जब कलम डरने लगे तो सवाल भी मरने लगते हैं: पत्रकारिता की कड़वी सच्चाई

जब कलम डरने लगे तो सवाल भी मरने लगते हैं
_==_राजेन्द्र सिंह जादौन=
अनायास ही मैं अपने बिस्तर पर पड़ा किसी मृत देह की भाँति निश्चेष्ट पड़ा रहता हूँ। आँखें खुली होती हैं, मगर चेतना जाने किन अनजान गलियारों में भटकती रहती है। जो घटित नहीं हुआ, उसके घटित होने की आशंका और जो घट चुका है, उसकी स्मृतियों के बीच मन किसी अनजान घटनाक्रम में उलझा रहता है। उस समय लगता है जैसे मस्तिष्क की नसें किसी अदृश्य दबाव में फटने को हैं। भीतर कोई मद्धम-सा स्वर लगातार फुसफुसाता रहता है। इतना धीमा कि उसे कोई दूसरा सुन नहीं सकता और इतना तीखा कि उससे बच पाना संभव नहीं होता। ज्वर में तपती देह जिस तरह भीतर से जलती है, उसी तरह विचारों का ताप भी मनुष्य को भीतर तक दग्ध करता रहता है।
कभी-कभी सोचता हूँ कि आखिर क्यों किसी को अपने जीवन में इतना महत्व दिया जाए कि उसके बदल जाने से स्वयं का संसार ही बदल जाए। समय के साथ मनुष्य बदलते हैं और संबंधों के अर्थ भी। जो आज आपको अपना सबसे करीबी बताता है, जरूरी नहीं कि कल आपकी उपस्थिति उसके लिए उतनी ही महत्वपूर्ण रहे। शायद इसी अनुभव ने मुझे लोगों से दूर रहना सिखाया है। अब मैं नहीं चाहता कि कोई मुझे अपने जीवन में बहुत अधिक महत्व दे। न कोई मुझसे प्रश्न करे और न मैं किसी से प्रश्न करूँ। सच कहूँ तो किसी के लिए आम होना भी अब स्वीकार नहीं। मैंने अपने चारों ओर एक अलग-थलग, विरक्त दुनिया बना ली है, जिसमें किसी का प्रवेश सहज नहीं है। मुझे अपने शब्दों में उलझे रहना, स्वयं से संवाद करना और अपनी ही खामोशी में उत्तर तलाशना अधिक अच्छा लगता है।
फिर भी कुछ लोग इस एकांत की दीवारें पार कर लेते हैं। वे धीरे-धीरे जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। उनकी उपस्थिति आदत बन जाती है और आदत कब आत्मीयता में बदल जाती है, इसका पता ही नहीं चलता। लेकिन फिर एक दिन वही मद्धम फुसफुसाहट लौट आती है। इस बार वह किसी संबंध की आवाज नहीं होती, बल्कि उस पत्रकार की आवाज होती है जो अपने भीतर हजारों सवाल लेकर जीता है।
लिखोगे तो क्या होगा? यही एक सवाल कभी-कभी पूरी रात को निगल जाता है।
खबर सामने होती है। दस्तावेज सामने होते हैं। किसी पीड़ित की शिकायत सामने होती है। भ्रष्टाचार या अनियमितता के आरोप होते हैं। प्रशासनिक लापरवाही के तथ्य होते हैं। जनता की परेशानी होती है। पत्रकार सब देखता है, सुनता है, प्रमाण जुटाता है और फिर कलम उठाने से पहले एक पल ठिठक जाता है। कहीं नोटिस न आ जाए। कहीं मुकदमा न हो जाए। कहीं पुलिस का बुलावा न आ जाए। कहीं सच लिखने की कीमत परिवार को न चुकानी पड़े। कहीं सत्ता से पूछा गया एक सवाल व्यक्तिगत दुश्मनी न समझ लिया जाए। यही वह क्षण है जब पत्रकार की कलम और उसका भय आमने-सामने खड़े होते हैं।
वह खबर को फिर पढ़ता है। दस्तावेजों की दोबारा जाँच करता है। शब्दों को तौलता है। शीर्षक बदलता है। कुछ वाक्य नरम करता है। कुछ शब्द हटाता है और फिर सोचता है कि क्या इतना लिखना भी सुरक्षित है। धीरे-धीरे खबर की धार कम होने लगती है। तथ्य वही रहते हैं, लेकिन शब्दों के भीतर का साहस कहीं पीछे छूट जाता है। और यही पत्रकारिता की सबसे बड़ी पीड़ा है।
पत्रकार किसी सरकार का दुश्मन नहीं होता। लेकिन वह सरकार का प्रवक्ता भी नहीं हो सकता। उसका काम किसी सत्ता के खिलाफ अभियान चलाना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना है। सत्ता किसी भी दल की हो, कुर्सी पर कोई भी बैठा हो, पत्रकार का प्रश्न यही होना चाहिए कि जनता के साथ क्या हो रहा है। जनता के पैसे का उपयोग कहाँ हुआ, किसी योजना का लाभ किसे मिला, किसी अधिकारी की जवाबदेही क्या है, किसी शिकायत पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई और किसी निर्णय का असर आम आदमी पर क्या पड़ा।
ये सवाल किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं होते। ये व्यवस्था की जवाबदेही के सवाल होते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि आज सवाल पूछने वाला ही अपने सवाल के परिणाम से डरने लगा है।
