हरियाणा पराली सुरक्षा बल तैनात, किसानों को 1200 रुपये

हरियाणा पराली सुरक्षा बल तैनात, किसानों को 1200 रुपये

राजकुमार अग्रवाल/चंडीगढ़ / 24 सितम्बर 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स

ये खबर हरियाणा के किसानों और पर्यावरण से जुड़ी है। 24 सितंबर 2026 को चंडीगढ़ में मुख्य सचिव अनुरग रस्तोगी ने समीक्षा बैठक की। सरकार ने जिला और ब्लॉक स्तर पर पराली सुरक्षा बल तैनात करने का फैसला लिया। धान कटाई के मौसम में पराली जलाने को पूरी तरह रोकने के लिए ड्रोन, गश्त और प्रोत्साहन राशि का प्लान बनाया गया है। जगह हरियाणा भर के खेत हैं, खासकर कैथल, कुरुक्षेत्र, करनाल जैसे जिले जहां धान ज्यादा होता है। क्यों? दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण कम करने और किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए।

हरियाणा सरकार ने धान की पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए बड़ा कदम उठाया है। मुख्य सचिव अनुरग रस्तोगी की अध्यक्षता में हुई बैठक में साफ निर्देश दिए गए कि इस बार पराली जलाने के मामले शून्य के करीब लाए जाएं। राज्य में लगभग 80 लाख मीट्रिक टन पराली पैदा होने का अनुमान है। इसमें बासमती से 21 लाख टन और गैर-बासमती से 58 लाख टन से ज्यादा शामिल है। सरकार ने तीन स्तर की रणनीति बनाई है।

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पहला स्तर इन-सीटू प्रबंधन है। इसमें करीब 45 लाख टन पराली को खेत में ही मिलाया जाएगा। हैप्पी सीडर, सुपर सीडर जैसी मशीनों से पराली को काटकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और अगली फसल के लिए अच्छा रहता है। दूसरे स्तर पर 10 लाख टन पराली को पशु चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। तीसरा और महत्वपूर्ण स्तर एक्स-सीटू प्रबंधन है। इसमें 25 लाख टन पराली को खेतों से बाहर निकालकर उद्योगों में भेजा जाएगा।

उद्योगों में बायोमास बिजली संयंत्र, सीबीजी इकाइयां, एथनॉल प्लांट और पेलेट बनाने वाली इकाइयां पराली खरीदेंगी। पानीपत का एथनॉल संयंत्र और थर्मल पावर प्लांट भी इसमें शामिल हैं। सरकार का लक्ष्य है कि पराली जलाने की बजाय इससे कमाई हो। पिछले सालों में रेड जोन वाले गांवों की संख्या में भारी कमी आई है। 2021 में 351 गांव रेड जोन में थे, जो 2025 में घटकर सिर्फ तीन रह गए। ये उपलब्धि जागरूकता और मशीनरी उपलब्धता की वजह से हुई।

अब पराली सुरक्षा बल की बात करते हैं। ये बल जिला और ब्लॉक स्तर पर तैनात किया जाएगा। इसमें पुलिसकर्मी, कृषि विभाग के अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी और नोडल ऑफिसर शामिल होंगे। हर गांव में नोडल अधिकारी नियुक्त किए गए हैं। राज्य में 8134 गांव स्तर के नोडल अधिकारी काम कर रहे हैं। लगभग 6.21 लाख पंजीकृत धान किसान हैं, जो 5600 गांवों में फैले हैं और करीब 34.1 लाख एकड़ जमीन कवर करते हैं। हर नोडल अधिकारी अधिकतम 100 किसानों से जुड़ा रहेगा। हॉटस्पॉट गांवों में ये संख्या 50 तक सीमित रहेगी।

निगरानी के लिए ड्रोन का इस्तेमाल होगा। देर शाम की गश्त बढ़ाई जाएगी क्योंकि कुछ किसान रात में पराली जलाते हैं ताकि सैटेलाइट से पकड़ में न आए। मोबाइल ऐप के जरिए सक्रिय आग की लोकेशन रिपोर्ट की जाएगी। अगर कोई किसान पराली जलाता पाया गया तो तीन कार्रवाई होंगी। एफआईआर दर्ज होगी, चालान कटेगा और भूमि रिकॉर्ड में रेड एंट्री हो जाएगी। पर्यावरण मुआवजा भी वसूला जाएगा। जुर्माना 5000 से 30000 रुपये तक हो सकता है, जमीन के आकार के हिसाब से।

