हरियाणा क्राइम: गैंगस्टर अमित डागर और कौशल चौधरी की कहानी

Atal Hind Team Online16 September 20268 min read70 viewsक्राइम
हरियाणा क्राइम: गैंगस्टर अमित डागर और कौशल चौधरी की कहानी

लॉरेंस बिश्नोई से दुश्मनी का पहलू

अमित डागर और कौशल चौधरी का नाम लॉरेंस बिश्नोई से जुड़े प्रतिद्वंद्वी गैंगों के संदर्भ में भी सामने आता रहा है।

एनआईए से जुड़ी रिपोर्ट में कहा गया कि 2018 में लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने कौशल चौधरी और अमित डागर को निशाना बनाने की कोशिश की थी।

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इसके बाद दोनों का नाम बंबीहा नेटवर्क के साथ और मजबूती से जुड़ा।

इस पूरे घटनाक्रम को पुलिस और जांच एजेंसियों ने दो विरोधी आपराधिक नेटवर्कों के संघर्ष के रूप में देखा।

यह दुश्मनी केवल व्यक्तिगत विवाद तक सीमित नहीं रही।

जांच एजेंसियों ने अलग-अलग मामलों में गैंगों के बीच क्षेत्र, रंगदारी और प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा की बात कही।

यही वजह है कि अमित डागर और कौशल चौधरी का नाम बंबीहा-बिश्नोई प्रतिद्वंद्विता के संदर्भ में भी आता है।

हालांकि किसी भी व्यक्ति पर किसी खास अपराध की जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित मामले के सबूत और अदालत का फैसला देखना जरूरी है।

चंडीगढ़ / 15 सितंबर 2026 / अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स

हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के अपराध जगत में अमित डागर और कौशल चौधरी का नाम लंबे समय से चर्चा में रहा है। दोनों को एक-दूसरे का करीबी सहयोगी माना जाता है। पुलिस और जांच एजेंसियों की कई रिपोर्टों में डागर को कौशल चौधरी का सबसे भरोसेमंद साथी बताया गया है।

कौशल चौधरी गुरुग्राम और आसपास के इलाकों में सक्रिय रहे। अमित डागर को उनके नेटवर्क का प्रमुख सहयोगी कहा जाता है। जब कौशल जेल में होते हैं तो गैंग से जुड़े बड़े फैसले और वसूली का काम डागर संभालते रहे। दोनों पर रंगदारी, हत्या और संगठित अपराध के आरोप लगे हैं।

इनकी साझेदारी का एक बड़ा आधार लॉरेंस बिश्नोई गैंग के साथ दुश्मनी भी है। 2018 में बिश्नोई गैंग ने दोनों को निशाना बनाने की कोशिश की थी। इसके बाद कौशल और डागर ने पंजाब के उन गिरोहों से संपर्क बढ़ाया जो बिश्नोई के खिलाफ थे।

बंबीहा गैंग के साथ इनका गठजोड़ रहा। 2016 के आसपास देवेंद्र बंबीहा को गुरुग्राम में ठिकाना देने की बात जांच में आई। इसके बाद दोनों नेटवर्क करीब आए। लॉरेंस बिश्नोई विरोधी मोर्चे में कौशल-डागर और बंबीहा सिंडिकेट एक साथ दिखे।

एनआईए की जांच में भी इनके संबंधों का जिक्र आया। अमित डागर जब रोहिणी जेल में थे तो उन्होंने व्हाट्सऐप के जरिए बंबीहा गैंग के सदस्यों से संपर्क किया। प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने की बातचीत हुई। जेल से ही कुछ साजिशों में भूमिका का आरोप लगा।

गुरुग्राम की खांडसा मंडी से रंगदारी वसूलने का नेटवर्क दोनों से जुड़ा बताया गया। सब्जी विक्रेताओं और ट्रक ऑपरेटर्स से नियमित रकम ली जाती थी। अमित डागर की पत्नी ट्विंकल कौशिक पर भी इस नेटवर्क को चलाने के आरोप लगे। उन्हें गिरफ्तार किया गया।दोनों पर कई मामले दर्ज हैं। कौशल चौधरी पर तीस से ज्यादा केस बताए जाते हैं। अमित डागर पर भी गंभीर आरोप हैं। एक लाख रुपये का इनाम घोषित रहा। लॉरेंस बिश्नोई को धमकी देकर पांच करोड़ रुपये की फिरौती मांगने का आरोप डागर पर लगा।

