चुनाव आयोग का बड़ा यू-टर्न: फॉर्म-6 से माता-पिता वाली शर्त हटी?

चुनाव आयोग ने उन राज्यों में ऑनलाइन फॉर्म-6 से SIR से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा हटा दी है जहां विशेष गहन पुनरीक्षण पूरा हो चुका है। अब नए मतदाताओं को माता-पिता या दादा-दादी का 2003 की वोटर लिस्ट में नाम होने की जानकारी नहीं देनी होगी। यह फैसला दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्ति के बाद आया है।
नई दिल्ली/30 सितंबर 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
नए वोटर बनने की प्रक्रिया में एक बड़ी राहत मिल गई है। चुनाव आयोग बैकफुट पर आ गया है। फॉर्म-6 में वह अतिरिक्त हिस्सा गायब हो गया है जो कई युवाओं को परेशान कर रहा था।
बात SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की है। कई राज्यों में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण चला। इसके दौरान ऑनलाइन फॉर्म-6 में एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ दी गई थी। इसमें आवेदक से पूछा जाता था कि क्या उसका या उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछले SIR यानी साल 2000 के दशक की वोटर लिस्ट में था।
अगर नाम था तो बूथ नंबर और सीरियल नंबर जैसी डिटेल भी भरनी होती थी। कई युवा मतदाता इस शर्त से परेशान थे। जिनके परिवार का नाम पुरानी लिस्ट में नहीं था उनके लिए फॉर्म भरना मुश्किल हो जाता था।
दोनों चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इस पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने इसे अनधिकृत और अवैध बताया। उनका कहना था कि वैधानिक फॉर्म-6 में बिना नियम बदले ऐसा बदलाव नहीं किया जा सकता।
26 सितंबर को तीनों आयुक्तों की बैठक हुई। उसके बाद आयोग ने साफ किया कि SIR अवधि खत्म होने के बाद सामान्य फॉर्म ही इस्तेमाल होंगे। बुधवार देर रात ECINET पोर्टल पर बदलाव कर दिया गया।
अब जिन राज्यों में SIR पूरा हो चुका है वहां ऑनलाइन फॉर्म-6 से यह अतिरिक्त घोषणा गायब हो गई है। आवेदक सिर्फ वैधानिक फॉर्म-6 भरेंगे। ECINET ऐप और संबंधित मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पोर्टल से भी यह हिस्सा हटा दिया गया है।
जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR अभी चल रहा है वहां यह घोषणा अभी भी लागू है। वहां नए आवेदकों को पुरानी लिस्ट से परिवार का लिंक बताना होगा।
चुनाव आयोग का कहना है कि मूल फॉर्म-6 में कोई कानूनी बदलाव नहीं किया गया था। SIR के दौरान अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार SIR के मामले में इस घोषणा को सही ठहराया था।
फिर भी आयुक्तों की आपत्ति के बाद आयोग ने SIR पूरे राज्यों में इसे हटाने का फैसला लिया। इससे नए मतदाताओं खासकर युवाओं को राहत मिलेगी। अब उन्हें पुराने रिकॉर्ड की तलाश नहीं करनी पड़ेगी।
फॉर्म-6 मतदाता सूची में नाम जुड़वाने का मुख्य फॉर्म है। 18 साल पूरे होने वाले युवा इसे भरकर वोटर बनते हैं। पहले सामान्य फॉर्म में माता-पिता की पुरानी लिस्ट वाली शर्त नहीं थी। SIR के दौरान यह जोड़ी गई।
इससे कई परिवार परेशान हुए। कुछ लोगों के माता-पिता का नाम पुरानी लिस्ट में नहीं था। कुछ के नाम हटा दिए गए थे। ऐसे में फॉर्म भरने में अड़चन आती थी।