किसानों के लिए अच्छी खबर ये है कि पराली प्रबंधन अपनाने पर प्रति एकड़ 1200 रुपये की प्रोत्साहन राशि मिलेगी। कृषि मंत्री श्याम सिंह राणा ने पहले भी इस राशि को बढ़ाने का संकेत दिया था। मशीनरी पर सब्सिडी भी जारी है। हैप्पी सीडर, बेलर, रेक जैसी मशीनें उपलब्ध कराई जा रही हैं। कुछ जिलों में मशीनें एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट की जाएंगी, कटाई के शेड्यूल के अनुसार।

कैथल, कुरुक्षेत्र, करनाल, जींद, हिसार, नूंह जैसे जिलों में ये अभियान जोरों पर है। नूंह में धान और बाजरा की खरीद एक अक्टूबर से शुरू होने वाली है। वहां पराली प्रबंधन का एक्शन प्लान पहले से तैयार है। करनाल में 750 टीमें बनाई गई हैं। हिसार में कृषि विश्वविद्यालय के जरिए 6000 किसानों तक संदेश पहुंचाया जा रहा है। ये प्रयास इसलिए जरूरी हैं क्योंकि अक्टूबर-नवंबर में धान कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच समय कम होता है। किसान जल्दी खेत खाली करना चाहते हैं, इसलिए पराली जला देते हैं।

पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है। दिल्ली-एनसीआर में सर्दियों में स्मॉग की समस्या इससे जुड़ी होती है। कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट यानी सीएक्यूएम ने राज्यों को निर्देश दिए हैं कि 2026 में पराली जलाने को पूरी तरह खत्म किया जाए। हरियाणा ने इसके लिए मैपिंग शुरू की है। हर खेत के लिए प्रबंधन का तरीका तय किया जा रहा है। इन-सीटू, एक्स-सीटू या चारा।

पिछले अनुभव से सीख ली गई है। 2021 में हजारों मामले थे, अब सैकड़ों रह गए हैं। रेड जोन से ग्रीन जोन की ओर बढ़ना बड़ी सफलता है। अब सिर्फ तीन गांव रेड जोन में बचे हैं। इनमें कैथल का एक गांव भी शामिल है। स्थानीय स्तर पर पंचायतों को भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है। जो गांव बेहतर प्रदर्शन करेंगे, उन्हें इनाम मिलेगा।

किसान भाई अब समझ रहे हैं कि पराली सिर्फ कचरा नहीं है। इससे बायो गैस, बिजली, पैकेजिंग मटीरियल और चारा बन सकता है। कुछ किसान खुद कलेक्शन सेंटर चला रहे हैं। उद्योगों से डायरेक्ट खरीद हो रही है। इससे अतिरिक्त आय भी हो रही है। सरकार मुफ्त डिकंपोजर भी बांट रही है। इससे पराली खेत में तेजी से सड़ जाती है।

ड्रोन निगरानी और सैटेलाइट मॉनिटरिंग से पकड़ना आसान हो गया है। रात में भी नजर रखी जाएगी। गांव स्तर पर जागरूकता शिविर चल रहे हैं। कृषि विभाग, पशुपालन विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मिलकर काम कर रहे हैं। पुलिस की मदद से कानूनी कार्रवाई सख्त होगी। जो किसान बार-बार गलती करेंगे, उनकी फसल मंडी में बेचने पर भी रोक लग सकती है।

ये पूरा प्लान किसानों के हित में है। प्रोत्साहन राशि, मशीनरी सब्सिडी और बाजार उपलब्धता से पराली जलाने की जरूरत खत्म हो जाएगी। पर्यावरण बचने के साथ-साथ मिट्टी की सेहत भी सुधरेगी। अगली फसल में कम खाद की जरूरत पड़ेगी। लंबे समय में ये फायदेमंद साबित होगा।