जेल में रहते हुए भी नेटवर्क चलाने के आरोप दोनों पर हैं। परिवार के सदस्यों और सहयोगियों के जरिए गतिविधियां जारी रखने की बात जांच में आई। अमित डागर झज्जर जेल समेत अलग-अलग जगहों पर रहे। कौशल भी हिरासत में रहे।पंजाब के कुछ मामलों में भी दोनों का नाम आया। लुधियाना में फायरिंग और रंगदारी के मामलों में प्रोडक्शन वारंट पर अमित डागर को लाया गया। कौशल चौधरी से जुड़े होने का जिक्र पुलिस ने किया।

यह साझेदारी अपराध की दुनिया में वफादारी का उदाहरण बताई जाती है। एक के जेल जाने पर दूसरा नेटवर्क संभाल लेता है। साझा दुश्मन होने से गठजोड़ मजबूत हुआ। बंबीहा गैंग के साथ मिलकर बिश्नोई विरोधी सिंडिकेट चलाने की बात सामने आई।एनआईए की चार्जशीट में विदेशी सहयोगियों का भी जिक्र है। अलग-अलग देशों में संपर्क बनाए रखने की बात कही गई। आतंकवादी तत्वों से संभावित लिंक की जांच भी हुई। अर्श डल्ला जैसे नामों से जुड़ाव का आरोप लगाया गया।

दोनों की शुरुआत स्थानीय स्तर से हुई। कौशल चौधरी पहले सामान्य काम करते थे। परिवार के विवाद और भाई की हत्या के बाद अपराध में आए। अमित डागर भी लंबे समय से सक्रिय रहे। साथ मिलकर गैंग मजबूत किया।आज दोनों अक्सर जेल में रहते हैं। फिर भी उनके नाम से जुड़ी गतिविधियां पूरी तरह रुकती नहीं दिखतीं। पुलिस और एजेंसियां लगातार कार्रवाई करती रहती हैं। संपत्तियों पर कार्रवाई और सहयोगियों की गिरफ्तारी होती रहती है।

सोशल मीडिया पर दोनों को हरियाणा के अपराध जगत की जय-वीरू जोड़ी कहा जाता है। यह उपमा लोकप्रिय है लेकिन आधिकारिक भाषा नहीं। उपलब्ध रिपोर्टों में दोनों के बीच लंबे सहयोग और नेटवर्क में साथ काम करने की बात जरूर सामने आती है।एनआईए की जांच के अनुसार 2016 के बाद अलग-अलग गैंगों के बीच गठजोड़ बढ़ा। कौशल चौधरी और अमित डागर ने देवेंद्र बंबीहा को गुरुग्राम में ठिकाना देने में भूमिका निभाई। इसके बाद संबंध मजबूत हुए। यही कड़ी बाद में बड़े अंतरराज्यीय नेटवर्क का हिस्सा बनी।

बंबीहा गैंग का नाम उसके संस्थापक देवेंद्र बंबीहा से जुड़ा था। 2016 में पुलिस मुठभेड़ में उनकी मौत के बाद नेतृत्व बंट गया। जांच एजेंसियों के अनुसार इसी दौर में कौशल और डागर की भूमिका महत्वपूर्ण हुई। नेटवर्क पंजाब और हरियाणा से दिल्ली तक पहुंचा।लॉरेंस बिश्नोई गैंग से दुश्मनी लंबे समय से चली आ रही है। पुलिस रिपोर्टों में बिश्नोई नेटवर्क और बंबीहा से जुड़े समूहों के बीच टकराव का उल्लेख मिलता है। कौशल चौधरी को बंबीहा गैंग से जुड़ा और बिश्नोई का प्रतिद्वंद्वी बताया गया। अमित डागर भी इसी नेटवर्क से जुड़े व्यक्ति के रूप में रिपोर्ट हुए।

2018 में हत्या की कथित साजिश का जिक्र एनआईए जांच में आया। लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने कौशल और डागर को निशाना बनाने की कोशिश की। यह घटना दोनों गैंगों के बीच बढ़ते टकराव का संकेत मानी गई। जेल भी संपर्क बनाए रखने का माध्यम बनी।2021 में विक्की मिड्ढूखेड़ा की हत्या के मामले में भी दोनों का नाम आया। मोहाली पुलिस ने आरोप लगाया कि साजिश में बंबीहा गैंग से जुड़े लोगों की भूमिका थी। अमित डागर के निर्देश पर शूटरों ने हमला किया। कौशल चौधरी को भी आरोपी बनाया गया। दोनों उस समय जेल में थे।

मार्च 2026 में मोहाली अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। 2019 में हुए इंदरजीत सिंह की हत्या के मामले में कौशल चौधरी, अमित डागर और गुरदेव सिंह को बरी कर दिया गया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। मुख्य गवाह ने पहचान नहीं की। इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी पर्याप्त नहीं मिले।

