हरियाणा में सिफारिशी पर्ची पर बवाल: पूर्व मंत्री की चिट्ठी वायरल

PGIMS रोहतक में पुनर्नियुक्ति पर सवाल, हाईकोर्ट ने लगाई रोक
क्या है पूरी खबर?
रोहतक के पंडित बीडी शर्मा पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (PGIMS) के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. कुंदन मित्तल की तीन साल की पुनर्नियुक्ति अब न्यायिक जांच के दायरे में है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 3 अगस्त 2026 के पुनर्नियुक्ति आदेश और 6 अगस्त के कार्यकारी परिषद के प्रस्ताव के संचालन पर रोक लगा दी है।
मामले में याचिकाकर्ता ने 58 वर्ष की आयु सीमा और पुनर्नियुक्ति की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। याचिका में पूर्व मंत्री मनीष कुमार ग्रोवर की ओर से मुख्यमंत्री को भेजी गई सिफारिश का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन आरोपों पर अदालत ने अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।
चंडीगढ़ / 22 सितंबर 2026 / अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
खबर का सार:
हरियाणा की राजनीति में एक बार फिर 'पर्ची और खर्ची' का मुद्दा गरमा गया है। पूर्व मंत्री मनीष ग्रोवर की ओर से मुख्यमंत्री को भेजी गई एक सिफारिशी चिट्ठी सार्वजनिक होने के बाद प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में खलबली मच गई है। इस खबर में जानिए कि कैसे नियमों को ताक पर रखकर की गई एक सिफारिश पर कोर्ट का स्टे आया और सरकार उसके खिलाफ ऊपरी अदालत जाने की तैयारी में है।
हरियाणा में सिफारिशी पर्ची पर सियासी बवाल: रोहतक पीजीआई के पूर्व एमएस की पुनर्नियुक्ति को लेकर पूर्व मंत्री की चिट्ठी वायरल
हरियाणा की राजनीति में अक्सर 'पर्ची और खर्ची' का जिक्र किसी न किसी रूप में सामने आता रहता है। लेकिन इस बार एक पूर्व मंत्री की सिफारिशी चिट्ठी ने राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक माहौल में बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। रोहतक स्थित पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय और पीजीआईएमएस अस्पताल के पूर्व मेडिकल सुप्रिटेंडेंट (एमएस) के कार्यकाल को बढ़ाने के लिए भेजी गई पर्ची अब चर्चा का मुख्य केंद्र बन गई है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री मनीष ग्रोवर ने राज्य के मुख्यमंत्री को एक औपचारिक सिफारिशी पत्र भेजा है। इस पत्र में रोहतक पीजीआई के पूर्व एमएस का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें दोबारा उसी पद पर नियुक्त करने यानी सेवा विस्तार देने का आग्रह किया गया है। चिट्ठी में जिस तरह के तर्कों का हवाला दिया गया है, उसको लेकर अब राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं।
पूर्व मंत्री की ओर से भेजे गए इस पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि उक्त डॉक्टर ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान हमेशा नियम-कायदों को किनारे रखकर पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की मदद की है। पत्र में लिखा गया है कि चूंकि डॉक्टर साहब ने भाजपा कार्यकर्ताओं की सहूलियत का पूरा ध्यान रखा और प्रशासनिक नियमों को दरकिनार करते हुए काम किया, इसलिए उन्हें पुरस्कार स्वरूप एक और सेवाकाल दिया जाना बेहद जरूरी है।
सिफारिशी चिट्ठी मिलते ही मुख्यमंत्री कार्यालय स्तर पर तुरंत संज्ञान लिया गया और प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया गया। पूर्व मंत्री की पर्ची के आधार पर संबंधित डॉक्टर की पुनर्नियुक्ति का रास्ता साफ करने की पूरी तैयारी कर ली गई थी। सरकारी मशीनरी ने बिना किसी अड़चन के पूर्व मंत्री की सिफारिश पर अमल करते हुए संबंधित डॉक्टर को पद पर बनाए रखने की हरी झंडी दिखा दी।
हालाँकि, यह मामला प्रशासनिक गलियारों तक ही सीमित नहीं रहा और जल्द ही कानूनी चौखट तक पहुंच गया। जब नियुक्ति प्रक्रिया की वैधता और नियमों की अनदेखी को चुनौती दी गई, तो माननीय अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस पुनर्नियुक्ति के आदेश पर तुरंत प्रभाव से स्टे (रोक) लगा दिया। अदालत के इस फैसले से सरकार और संबंधित प्रशासनिक विभाग को बड़ा झटका लगा है।
अदालत द्वारा स्टे दिए जाने के बाद भी यह मामला यहीं शांत होता नजर नहीं आ रहा है। सिफारिशी पर्ची और राजनीतिक रसूख की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकार अदालत के इस फैसले से पीछे हटने के बजाय निचले स्तर के स्टे ऑर्डर के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करने की तैयारी में जुट गई है। सरकार की इस कानूनी पैंतरेबाजी ने विवाद को और ज्यादा हवा दे दी है।

रोहतक पीजीआईएमएस न केवल हरियाणा बल्कि आसपास के पड़ोसी राज्यों के मरीजों के लिए भी स्वास्थ्य सेवाओं का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। ऐसे में प्रदेश के इतने बड़े और प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थान में प्रशासनिक पदों पर नियमों को ताक पर रखकर नियुक्ति करने की सिफारिश सामने आने से आम जनता और स्वास्थ्य सेवा से जुड़े विशेषज्ञों में गहरी नाराजगी देखी जा रही है।
हरियाणा की राजनीति में पिछले कई सालों से पारदर्शी भर्ती और योग्यता के आधार पर काम करने के बड़े-बड़े दावे किए जाते रहे हैं। सत्ताधारी दल हमेशा से 'बिना पर्ची, बिना खर्ची' के सुशासन देने की बात करता रहा है। लेकिन पूर्व मंत्री द्वारा सरेआम नियमों की धज्जियां उड़ाने की बात स्वीकार करने वाली चिट्ठी सामने आने के बाद विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का सीधा मौका मिल गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के मामले सरकार की साख पर गहरा असर डालते हैं। जब कोई पूर्व जनप्रतिनिधि लिखित रूप में यह स्वीकार करता है कि किसी अधिकारी ने पार्टी कार्यकर्ताओं के फायदे के लिए कायदे-कानूनों की अनदेखी की, तो इससे पूरे प्रशासनिक ढांचे की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। अब देखना यह होगा कि ऊपरी अदालत में इस मामले की सुनवाई के दौरान सरकार का क्या रुख रहता है।