गिरफ्तारी के कारण: ‘पहले थाने चलिए’ वाला सवाल क्यों?

गिरफ्तारी के कारण: ‘पहले थाने चलिए’ वाला सवाल क्यों?
धारा पहले, कारण बाद में!
त्वरित सारांश
भारत में किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी केवल पुलिस की कार्रवाई नहीं, बल्कि उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर कानूनी कदम है। मौजूदा कानून में गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताने, परिजनों या मित्र को सूचना देने और तय समय में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने जैसी सुरक्षा दी गई है। वहीं 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया कि सात साल तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी अपने आप जरूरी नहीं है।
शुरुआती हुक
हमारे यहां कानून की किताब में सब बराबर हैं—पुलिस भी, नागरिक भी, आरोपी भी और संविधान भी। फर्क बस इतना है कि पुलिस के हाथ में कानून की किताब होती है और नागरिक के हाथ में कई बार अपनी जेब टटोलने की मजबूरी। कागज पर व्यवस्था कहती है कि गिरफ्तारी के कारण बताए जाएंगे, अधिकार समझाए जाएंगे और कार्रवाई कानून के अनुसार होगी। लेकिन आम नागरिक के लिए सबसे बड़ा सवाल अक्सर यहीं पैदा होता है—“साहब, आखिर मेरा अपराध क्या है?”
कभी-कभी जवाब मिलता है—“पहले थाने चलिए, वहां सब पता चल जाएगा।” यही वह वाक्य है जो कानून और नागरिक के अनुभव के बीच की दूरी को सामने ला देता है। किसी व्यक्ति को यह मालूम होना चाहिए कि पुलिस उसे किस मामले में और किस कानूनी आधार पर बुला रही है या गिरफ्तार कर रही है। सवाल यह नहीं कि पुलिस को जांच का अधिकार क्यों है; सवाल यह है कि उस अधिकार का इस्तेमाल किस प्रक्रिया और किस जवाबदेही के साथ हो रहा है।
कानून क्या कहता है?
1 जुलाई 2024 से देश में आपराधिक प्रक्रिया के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 यानी BNSS लागू है। गृह मंत्रालय ने इसे नए आपराधिक कानूनों के हिस्से के रूप में अधिसूचित किया है। गिरफ्तारी, FIR और जांच की प्रक्रिया से जुड़े कई प्रावधान अब BNSS में हैं।
BNSS की धारा 47 इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार बिना वारंट गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को पुलिस अधिकारी या गिरफ्तारी करने वाला व्यक्ति तुरंत उस अपराध का पूरा विवरण या गिरफ्तारी के अन्य आधार बताएगा। यदि मामला ऐसा है जिसमें जमानत का अधिकार लागू होता है, तो गिरफ्तार व्यक्ति को उसके जमानत संबंधी अधिकार की जानकारी भी दी जानी है।
यानी कानून की भाषा में “पहले चलिए, बाद में बताएंगे” कोई सामान्य नियम नहीं है। गिरफ्तारी के समय व्यक्ति को यह जानने का अधिकार है कि उसके खिलाफ कार्रवाई किस अपराध या किस आधार पर की जा रही है। यह जानकारी इसलिए भी जरूरी है ताकि वह अपने बचाव, जमानत और कानूनी सहायता के बारे में प्रभावी निर्णय ले सके।
सुप्रीम कोर्ट ने भी इस अधिकार को केवल औपचारिकता नहीं माना है। मई 2024 के एक फैसले में अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार व्यक्तिगत और स्पष्ट होने चाहिए ताकि गिरफ्तार व्यक्ति को हिरासत और रिमांड के खिलाफ अपना बचाव करने तथा जमानत मांगने का प्रभावी अवसर मिल सके। अदालत ने उस मामले में गिरफ्तारी और रिमांड को अवैध मानते हुए निरस्त कर दिया था।
गिरफ्तारी का मतलब हर बार तुरंत हिरासत नहीं
यहां एक और महत्वपूर्ण बात है, जिसे आम नागरिक अक्सर नहीं जानता। किसी व्यक्ति के खिलाफ संज्ञेय अपराध की सूचना या संदेह होना और उसे तुरंत गिरफ्तार कर लेना एक ही बात नहीं है।