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की सरकार इस मुद्दे पर फोकस कर रही है। सतर्क हरियाणा ऐप जैसे डिजिटल टूल्स भी लाए जा रहे हैं। भ्रष्टाचार और अन्य मुद्दों के साथ पर्यावरण पर भी नजर है। स्थानीय स्तर पर कैथल, कुरुक्षेत्र जैसे क्षेत्रों में किसान पहले से ही कुछ उपाय अपना रहे हैं। अब सरकारी समर्थन से ये और तेज होगा।

धान कटाई शुरू होने से पहले सभी तैयारियां पूरी कर ली जाएं। नोडल अधिकारी से संपर्क करें। मशीनरी का इस्तेमाल करें। प्रोत्साहन राशि का लाभ लें। पराली जलाएं नहीं। इससे न सिर्फ जुर्माना बचेगा बल्कि कमाई भी होगी। राज्य सरकार का लक्ष्य साफ है। इस सीजन में पराली जलाने के मामले इतिहास के सबसे निचले स्तर पर लाए जाएं।

किसान संगठनों और पंचायतों से सहयोग की अपील की गई है। जागरूकता अभियान गांव-गांव चल रहा है। युवाओं और महिलाओं को भी शामिल किया जा रहा है। स्कूल-कॉलेज स्तर पर भी संदेश दिए जा रहे हैं। मीडिया और स्थानीय न्यूज प्लेटफॉर्म इस मुद्दे को लगातार उठा रहे हैं।

कुल मिलाकर हरियाणा में पराली प्रबंधन का नया अध्याय शुरू हो रहा है। सुरक्षा बल, तकनीक और प्रोत्साहन तीनों मिलकर काम करेंगे। किसान अगर सही तरीके अपनाएं तो समस्या खत्म हो सकती है। पर्यावरण साफ रहेगा, दिल्ली का स्मॉग कम होगा और हरियाणा के खेत हरे-भरे रहेंगे। ये खबर सिर्फ आज की नहीं, आने वाले मौसम की तैयारी की है। सभी संबंधित विभाग अलर्ट मोड पर हैं। किसानों से अनुरोध है कि सहयोग करें और इस अभियान को सफल बनाएं।

अतिरिक्त संदर्भ के तौर पर देखा जाए तो पिछले पांच साल में हरियाणा ने पराली जलाने के मामलों में 90 प्रतिशत से ज्यादा कमी लाई है। मशीनरी वितरण में भी बड़े लक्ष्य रखे गए हैं। केंद्र सरकार की फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत करोड़ों रुपये की सहायता मिल रही है। 2026-27 के लिए भी प्रावधान किया गया है। ये सब मिलकर एक मजबूत सिस्टम बना रहे हैं।

स्थानीय स्तर पर कैथल और आसपास के क्षेत्रों में धान की पैदावार अच्छी होती है। यहां के किसान अगर मशीनरी साझा करें तो खर्च भी कम होगा। कस्टम हायरिंग सेंटर पहले से काम कर रहे हैं। अब और मजबूत होंगे। पराली से बनने वाले प्रोडक्ट्स का बाजार बढ़ रहा है। इससे रोजगार भी पैदा होगा। युवा मशीन ऑपरेटर बन सकते हैं। महिलाओं को पैकेजिंग यूनिट में काम मिल सकता है।

सरकार का फोकस सिर्फ सजा पर नहीं, समाधान पर है। प्रोत्साहन और सुविधा देकर व्यवहार बदलना है। ड्रोन और ऐप से पारदर्शिता आएगी। कोई गलत रिपोर्टिंग नहीं हो पाएगी। नोडल अधिकारी जवाबदेह होंगे। अगर कोई लापरवाही हुई तो उनकी भी जवाबदेही तय की जाएगी।

ये प्रयास दिल्ली-एनसीआर के वायु गुणवत्ता सुधारने में मददगार साबित होंगे। सर्दियों में सांस लेने में आसानी होगी। बच्चों और बुजुर्गों को फायदा होगा। कुल मिलाकर ये एक व्यापक अभियान है जिसमें प्रशासन, किसान और नागरिक तीनों की भूमिका है। सही दिशा में आगे बढ़कर हरियाणा मिसाल बन सकता है।

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