भारत में हर साल होती है करोड़ों टन भोजन की बर्बादी, कुपोषण और भुखमरी से जूझ रहे हैं लाखों लोग

भारत भोजन की बर्बादी के मामले में दुनिया भर में दूसरे स्थान पर आता है। एक तरफ देश में करोड़ों टन खाना कचरे में फेंका जाता है, तो वहीं दूसरी तरफ देश के लाखों लोग कुपोषण और भुखमरी का गंभीर शिकार हैं। भारत में हर साल लगभग 7.8 करोड़ टन खाने की भारी बर्बादी होती है।
भारत में भोजन की बर्बादी और आंकड़े
चीन भोजन बर्बाद करने के मामले में दुनिया में पहले स्थान पर है और चीन में हर साल 10.86 करोड़ टन खाना बर्बाद होता है। भारत इस सूची में दूसरे स्थान पर बना हुआ है। देश में सालाना लगभग ₹92,651 करोड़ से लेकर ₹1.55 लाख करोड़ मूल्य का खाना पूरी तरह बर्बाद हो जाता है। भारत के लिए इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं हो सकती कि एक तरफ देश के करोड़ों लोगों को भरपेट भोजन नसीब नहीं होता है।
संसाधन और मेहनत की बर्बादी
जब खेत में पूरी मेहनत के साथ उगाया गया अन्न गोदामों में खराब हो जाता है या फिर विवाह समारोहों में भरी हुई प्लेटों से फेंक दिया जाता है, तो यह केवल भोजन का नुकसान नहीं होता है। इसके साथ ही बीज, किसान की कीमती मेहनत, खाद, पानी, जमीन, संसाधन, बिजली, श्रम और उन सभी पर हुआ खर्च भी पूरी तरह बेकार हो जाता है। इसके अलावा किसी भी जरूरतमंद व्यक्ति तक भोजन के पहुंचने की संभावना भी हमेशा के लिए व्यर्थ हो जाती है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की रिपोर्ट
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के फूड वेस्ट इंडेक्स 2024 के आधार पर जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत के घरों में सालाना लगभग 7.82 करोड़ टन भोजन बर्बाद होता है। देश में प्रति व्यक्ति खाने की यह बर्बादी करीब 55 किलोग्राम सालाना है। खाने की यह बर्बादी मुख्य तौर पर हमारे घरों, होटलों और खुदरा दुकानों में बड़ी मात्रा में होती है।
पड़ोसी देशों में भोजन की स्थिति
रिपोर्ट के अनुसार भारत के पड़ोसी देशों में भी खाने की बहुत बड़ी बर्बादी होती है। चीन में हर व्यक्ति सालभर में औसतन 76 किलो खाना बर्बाद करता है। पाकिस्तान में हर व्यक्ति सालाना औसतन 130 किलो खाना बर्बाद करता है और वहां सालभर में कुल 3.07 करोड़ टन खाना बर्बाद होता है। इसी तरह बांग्लादेश में 1.41 करोड़ टन, अफगानिस्तान में 52.29 लाख टन, नेपाल में 28.31 लाख टन, श्रीलंका में 16.56 लाख टन और भूटान में 15 हजार टन से ज्यादा खाना हर साल बर्बाद हो जाता है।
वैश्विक स्तर पर भुखमरी और बर्बादी का संकट
भारत में जितनी भारी मात्रा में खाना बर्बाद किया जाता है, उतने अन्न से देश के करोड़ों भूखे लोगों का आसानी से पेट भरा जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि दुनियाभर में हर साल एक अरब टन से ज्यादा खाना बर्बाद हो जाता है। खाने की यह बर्बादी तब हो रही है जब दुनियाभर में 78.3 करोड़ से ज्यादा लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। इतना ही नहीं, आज दुनिया की एक तिहाई आबादी पर भोजन का गंभीर संकट मंडरा रहा है।
खेतों से लेकर गोदामों तक बर्बादी
भोजन की यह बर्बादी केवल खाने की थाली तक ही सीमित नहीं है, बल्कि खेत से लेकर बाजार और गोदामों तक पहुंचने के दौरान भी बड़े पैमाने पर नुकसान होता है। भूख और बर्बादी का यह संतुलन केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर नैतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संकट भी है। राजस्थान राज्य में भी स्थिति बेहद चिंताजनक है, जहां रोजाना करीब 9,490 मीट्रिक टन भोजन बर्बाद होता है। इस बर्बादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा शादी-पार्टियों और बड़े आयोजनों से आता है।
गोदामों में सड़ता सरकारी अनाज
मध्य प्रदेश में सीएजी और संबंधित विभागों की रिपोर्ट के अनुसार, 2021 से 2026 के बीच सरकारी और निजी गोदामों में करीब एक लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न नमी, बारिश, चूहों और समय पर उठाव न होने के कारण पूरी तरह खराब हो गया। इस बर्बाद हुए अनाज की कीमत करोड़ों रुपये आंकी गई है। रायसेन, सीहोर, विदिशा और आसपास के गोदामों में करीब 70 हजार मीट्रिक टन गेहूं सड़ गया है। बारिश और नमी के कारण करीब 21 हजार मीट्रिक टन धान तथा कीड़ों की वजह से लगभग 8,500 मीट्रिक टन दलहन भी बर्बाद हो गया है।
पर्यावरणीय और नीतिगत चुनौतियां
यह गंभीर समस्या केवल नैतिक या आर्थिक ही नहीं, बल्कि एक बड़ी पर्यावरणीय समस्या भी है। लैंडफिल में सड़ने वाला भोजन शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस मीथेन छोड़ता है। बर्बाद होता हुआ यह भोजन हमारी धरती को और अधिक गर्म करता है और गर्म होती हुई धरती के कारण अन्न उगाना और भी ज्यादा कठिन होता जा रहा है। नीतिगत मोर्चे पर भी कई खामियां मौजूद हैं जिनके कारण कुपोषण से लड़ने के लिए जरूरी फल, सब्जियां और दुग्ध उत्पाद इस वितरण तंत्र में लगभग उपेक्षित रह जाते हैं।
उम्मीद की किरण और समाधान
इस गहरी निराशा के बीच कुछ उम्मीद की किरणें भी दिखाई देती हैं जहां कई संस्थाएं और युवाओं की टोलियां 'रोटी बैंक' के माध्यम से बचा हुआ भोजन जरूरतमंदों तक पहुंचा रही हैं। राष्ट्रव्यापी 'नेक कामगार कानून' जैसी पहल इस दिशा में बड़ी बाधाओं को दूर कर सकती है। आपूर्ति श्रृंखला में भारी निवेश करके, गोदामों में अधिकारियों की जवाबदेही तय करके और समाज को अपनी आदतें बदलकर इस गंभीर समस्या से निपटा जा सकता है। भोजन की बर्बादी रोकना कोई दान नहीं बल्कि हमारा एक बड़ा कर्तव्य है।