BNSS की धारा 35 में गिरफ्तारी की परिस्थितियों का प्रावधान है। सात साल तक की सजा वाले अपराधों में पुलिस को केवल अपराध की आशंका या शिकायत के आधार पर गिरफ्तारी कर देने के बजाय कानून में बताई गई आवश्यकताओं पर विचार करना होता है। इनमें आगे अपराध रोकना, उचित जांच करना, सबूत से छेड़छाड़ रोकना, गवाहों को प्रभावित करने से रोकना या अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित करना जैसे कारण शामिल हैं।
जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को और स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी पुलिस के लिए उपलब्ध एक वैधानिक विवेक है, अनिवार्य कार्रवाई नहीं। सात साल तक की सजा वाले अपराधों में BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस देना सामान्य नियम है और गिरफ्तारी तभी की जानी चाहिए जब कानून की आवश्यकताएं पूरी हों और गिरफ्तारी वास्तव में जरूरी हो।
इसका सीधा अर्थ है कि “FIR हो गई, इसलिए गिरफ्तारी तो होगी ही”—ऐसा कोई सार्वभौमिक कानूनी नियम नहीं है। FIR जांच की शुरुआत हो सकती है; अपराध सिद्ध होने का अंतिम निर्णय अदालत करती है। गिरफ्तारी जांच की एक संभावित प्रक्रिया है, हर मामले में अनिवार्य परिणाम नहीं।
फिर “पहले थाने चलिए” कहने का सवाल
यहीं से उस आम नागरिक की परेशानी शुरू होती है जो पुलिस की भाषा और कानूनी भाषा के बीच फंस जाता है। यदि पुलिस किसी व्यक्ति को जांच में शामिल होने के लिए बुलाती है, तो उसे यह पता होना चाहिए कि उसे किस मामले में और किस उद्देश्य से बुलाया जा रहा है।
BNSS की धारा 35(3) के तहत पुलिस, जहां गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है, व्यक्ति को जांच में उपस्थित होने का नोटिस दे सकती है। BNSS की दूसरी अनुसूची में ऐसे नोटिस का निर्धारित प्रारूप भी दिया गया है, जिसमें FIR या केस नंबर, तारीख और संबंधित धाराओं जैसी जानकारी के लिए स्थान है।
मार्च 2026 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी एक मामले में कहा कि किसी नागरिक को केवल अधूरी सूचना देकर थाने बुलाना उचित नहीं है। अदालत ने नोटिस में अपराध संख्या और आरोप की जानकारी तथा FIR की प्रति उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह फैसला पूरे देश के लिए अलग से सुप्रीम कोर्ट का बाध्यकारी नियम नहीं है, लेकिन यह नागरिक को जांच में बुलाने की पारदर्शिता पर महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण सामने रखता है।
इसलिए पुलिस का जांच करना जरूरी है, लेकिन जांच का अर्थ यह नहीं कि नागरिक को अंधेरे में रखा जाए। कानून की ताकत का असली मतलब यही है कि पुलिस के पास अधिकार भी हों और उन अधिकारों के इस्तेमाल की प्रक्रिया भी स्पष्ट हो।
FIR में धारा लगना अपराध सिद्ध होना नहीं
FIR इस पूरी कहानी का अगला अध्याय है। शिकायतकर्ता अपनी बात पुलिस को देता है और यदि सूचना से संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो कानून के अनुसार पुलिस उसे दर्ज करती है। इसके बाद जांच शुरू होती है और उपलब्ध सामग्री के आधार पर आगे की कार्रवाई होती है।
BNSS की धारा 173 के तहत संज्ञेय अपराध से संबंधित सूचना मौखिक या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी दी जा सकती है और यह प्रावधान क्षेत्राधिकार की बाधा को भी कई स्थितियों में कम करता है। दर्ज की गई सूचना की प्रति शिकायतकर्ता या पीड़ित को मुफ्त में देने का प्रावधान है।
इसका एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि FIR में दर्ज धाराएं किसी व्यक्ति को अदालत द्वारा दोषी घोषित नहीं करतीं। FIR जांच की शुरुआत का दस्तावेज है। पुलिस अपनी जांच करती है, साक्ष्य जुटाती है, जरूरत के अनुसार आरोप तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ती है और अंततः अदालत साक्ष्यों के आधार पर अपराध और दोष का फैसला करती है।
