हरियाणा के राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और चार सूचना आयुक्तों की मौजूदा स्थिति पर कानूनी स्पष्टीकरण की मांग

हरियाणा राज्य सूचना आयोग के मौजूदा राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और चार राज्य सूचना आयुक्तों की वर्तमान स्थिति को लेकर एक बार फिर प्रदेश सरकार से कानूनी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने आज एक बार पुनः प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव सहित सामान्य प्रशासन विभाग के अंतर्गत पड़ने वाली प्रशासकीय सुधार शाखा के उच्च अधिकारियों को भेजे कानूनी अभिवेदन-सह-सार्वजनिक ज्ञापन में बीती 5 अगस्त 2026 को प्रदेश के मुख्य सचिव द्वारा जारी एक सरकारी आदेश में प्रयुक्त हुई शब्दावली को स्पष्ट करने की अपील की गयी है।
23 मई 2025 को हुई थी नियुक्तियां
एडवोकेट हेमंत के अनुसार 23 मई 2025 को जारी एक ही क्रमांक के सरकारी आदेश के माध्यम से राज्य मुख्य सूचना आयुक्त टी.वी.एस.एन. प्रसाद तथा पांच राज्य सूचना आयुक्तों—अमरजीत सिंह, कर्मवीर सैनी, नीता खेड़ा, प्रियंका धोपरा और संजय मदान—की नियुक्तियां की गई थीं। बाद में प्रियंका धोपरा से सम्बन्धी कुछ विवाद को लेकर स्थिति अलग रही। 26 मई 2025 को आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में प्रियंका को तत्कालीन राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय द्वारा राज्य सूचना आयुक्त के पद की शपथ नहीं दिलाई गई। इसके बाद आगामी एक वर्ष तक प्रदेश सरकार की ओर से आधिकारिक तौर पर यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि क्या उनकी राज्य सूचना आयुक्त के पद पर घोषित नियुक्ति लंबित है अथवा प्रभावहीन हो गई है या इसके संबंध में सरकार को कोई अलग निर्णय लेना है।
5 अगस्त को जारी आदेश की शब्दावली बनी मुख्य मुद्दा
हेमंत ने अपने ज्ञापन में आगे लिखा है कि 5 अगस्त 2026 के आदेश में प्रियंका धोपरा के मामले में कार्यवाही करते हुए यह उल्लेख किया गया कि संबंधित 23 मई 2025 को सूचना आयुक्तों के पद पर नियुक्ति सम्बन्धी जारी नोटिफिकेशन, जो हालांकि वास्तव में एक आदेश था, वापस ली जाती है। 5 अगस्त को जारी आदेश को मुख्य सचिव की वेबसाइट पर हालांकि 25 अगस्त 2026 को अपलोड किया गया। हेमंत का कहना है कि यदि प्रदेश सरकार का उद्देश्य केवल प्रियंका धोपरा की राज्य सूचना आयुक्त के पद पर की गयी नियुक्ति को रद्द करना था, तो आदेश में यह स्पष्ट रूप से लिखा जाना चाहिए था कि 23 मई 2025 के मूल आदेश के तहत नियुक्त अन्य पदाधिकारियों की नियुक्तियां यथावत जारी रहेंगी। इसके विपरीत, उक्त अधिसूचना वापस ली जाती है का अर्थ निस्संदेह 23 मई 2025 को की गई सभी पदाधिकारियों की नियुक्ति रद्द करना ही बनता है। इसका सीधा प्रभाव मौजूदा राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और चार राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्तियों पर भी पड़ता है।
नियुक्ति और उम्मीदवारी में अंतर स्पष्ट करने की मांग
अभिवेदन में यह भी सवाल उठाया गया है कि 5 अगस्त 2026 को जारी सरकारी आदेश में प्रियंका धोपरा के कैंडीडेचर यानी उम्मीदवारी शब्द का प्रयोग क्यों किया गया। यदि 23 मई 2025 के आदेश से प्रियंका ढोपरा की नियुक्ति घोषित की गयी थी, तो बाद में उसे रद्द करने के लिए सही शब्दावली का प्रयोग किया जाना चाहिए। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि उनका कैंडीडेचर रद्द किया गया है।
गजट प्रकाशन को लेकर भी मांगा गया स्पष्टीकरण
अभिवेदन में यह मुद्दा भी उठाया गया है कि टी.वी.एस.एन. प्रसाद की राज्य मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में नियुक्ति का हरियाणा सरकार के राजपत्र में 3 जून 2025 को प्रकाशन हुआ, जबकि 23 मई 2025 के उसी आदेश से नियुक्त अन्य राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के संबंध में आज तक गजट में प्रकाशन नहीं किया गया है।
सरकार से क्या की गई है मांग
हेमंत ने प्रदेश सरकार से अपील की है कि आदेश की कानूनी समीक्षा कर स्पष्ट और कारणयुक्त आदेश जारी किया जाए। यदि राज्य सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्ति को रद्द करने सम्बन्धी कार्यवाही केवल प्रियंका धोपरा तक सीमित थी, तो इस संबंध में आधिकारिक स्पष्टीकरण या संशोधन ताजा आदेश जारी किया जाए जिससे पूर्णतया स्पष्ट हो कि मुख्य राज्य सूचना आयुक्त और चार अन्य राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्तियां यथावत सुरक्षित रहेंगी। वहीं, यदि 23 मई 2025 का पूरा नोटिफिकेशन वापस लिया गया है, तो उसके परिणामस्वरूप वर्तमान में कार्यरत मुख्य राज्य सूचना आयुक्त और अन्य राज्य सूचना आयुक्तों की कानूनी स्थिति भी स्पष्ट की जानी चाहिए। उन्होंने सरकार से यह भी आग्रह किया है कि अंतिम स्थिति को हरियाणा सरकार और राज्य सूचना आयोग की आधिकारिक वेबसाइटों पर सार्वजनिक किया जाए तथा आवश्यकता होने पर कानून एवं विधायी विभाग अथवा महाधिवक्ता से कानूनी राय ली जाए।
सूचना आयोग की वैधानिक स्थिति स्पष्ट रहना जरूरी
हेमंत का कहना है कि उनका प्रतिनिधित्व किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं है। उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि नागरिकों के सूचना के अधिकार को लागू करने वाली महत्वपूर्ण वैधानिक संस्था के गठन और उसके पदाधिकारियों की नियुक्तियों को लेकर कोई कानूनी भ्रम न रहे। उन्होंने कहा कि सरकारी आदेश की अस्पष्ट शब्दावली को लंबे समय तक अनिश्चित स्थिति में नहीं छोड़ा जाना चाहिए। प्रदेश सरकार को स्पष्ट, पारदर्शी और कानूनी रूप से प्रमाणित स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि सूचना आयोग के कामकाज और उसके आदेशों को लेकर नागरिकों तथा सार्वजनिक प्राधिकरणों के बीच कोई अनावश्यक भ्रम उत्पन्न न हो।