ज्ञानेश कुमार विवाद: विपक्ष ने मांगी गिरफ्तारी, चुनाव दोबारा कराने की मांग

ये खबर चुनाव आयोग के अंदर चल रही असहमति और विपक्ष के तीखे हमलों के बारे में है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के बाद पूरे देश में हंगामा मच गया है। विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी और कई राज्यों के चुनाव दोबारा कराने की मांग कर रहे हैं। अंदर पूरी बात विस्तार से है।
नई दिल्ली /23 सितंबर 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के विश्लेषण पर आधारित इस रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर गहराते मतभेद और विपक्ष के तीखे हमलों का पूरा विवरण प्रस्तुत किया गया है। इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट के बाद विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें गिरफ्तार करने और महाराष्ट्र, बिहार, हरियाणा, तमिलनाडु तथा पश्चिम बंगाल में दोबारा चुनाव कराने की मांग की है। जानिए इस विवाद के पीछे के मुख्य तथ्य, आंकड़े और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल और विपक्ष का हमला
भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को लेकर देश की राजनीति में एक नया और अभूतपूर्व विवाद छिड़ गया है। इंडियन एक्सप्रेस में पत्रकार रतिका चोपड़ा की विस्तृत खोजी रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, निष्पक्षता और आंतरिक फैसलों पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद पूरे विपक्षी खेमे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर देश के लोकतांत्रिक ढांचे और चुनावी पारदर्शिता के साथ समझौता करने का गंभीर आरोप लगाया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह, तृणमूल कांग्रेस के अभिषेक बनर्जी, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन, शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे, और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव समेत प्रमुख नेताओं ने ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने और उन्हें गिरफ्तार करने तक की मांग कर डाली है। सीपीएम ने भी आयोग की साख पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल हटाने की मांग की है।
विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा रहा है और संवैधानिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर फैसले लिए जा रहे हैं। विपक्षी नेताओं के बयानों में चुनाव आयोग के इस संकट को देश के लोकतांत्रिक इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा घोटाला करार दिया जा रहा है।
चुनाव आयुक्तों की सुरक्षा का कानून और ऐतिहासिक संदर्भ
संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सीधी दंडात्मक कार्रवाई या गिरफ्तारी नहीं की जा सकती है। इसके पीछे मोदी सरकार द्वारा दिसंबर 2023 में पारित किया गया एक विशेष कानून है। यह कानून तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के खिलाफ तेलंगाना में दर्ज हुई एक एफआईआर के बाद संसद में लाया गया था। इस कानून के तहत चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कामकाज के निष्पादन के दौरान किसी भी कानूनी या दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा प्रदान की गई है।
उल्लेखनीय है कि यह कानून उस समय पारित हुआ था जब संसद के दोनों सदनों से विपक्ष के कुल 141 सांसदों को निलंबित कर दिया गया था। विपक्षी नेताओं का कहना है कि संसद में विपक्ष की गैरमौजूदगी का फायदा उठाकर आयोग को कानूनी सुरक्षा देने वाला यह बिल पास कराया गया था। हालांकि, कानूनी जानकारों और विश्लेषकों का मानना है कि यद्यपि गिरफ्तारी से सुरक्षा प्राप्त है, लेकिन मतदाता सूचियों में गड़बड़ी और सॉफ्टवेयर से जुड़ी अनियमितताओं के मामलों की स्वतंत्र जांच पर कोई कानूनी रोक नहीं है।
मतदाता सूची और एसआईआर (SIR) प्रक्रिया पर उठते सवाल
पूरे विवाद के केंद्र में स्पेशल समरी रिवीजन (एसआईआर) प्रक्रिया और मतदाता सूचियों से करोड़ों मतदाताओं के नाम हटाया जाना है। विपक्ष का दावा है कि एसआईआर के जरिए लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम चुनावी सूचियों से अवैध तरीके से काट दिए गए हैं। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीप्त, राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष रांका और सौरभ दास ने भी आयोग की प्रक्रिया पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।
आलोचकों का तर्क है कि चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर में अनधिकृत बदलाव किए गए, जिससे वैध मतदाताओं के अधिकार छीन लिए गए। मई के महीने में मतदाता पंजीकरण के फॉर्म 6 (Form 6) में एक नया सवाल जोड़ा गया था, जिसमें पूछा गया था कि 'क्या आपके माता-पिता का नाम पिछले एसआईआर में दर्ज था?' यदि आवेदक का उत्तर 'ना' होता, तो उसका नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जा सकता था। रिपोर्ट के अनुसार, 1960 के मतदाता पंजीकरण नियमों में बदलाव करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है, चुनाव आयोग स्वयं ऐसा संशोधन नहीं कर सकता। दोनों चुनाव आयुक्तों ने भी इस बदलाव पर प्रक्रियात्मक सवाल उठाए थे।

चुनाव आयोग के भीतर मतभेद और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर बड़ा खुलासा किया है। आयोग तीन सदस्यीय निकाय है, जहां निर्णय सर्वसम्मति या बहुमत (2-1) के आधार पर लिए जाने चाहिए ताकि पारदर्शिता बनी रहे। हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 10 महीनों के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों (एस.एस. संधू और विवेक जोशी) की राय या असहमति को दरकिनार कर कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसले लिए।