लेकिन सामाजिक व्यवस्था में अक्सर मामला उल्टा चलता है। FIR में धारा लगी नहीं कि मोहल्ले की अदालत बैठ गई। धारा ज्यादा तो अपराध बड़ा, धारा कम तो अपराध छोटा। जैसे अपराध नहीं हुआ, शेयर बाजार का भाव खुला हो। जबकि कानून में आरोपी और दोषी के बीच का फर्क बहुत महत्वपूर्ण है।
FIR लिखने से बचना भी सवाल खड़ा करता है
कई नागरिकों की शिकायत होती है कि पुलिस FIR दर्ज करने के बजाय आवेदन लिखकर देने को कहती है। कभी कहा जाता है कि पहले जांच होगी, कभी कहा जाता है कि आवेदन रख लिया गया है और कभी यह भी कहा जाता है कि FIR दर्ज होने से थाने के अपराध आंकड़े बढ़ जाएंगे।
किसी विशेष थाने या अधिकारी के बारे में ऐसी शिकायत को सत्य मानने के लिए संबंधित रिकॉर्ड या स्वतंत्र प्रमाण जरूरी होगा। लेकिन कानूनी व्यवस्था यह स्पष्ट करती है कि यदि सूचना से संज्ञेय अपराध सामने आता है तो FIR दर्ज करने का दायित्व महत्वपूर्ण है।
फरवरी 2026 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले में अदालत ने BNSS की धारा 173 के संदर्भ में स्पष्ट किया कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर FIR पंजीकरण की व्यवस्था अनिवार्य है, हालांकि BNSS ने तीन से सात साल तक की सजा वाले कुछ अपराधों के लिए सीमित प्रारंभिक जांच का विशेष प्रावधान भी रखा है।
यहां फर्क समझना जरूरी है। हर शिकायत FIR नहीं बनती। लेकिन जहां कानून के अनुसार संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, वहां पुलिस द्वारा केवल सुविधा या रिकॉर्ड के दबाव के कारण FIR से बचना कानून की मूल व्यवस्था से मेल नहीं खाता।
BNSS में प्रारंभिक जांच का नया पहलू
BNSS की धारा 173(3) में तीन साल या उससे अधिक लेकिन सात साल से कम सजा वाले कुछ संज्ञेय अपराधों के मामलों में पुलिस को, वरिष्ठ अधिकारी की पूर्व अनुमति के साथ, प्रारंभिक जांच करने की व्यवस्था दी गई है। ऐसी प्रारंभिक जांच यह देखने के लिए होती है कि प्रथमदृष्टया मामला आगे बढ़ाने योग्य है या नहीं और कानून में इसके लिए 14 दिन की समयसीमा दी गई है।
यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आम नागरिक के लिए “प्रारंभिक जांच” और “FIR से इनकार” एक जैसी बातें लग सकती हैं। जबकि कानून ने दोनों के बीच फर्क रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में भी इस अंतर को समझाया और कहा कि जहां प्रारंभिक जांच के बाद प्रथमदृष्टया मामला बनता है, वहां FIR दर्ज कर जांच आगे बढ़नी चाहिए।
इसलिए पुलिस को भी प्रक्रिया स्पष्ट करनी चाहिए और नागरिक को भी यह पूछने का अधिकार है कि उसकी शिकायत किस रूप में दर्ज हुई है, FIR बनी है या नहीं, और यदि नहीं बनी तो कानून के तहत आगे क्या रास्ता है।
FIR न लिखे तो रास्ता बंद नहीं
कानून में शिकायतकर्ता को केवल थाने के दरवाजे तक सीमित नहीं किया गया है। BNSS की धारा 173(4) के तहत यदि थाना प्रभारी सूचना दर्ज करने से मना करता है तो पीड़ित या शिकायतकर्ता उसकी सूचना लिखित रूप में संबंधित पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है। यदि वहां भी समाधान नहीं होता तो कानून के अनुसार मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने का रास्ता मौजूद है।
यानी नागरिक के पास विकल्प हैं। समस्या यह है कि बहुत से लोगों को इन विकल्पों की जानकारी ही नहीं होती। यही कारण है कि कानूनी अधिकार केवल किताब में होना पर्याप्त नहीं है। उसका सरल भाषा में नागरिक तक पहुंचना भी जरूरी है।
तकनीक आ गई, तो पारदर्शिता क्यों नहीं?
