सोनीपत में पिता ने बनाई बेटियों की ताकत, मां के जाने के बाद प्रियंका और स्नेहा ने हासिल की बड़ी सफलता

सिर से मां का साया उठा तो पिता बने बेटियों की ताकत, सपनों को दी उड़ान
नौ साल पहले बेटियों के सिर से उठ गया था मां का साया, पिता ने हिम्मत बनकर थामा हाथ
प्रियंका बनी एडवोकेट, स्नेहा ने हासिल किया लैब टेक्नीशियन का डिप्लोमा
स्वतंत्रता दिवस पर महर्षि वाल्मीकि आश्रम ट्रस्ट ने दोनों बेटियों को किया सम्मानित
सोनीपत के रणबीर सिंह रोहिल्ला की रिपोर्ट के अनुसार,
मां का साया सिर से उठ जाना किसी भी बच्चे के जीवन का सबसे बड़ा दुख होता है। खासकर उस समय, जब बेटियां अपने भविष्य के सपने बुन रही हों। लेकिन अगर पिता हौसला बनकर साथ खड़ा हो जाए, तो मुश्किलों की राह भी मंजिल तक पहुंचा देती है। सोनीपत की प्रियंका और स्नेहा की कहानी इसी संघर्ष, हिम्मत और पिता के समर्पण की भावुक मिसाल है। करीब नौ साल पहले दोनों बहनों के सिर से मां का साया उठ गया था। मां के जाने के बाद परिवार के सामने कई मुश्किलें आईं, लेकिन पिता ने बेटियों को टूटने नहीं दिया। उन्होंने मां की कमी तो पूरी नहीं कर सके, लेकिन बेटियों के लिए उनका हौसला जरूर बन गए। पिता ने दोनों बेटियों को पढ़ाया, उनका हौसला बढ़ाया और उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। समय बीतता गया और बेटियों ने भी पिता की उम्मीदों को अपनी मेहनत से मजबूत किया। प्रियंका ने एलएलबी की पढ़ाई पूरी कर एडवोकेट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की है, वहीं स्नेहा ने लैब टेक्नीशियन का डिप्लोमा हासिल किया है। दोनों बहनों ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हार नहीं मानी और मेहनत के दम पर अपने सपनों को साकार किया।
स्वतंत्रता दिवस पर मिला सम्मान
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर महर्षि वाल्मीकि आश्रम ट्रस्ट, ककरोई रोड, श्याम नगर, सोनीपत में दोनों बेटियों के सम्मान में समारोह आयोजित किया गया। इससे पहले आश्रम परिसर में राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। इसके बाद प्रियंका और स्नेहा को उनकी उपलब्धियों, संघर्ष और सफलता के लिए सम्मानित किया गया। समारोह में ट्रस्ट के चेयरमैन नरेंद्र लोहट, वाइस चेयरमैन सूरजभान, ओमप्रकाश सौदा, अशोक बिरला, रामेश्वर राणा, नीटू, सतबीर, बालकिशन मंडल, सुरेश कुमार, बलराज, इंदरजीत राणा सहित श्याम नगर के अनेक निवासी मौजूद रहे।
सम्मान मिला बेटियों को, लेकिन गर्व पिता को भी हुआ
सम्मान के इस खास पल में बेटियों के चेहरे पर खुशी थी, लेकिन दिल में मां की कमी भी महसूस हो रही थी। नौ साल पहले जिस मां का हाथ उनके सिर पर नहीं रहा, आज उनकी उपलब्धियों को देखकर शायद सबसे ज्यादा खुशी उसी मां को होती। वहीं, बेटियों की सफलता देखकर पिता के लिए यह पल किसी बड़े पुरस्कार से कम नहीं था। जिस संघर्ष में उन्होंने बेटियों का हाथ थामा था, आज उसी संघर्ष का परिणाम उनके सामने था। प्रियंका और स्नेहा की कहानी सिर्फ दो बेटियों की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस पिता के त्याग और हौसले की कहानी भी है, जिसने पत्नी के जाने के बाद बेटियों को कमजोर नहीं पड़ने दिया। यह कहानी समाज को एक खूबसूरत संदेश देती है कि बेटियों को अगर भरोसा, शिक्षा और परिवार का साथ मिल जाए तो वे किसी भी परिस्थिति को मात देकर अपने सपनों को सच कर सकती हैं। स्वतंत्रता दिवस पर दोनों बेटियों का सम्मान वास्तव में उनकी उपलब्धियों के साथ-साथ उस पिता के संघर्ष, त्याग और विश्वास का भी सम्मान है, जिसने बेटियों के सपनों को अपने सपने समझकर उन्हें उड़ान दी।