यह डर केवल बड़े मीडिया संस्थानों का विषय नहीं है। असली डर उस छोटे शहर और कस्बे के पत्रकार का है, जो अकेले खबर करता है। उस ग्रामीण संवाददाता का है जिसके पास न बड़ी कानूनी टीम है, न आर्थिक सुरक्षा और न ही किसी संकट की स्थिति में पीछे खड़ी कोई बड़ी ताकत। उसके पास एक मोबाइल है, एक कैमरा है, कुछ दस्तावेज हैं और सच लिखने की जिद है। वह दिनभर समाज के लिए लड़ता है और रात में अपने ही सवालों से लड़ता है।
किसी गरीब की टूटी झोपड़ी देखता है तो खबर लिख देता है। किसी किसान की समस्या सुनता है तो उसे सामने लाता है। किसी सरकारी कार्यालय में अनियमितता की शिकायत मिलती है तो दस्तावेज तलाशता है। किसी पीड़ित को न्याय नहीं मिलता तो उसकी आवाज बनता है। लेकिन जब वही मामला किसी प्रभावशाली व्यक्ति या ताकतवर व्यवस्था से जुड़ता है तो उसके भीतर एक आवाज उठती है संभलकर, इसका अंजाम भी हो सकता है।
यही भय धीरे-धीरे कलम की धार को कुंद करता है। और जब कलम की धार कुंद होती है तो केवल पत्रकार कमजोर नहीं होता, जनता की आवाज कमजोर होती है।
सरकारें आती हैं और जाती हैं। सत्ता बदलती है। चेहरे बदलते हैं। राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलती हैं। लेकिन पत्रकारिता का धर्म नहीं बदलना चाहिए। सरकार अच्छा काम करती है तो उसे तथ्य के साथ जनता तक पहुँचाना पत्रकारिता है। सरकार से कोई गलती होती है तो उसे तथ्य के साथ सामने रखना भी पत्रकारिता है। जनता किसी समस्या से जूझ रही है तो उसकी आवाज बनना पत्रकारिता है और सत्ता से सवाल पूछना भी पत्रकारिता है।
पत्रकार को सत्ता से शत्रुता नहीं करनी चाहिए, लेकिन सत्ता की निकटता उसकी कलम को बंधक भी नहीं बना सकती।पत्रकार की असली निष्ठा किसी कुर्सी से नहीं, सच से होती है।
मेरे कमरे की चार दीवारें इस संघर्ष की साक्षी हैं। उन्होंने मेरी खामोशियाँ सुनी हैं। मेरी तेज होती धड़कनों को महसूस किया है। उन रातों को देखा है जब दिनभर दूसरों के लिए सवाल लिखने वाला पत्रकार रात में अपने ही भीतर के सवालों से घिरा बैठा रहा। कभी-कभी लगता है कि दूसरों के अंधेरे में रोशनी तलाशते-तलाशते पत्रकार स्वयं अपने भीतर बहुत अंधेरा जमा कर लेता है। लेकिन सुबह होते ही सब फिर शुरू हो जाता है।
फोन बजता है। किसी गाँव से कोई अपनी समस्या बताता है। कोई दस्तावेज भेजता है। कोई कहता है कि साहब, हमारी खबर छाप दीजिए। और पत्रकार फिर उठ खड़ा होता है। कलम फिर हाथ में आती है। डर अपनी जगह रहता है, लेकिन सवाल उससे बड़ा हो जाता है।
शायद यही पत्रकारिता है। डर के बावजूद सच लिखना। अकेले होने के बावजूद सवाल पूछना। दबाव के बावजूद तथ्य सामने रखना और यह जानते हुए भी आगे बढ़ना कि हर सवाल का जवाब आसानी से नहीं मिलेगा।
यह पीड़ा केवल मेरी नहीं है। यह उन तमाम पत्रकारों की पीड़ा है, जिन्होंने अपनी जिंदगी समाज की आवाज बनने में लगा दी है और आज भी कलम उठाने से पहले एक क्षण यह सोचने को मजबूर हैं कि कहीं सच लिखने की कीमत मुकदमा, नोटिस या गिरफ्तारी तो नहीं होगी।
लेकिन कलम को मरने नहीं दिया जा सकता। क्योंकि पत्रकार की खामोशी केवल एक व्यक्ति की खामोशी नहीं होती। वह उन हजारों लोगों की आवाज का दब जाना है, जो स्वयं अपनी बात सत्ता तक नहीं पहुँचा सकते।
इसलिए मेरी कलम किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं है। वह किसी दल के लिए नहीं है। वह किसी कुर्सी के लिए नहीं है। वह उस आदमी के लिए है जिसकी आवाज दब गई है, उस किसान के लिए है जिसकी शिकायत फाइलों में दब गई है, उस गरीब के लिए है जिसे न्याय का इंतजार है और उस नागरिक के लिए है जो यह जानना चाहता है कि उसके नाम पर चलने वाली व्यवस्था वास्तव में उसके लिए क्या कर रही है।
डर रहेगा। दबाव रहेगा। असहमति रहेगी। लेकिन जिस दिन पत्रकार इन सबसे डरकर सवाल पूछना छोड़ देगा, उस दिन अखबार में खबरें तो छपेंगी, मगर पत्रकारिता धीरे-धीरे मर जाएगी।
क्योंकि किसी कमरे की खामोशी उतनी भयावह नहीं होती, जितनी एक पत्रकार की कलम की खामोशी। इसलिए सवाल पूछना जरूरी है। सच लिखना जरूरी है। जनता की आवाज बनना जरूरी है। क्योंकि जिस दिन कलम डरने लगेगी, उस दिन सिर्फ पत्रकार नहीं डरेगा सवाल भी डरने लगेंगे।