अब जरा उस भारत की तरफ देखिए जो मोबाइल से पैसा भेजता है, टैक्स भरता है, टिकट बुक करता है और सरकारी सेवाओं का आवेदन ऑनलाइन करता है। पुलिस व्यवस्था भी इस डिजिटल बदलाव से बाहर नहीं है।
गृह मंत्रालय के अनुसार 1 फरवरी 2026 तक देश के सभी 17,798 पुलिस स्टेशन CCTNS का इस्तेमाल कर रहे थे। CCTNS में FIR, चार्जशीट और पुलिस प्रक्रिया से संबंधित रिकॉर्ड डिजिटल रूप में दर्ज किए जाते हैं। मंत्रालय ने यह भी बताया कि राज्य CCTNS नागरिक पोर्टलों के माध्यम से शिकायत दर्ज करने, शिकायत की स्थिति देखने और FIR की प्रति प्राप्त करने जैसी सेवाएं उपलब्ध हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि देश के हर नागरिक को हर राज्य में बिल्कुल एक जैसी ऑनलाइन सुविधा मिल रही है। लेकिन तकनीकी ढांचा मौजूद है और उसे नागरिक सुविधा तथा पारदर्शिता के लिए इस्तेमाल करने की दिशा स्पष्ट है।
सरकार ICJS के जरिए पुलिस, अदालत, जेल, फोरेंसिक और अभियोजन व्यवस्था को जोड़ने की दिशा में भी काम कर रही है। गृह मंत्रालय के अनुसार इसका उद्देश्य डेटा साझा करना, रिकॉर्ड में त्रुटियां कम करना, जांच को अधिक प्रभावी बनाना और कागजी रिकॉर्ड पर निर्भरता कम करना है।
तो फिर सवाल सीधा है—जब सिस्टम FIR का डिजिटल रिकॉर्ड बना सकता है, तो नागरिक को उसकी शिकायत का नंबर, स्थिति और उपलब्ध दस्तावेज भी क्यों न स्पष्ट रूप से दिखें?