यह फैसला याद दिलाता है कि पुलिस जांच में नाम आना और अदालत में अपराध साबित होना अलग बातें हैं। अन्य मामलों की स्थिति अलग हो सकती है। हर मुकदमे की अपनी कानूनी प्रक्रिया होती है।अमित डागर को कौशल का राइट हैंड कहा जाता है। कुछ मीडिया रिपोर्टों में दोनों को बेहद करीबी सहयोगी बताया गया। लेकिन यह कोई कानूनी पद नहीं है। जांच रिपोर्टों से इतना जरूर पता चलता है कि दोनों के बीच लंबे समय से सहयोग के आरोप रहे हैं।

रंगदारी के आरोप संगठित अपराध का बड़ा हिस्सा रहे। एनआईए ने कहा कि विभिन्न गैंगों ने अपने इलाकों के नेटवर्क को बड़े गठजोड़ से जोड़ा। व्यापारियों और शराब कारोबारियों को धमकाकर पैसे मांगने के आरोप शामिल रहे। नवंबर 2024 में कौशल की पत्नी मनीषा को रंगदारी मांगने के मामले में गिरफ्तार किया गया।जेल से बाहर नेटवर्क चलाने के आरोप भी लगे। मोबाइल फोन और अन्य माध्यमों से संपर्क बनाए रखने की बात जांच में आई। अमित डागर के बारे में 2024 की रिपोर्ट में उन्हें जेल में बंद बताया गया। उनके खिलाफ हत्या और रंगदारी के कई आरोप बताए गए।

क्या दोनों को गैंग का संचालक कहना सही है? जांच दस्तावेजों में नेटवर्क के संचालन से जोड़ा गया है। लेकिन संदर्भ के साथ इस्तेमाल होना चाहिए। किसी जांच एजेंसी के अनुसार भूमिका बताना और अदालत द्वारा साबित करना अलग बातें हैं।जय-वीरू नाम सोशल मीडिया से आया। लंबे सहयोग के कारण यह उपमा दी गई। लेकिन यह आधिकारिक पहचान नहीं। वास्तविक रिकॉर्ड में सहयोग का आधार आपराधिक नेटवर्क से जुड़े आरोप हैं। निजी दोस्ती का विस्तृत आधिकारिक रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं है।

कहानी का दूसरा पक्ष अदालत के फैसले हैं। केवल पुलिस के आरोप लिखना पर्याप्त नहीं। 2026 का मोहाली फैसला इसका उदाहरण है। गंभीर आरोप होने के बावजूद ठोस सबूत जरूरी हैं। यही कानून की प्रक्रिया है।

अमित डागर और कौशल चौधरी की कहानी संगठित अपराध के बदलते स्वरूप को समझने में मदद करती है। स्थानीय गैंग दूसरे राज्यों के अपराधियों से संपर्क बनाते हैं। मोबाइल, सोशल मीडिया और विदेशी सहयोगी इसकी पहुंच बढ़ाते हैं। जांच एजेंसियां अब वित्तीय और डिजिटल संबंधों पर भी ध्यान देती हैं।

उपलब्ध सामग्री को देखते हुए उन्हें केवल दो दोस्त कहना अधूरा होगा। हर मामले में दोषी ठहराना भी सही नहीं। सार्वजनिक रिकॉर्ड में दोनों को एक आपराधिक नेटवर्क के सहयोगी के रूप में पेश किया गया है। 2026 में एक हत्या मामले में अदालत ने दोनों को बरी भी किया।

पुलिस और जांच एजेंसियों ने उन्हें हरियाणा और बंबीहा से जुड़े बड़े नेटवर्क में महत्वपूर्ण सहयोगियों के रूप में चिन्हित किया। उनके खिलाफ अलग-अलग मामलों में गंभीर आरोप रहे। लेकिन हर आरोप की अंतिम स्थिति अदालत के फैसले से तय होगी।

जन-जागरूकता सूचना:यह लेख किसी अपराधी या अपराध का समर्थन नहीं करता। इसका उद्देश्य सार्वजनिक रिकॉर्ड में उपलब्ध जानकारी को सरल भाषा में समझाना है। जहां पुलिस या जांच एजेंसी के आरोप हैं उन्हें आरोप के रूप में रखा गया है। जहां अदालत का फैसला उपलब्ध है वहां उसका उल्लेख किया गया है।जनता को इन गतिविधियों की जानकारी होना जरूरी है। रंगदारी और धमकियों से बचने के लिए सतर्क रहना चाहिए। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए एजेंसियां काम कर रही हैं।

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