिकाओं की जनसंख्या इस तय संवैधानिक पैमाने (3 लाख) से कम है। ऐसे में यदि सरकार बिना संविधान संशोधन के इन समितियों को लागू रखती है, तो इनके द्वारा लिए गए प्रशासनिक या वित्तीय निर्णयों के कानूनी रूप से अमान्य होने और अदालत में निरस्त होने की प्रबल संभावना बनी रहेगी।

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