डिजिटल रिकॉर्ड से “मैंने तो ऐसा नहीं लिखा” खत्म हो सकता है
कागज की व्यवस्था में एक पुरानी समस्या है—किसने क्या लिखा, किसने क्या पढ़ा और किसने किस पर हस्ताक्षर किए। डिजिटल रिकॉर्ड इस विवाद को काफी हद तक कम कर सकता है।
यदि शिकायत ऑनलाइन दर्ज होती है, समय दर्ज होता है, शिकायत संख्या मिलती है, FIR बनने पर उसकी प्रति उपलब्ध होती है और जांच अधिकारी की जानकारी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार मिलती है, तो नागरिक और पुलिस दोनों के लिए रिकॉर्ड मजबूत होता है।
बेशक हर जांच की संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा सकती। अपराध की जांच में गवाहों की सुरक्षा, सबूतों की गोपनीयता और जांच की रणनीति भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए पारदर्शिता का अर्थ यह नहीं कि जांच की हर जानकारी इंटरनेट पर डाल दी जाए। पारदर्शिता का अर्थ है कि नागरिक को उसके अपने मामले से संबंधित वैधानिक जानकारी समय पर और विश्वसनीय तरीके से मिले।
पुलिस को भी चाहिए सुरक्षा और स्पष्ट नियम
इस बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पुलिस को अपराध रोकने, सबूत जुटाने और आरोपियों से पूछताछ करने का अधिकार चाहिए। हर कार्रवाई को संदेह की नजर से देखना भी न्यायपूर्ण नहीं होगा।
गंभीर अपराध में तत्काल गिरफ्तारी आवश्यक हो सकती है। मौके पर मौजूद अपराधी, हिंसक स्थिति, फरार होने का वास्तविक खतरा या सबूत नष्ट किए जाने की आशंका जैसे मामलों में पुलिस की त्वरित कार्रवाई जरूरी हो सकती है। कानून इसलिए पुलिस को शक्तियां देता है।
लेकिन शक्ति और मनमानी में फर्क प्रक्रिया तय करती है। अगर कानून कहता है कि गिरफ्तारी आवश्यक होने पर कारण दर्ज किए जाएं, नोटिस का प्रावधान है और गिरफ्तार व्यक्ति को आधार बताया जाए, तो इन प्रक्रियाओं का पालन पुलिस और नागरिक दोनों के हित में है।
परिवार को सूचना भी अधिकार का हिस्सा
गिरफ्तारी केवल उस व्यक्ति को प्रभावित नहीं करती जिसे हिरासत में लिया गया है। उसके परिवार पर भी इसका सीधा असर पड़ता है। BNSS की धारा 48 के अनुसार गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी को गिरफ्तार व्यक्ति के बताए गए रिश्तेदार, मित्र या अन्य नामित व्यक्ति को गिरफ्तारी और हिरासत की जगह की जानकारी देने का दायित्व है।
संविधान का अनुच्छेद 22 भी गिरफ्तार व्यक्ति को महत्वपूर्ण सुरक्षा देता है। संविधान के अनुसार गिरफ्तार और हिरासत में लिए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए, यात्रा के आवश्यक समय को छोड़कर। इसके बाद हिरासत जारी रखने के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति आवश्यक है।
इन प्रावधानों का उद्देश्य पुलिस को कमजोर करना नहीं है। उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य की शक्ति किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर इस्तेमाल हो तो उसका रिकॉर्ड, कारण और न्यायिक निगरानी मौजूद रहे।
कानून की जानकारी गरीब आदमी की ताकत भी है
कानूनी अधिकारों की जानकारी अक्सर उन लोगों तक कम पहुंचती है जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। पैसा, सामाजिक प्रभाव और कानूनी जानकारी की कमी के कारण एक सामान्य नागरिक थाने की प्रक्रिया से घबरा सकता है।
ऐसी स्थिति में कानूनी सहायता व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण यानी NALSA के अनुसार पुलिस द्वारा पूछताछ के लिए बुलाए गए व्यक्ति और गिरफ्तार व्यक्ति भी उसके प्रारंभिक कानूनी सहायता ढांचे के तहत सहायता प्राप्त कर सकते हैं। हिरासत में मौजूद व्यक्ति भी मुफ्त कानूनी सहायता की पात्र श्रेणी में आता है।