रिपोर्ट में बताया गया है कि लगभग 14 ऐसे प्रमुख मौके आए जब अन्य आयुक्तों ने एसआईआर प्रक्रिया, डेटा हैंडलिंग और प्रशासनिक निर्णयों पर गंभीर सवाल और असहमतियां दर्ज कराई थीं। इसके बावजूद आयोग ने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर इन सवालों के बिंदुवार जवाब देने के बजाय एक संक्षिप्त और औपचारिक बयान जारी किया। आयोग ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि तीन सदस्यीय आयोग में सहमति और असहमति होना एक सामान्य और रूटीन प्रक्रिया का हिस्सा है।
विपक्षी दलों के नेताओं की प्रतिक्रियाएं और पुनः चुनाव की मांग
तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने आरोप लगाया कि 5 महीने पहले (अप्रैल महीने में) जब उनकी पार्टी का प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग से मिलने गया था, तब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने उनके साथ अमर्यादित व्यवहार करते हुए 'गेट लॉस्ट' (Get Lost) कहा था। टीएमसी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा आयोग को लिखे गए 9 पत्रों में से किसी का भी जवाब नहीं दिया गया। अभिषेक बनर्जी ने आरोप लगाया कि आईटी विभाग की अधिकारी सीमा खन्ना के सॉफ्टवेयर के जरिए मात्र 1 घंटे के भीतर 1 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम 'तार्किक विसंगति' की श्रेणी में डालकर हटा दिए गए।
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और उसके बाद हुए उपचुनावों (मीरापुर, कुड़की, कानपुर, करहल, अयोध्या और अंबेडकर नगर) में बड़े पैमाने पर अधिकारियों की मनमर्जी से धांधली की गई। उन्होंने कहा कि फर्जी वोटिंग रोकने में आयोग पूरी तरह विफल रहा। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव ने पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने काउंटिंग और वोटिंग डेटा सुरक्षित रखने की समय सीमा को 1 वर्ष से घटाकर 45 दिन कर दिया, ताकि भविष्य में अदालती चुनौती के लिए सबूत ही न बचें।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि देश के युवाओं (Gen Z) के सामने यह सच्चाई रखी जाएगी कि लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर करके चुनाव जीते गए हैं। वहीं, कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी), आप, और टीएमसी ने एक सुर में मांग की है कि दिल्ली, महाराष्ट्र, बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के पिछले विधानसभा चुनावों के नतीजों को रद्द कर बैलेट पेपर (Ballot Paper) से दोबारा चुनाव कराए जाएं।
सरकार और भारतीय जनता पार्टी का पक्ष
विपक्ष के इन तीखे हमलों पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की ओर से राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने पलटवार करते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की। भाजपा ने विपक्ष के तमाम आरोपों को बेबुनियाद और संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने की साजिश करार दिया।
संबित पात्रा ने कहा कि तीन चुनाव आयुक्तों के बीच पत्राचार, विचार-विमर्श और किसी मुद्दे पर अलग-अलग राय होना लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली की जीवंतता को दर्शाता है। यदि तीनों आयुक्त हर फैसले पर बिना चर्चा के सहमत हो जाते, तो यही विपक्ष उन पर 'डिक्टेटरशिप' और 'गोदी' होने का आरोप लगाता। जब आयुक्तों के बीच स्वतंत्र संवाद और 14 औपचारिक विचार-विमर्श (Official Deliberations) हो रहे हैं, तो यह साबित करता है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक संस्था के रूप में पूरी तरह निष्पक्षता से काम कर रहा है।
न्यायपालिका का रुख और नागरिक समाज की पहल
चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और एसआईआर विवाद को लेकर विपक्षी गठबंधन (INDIA Alliance) ने न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया है। 28 जून 2026 को विपक्षी दलों के संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को एक विस्तृत पत्र सौंपा, जिसमें चुनाव आयोग में हो रही कथित अनियमितताओं और एसआईआर प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई है।
नागरिक समाज और स्वतंत्र संस्थाएं भी इस मुद्दे पर लगातार आवाज उठाती रही हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), दिवंगत प्रोफेसर जगदीप छोकर, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और 'सतर्क नागरिक संगठन' की अंजलि भारद्वाज जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मतदाता अधिकारों की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ी है। इसके अतिरिक्त, कई स्वतंत्र पत्रकारों और शोधकर्ताओं की रिपोर्टों ने चुनावी प्रक्रिया की खामियों को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भविष्य की चुनौतियां
चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त पर उठे इन अभूतपूर्व सवालों ने देश की लोकतांत्रिक साख के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। एक समय था जब चुनाव आयोग की कार्यशैली पर पूरे देश को अटूट विश्वास हुआ करता था, लेकिन वर्तमान विवादों ने आयोग के इकबाल और जनविश्वास को प्रभावित किया है।
यदि चुनाव आयोग को जनता और राजनीतिक दलों के बीच अपनी निष्पक्षता की छवि दोबारा स्थापित करनी है, तो उसे बंद कमरों के बयानों से बाहर आकर खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सभी तकनीकी व प्रक्रियात्मक सवालों के पारदर्शी उत्तर देने होंगे। देश का लोकतंत्र तभी मजबूत रह सकता है जब प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास हो कि उसका वोट सुरक्षित है और चुनाव निष्पक्षता के उच्चतम मानकों पर आयोजित किए जा रहे हैं।