NALSA की आधिकारिक हेल्पलाइन 15100 है। राज्य और जिला स्तर पर विधिक सेवा प्राधिकरण भी मौजूद हैं।
इसलिए किसी व्यक्ति को पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़े तो सबसे जरूरी बात घबराना नहीं, बल्कि दस्तावेज और प्रक्रिया समझना है। केस या FIR नंबर पूछना, उपलब्ध नोटिस की प्रति रखना, गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी लेना और आवश्यकता होने पर कानूनी सहायता लेना उसके लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
असली सवाल पुलिस की ताकत नहीं, उसकी जवाबदेही है
अंततः बहस पुलिस बनाम नागरिक की नहीं होनी चाहिए। दोनों कानून के हिस्से हैं। पुलिस को अपराधी से निपटने की ताकत चाहिए और नागरिक को पुलिस की शक्ति के दुरुपयोग से बचाने वाली सुरक्षा।
समस्या तब पैदा होती है जब गिरफ्तारी को जांच की सफलता का प्रमाण समझ लिया जाए या धाराओं की संख्या को अपराध की गंभीरता का अंतिम प्रमाण मान लिया जाए। कानून की प्रक्रिया इससे अलग है। जांच का उद्देश्य तथ्य और साक्ष्य सामने लाना है; दोष तय करना अदालत का काम है।
इसलिए व्यवस्था में कुछ बातें बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए—गिरफ्तारी आवश्यक है तो उसका कानूनी आधार स्पष्ट हो, जहां नोटिस पर्याप्त है वहां नोटिस का इस्तेमाल हो, FIR दर्ज हो तो उसकी प्रति और नंबर उपलब्ध हो, शिकायत नहीं लिखी जाती तो नागरिक को वैधानिक अगला रास्ता बताया जाए और डिजिटल रिकॉर्ड को केवल पुलिस के आंतरिक काम के बजाय नागरिक पारदर्शिता का माध्यम बनाया जाए।
धारा कानून की हो, डर व्यवस्था का नहीं
किसी पुलिस अधिकारी के दरवाजे पर पहुंचने पर नागरिक का पहला सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “साहब, बचने का रास्ता क्या है?” उसका सवाल होना चाहिए—“साहब, कानून के तहत मेरे अधिकार और आपके अधिकार क्या हैं?”
यही लोकतांत्रिक पुलिस व्यवस्था की असली कसौटी है। अपराधी को कानून से डरना चाहिए, पुलिस से नहीं। पुलिस को कानून का अधिकार चाहिए और नागरिक को कानून की सुरक्षा।
“पहले थाने चलिए, वहीं सब पता चल जाएगा” अगर कहीं व्यवहार में सुनाई देता है, तो उसे कानून की सामान्य प्रक्रिया नहीं बनने देना चाहिए। क्योंकि गिरफ्तारी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा असर डालती है और इसलिए उसके साथ कारण, रिकॉर्ड, प्रक्रिया और न्यायिक निगरानी जुड़ी होनी चाहिए।
आज भारत के पास BNSS, CCTNS, ICJS, डिजिटल FIR और कानूनी सहायता जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। चुनौती अब केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें जमीन पर सरल, पारदर्शी और समान रूप से लागू करने की है।
आखिर में बात इतनी सी है—धारा कानून की होनी चाहिए, डर व्यवस्था का नहीं। FIR नागरिक की शिकायत का रिकॉर्ड होनी चाहिए, आंकड़े सुंदर दिखाने का साधन नहीं। गिरफ्तारी जांच का कानूनी औजार हो सकती है, उपलब्धि का तमगा नहीं।
और शायद पुलिस-नागरिक संबंध में सबसे जरूरी बदलाव यही होगा कि थाने का दरवाजा डर की जगह कानून की जानकारी का दरवाजा बने। नागरिक को यह पता हो कि शिकायत कैसे दर्ज होगी, आरोपी को यह पता हो कि गिरफ्तारी क्यों हुई और पुलिस को यह पता हो कि उसकी शक्ति की सीमा कहां तक है।
तभी संविधान की वह किताब, जिसमें सब बराबर हैं, थाने के दरवाजे तक पहुंचकर भी बराबर दिखाई देगी।
कानूनी सूचना: यह लेख सामान्य नागरिक जागरूकता और सार्वजनिक कानूनी प्रावधानों की व्याख्या के उद्देश्य से है। किसी विशेष मामले में तथ्य और प्रक्रिया अलग हो सकती है; ऐसे मामलों में योग्य अधिवक्ता या संबंधित विधिक सेवा प्राधिकरण से सलाह लेना उचित है।