आयोग के अंदर भी मतभेद सामने आए थे। रिपोर्ट्स के अनुसार आयुक्त संधू और जोशी ने पिछले कई महीनों में कई बार आपत्ति दर्ज कराई। फॉर्म-6 के अलावा वोटर डेटा और अन्य मुद्दों पर भी सवाल उठे।अब आयोग का यह कदम विवाद को शांत करने वाला माना जा रहा है। विशेषज्ञ कहते हैं कि वैधानिक फॉर्म में बदलाव के लिए नियम संशोधन जरूरी है। बिना उसके अतिरिक्त शर्त लगाना सही नहीं था।
मतदाता सूची की शुद्धता जरूरी है। गलत नाम हटाने और सही नाम जोड़ने की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। SIR का मकसद यही था। लेकिन अतिरिक्त दस्तावेज की मांग से कई पात्र मतदाता प्रभावित हो सकते थे।युवा वोटर लोकतंत्र की रीढ़ हैं। पहली बार वोट डालने वाले आसानी से रजिस्टर हो सकें तो भागीदारी बढ़ेगी। इस बदलाव से प्रक्रिया सरल हुई है।
आयोग ने साफ किया है कि SIR चल रहे क्षेत्रों में अतिरिक्त घोषणा बनी रहेगी। वहां प्रक्रिया पूरी होने तक यही व्यवस्था लागू रहेगी। पूरा होने के बाद वहां भी सामान्य फॉर्म लागू हो जाएगा।ECINET पोर्टल पर अब SIR पूरे राज्यों के आवेदक सीधे वैधानिक फॉर्म भर सकते हैं। डाउनलोड वाले वर्जन में पहले से यह घोषणा नहीं थी। सिर्फ ऑनलाइन में दिखाई दे रही थी।
यह घटना चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर भी रोशनी डालती है। तीन सदस्यीय आयोग में सर्वसम्मति से फैसले लिए जाने चाहिए। आयुक्तों की आपत्ति पर ध्यान देना लोकतांत्रिक तरीका है।राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। कुछ ने CEC पर सवाल उठाए तो कुछ ने प्रक्रिया की पारदर्शिता की मांग की। अब फैसला आने के बाद चर्चा शांत पड़ने की उम्मीद है।
नए मतदाताओं के लिए सलाह है कि अपने राज्य में SIR की स्थिति जांच लें। अगर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है तो सामान्य फॉर्म-6 भरें। जरूरी दस्तावेज जैसे आयु प्रमाण और पता प्रमाण तैयार रखें।मतदाता सूची में नाम जुड़वाना नागरिक का अधिकार है। प्रक्रिया आसान हो तो ज्यादा लोग इसमें शामिल होंगे। आयोग का यह कदम सही दिशा में है।
ऐतिहासिक रूप से मतदाता सूची का पुनरीक्षण समय-समय पर होता रहा है। 2000 के दशक में भी गहन पुनरीक्षण हुए थे। तब तकनीक इतनी विकसित नहीं थी। आज डिजिटल पोर्टल से काम आसान हो गया है।फिर भी पुराने रिकॉर्ड से जोड़ने की शर्त कई लोगों के लिए चुनौती बन गई थी। खासकर उन परिवारों के लिए जो प्रवासी हैं या जिनके पुराने दस्तावेज नहीं बचे।
आयोग ने अब स्पष्ट किया है कि गैर-SIR अवधि में नियम 1960 के तहत सामान्य फॉर्म ही लागू होंगे। यह कानूनी रूप से सही कदम है।आगे भी अगर कोई बदलाव हो तो पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए। आयुक्तों के बीच सहमति से फैसले लें तो विवाद कम होंगे।यह फैसला उन लाखों युवाओं के लिए राहत भरा है जो पहली बार वोटर बनने जा रहे हैं। अब उन्हें अनावश्यक कागजी कार्रवाई से मुक्ति मिल गई है।
चुनाव आयोग का काम निष्पक्ष और पारदर्शी होना चाहिए। इस मामले में आयुक्तों की आपत्ति को स्वीकार कर बदलाव करना सही दिशा दिखाता है।मतदाता जागरूक रहें और सही जानकारी लेकर फॉर्म भरें। किसी भी समस्या पर स्थानीय चुनाव अधिकारी से संपर्क कर सकते हैं।इस पूरे प्रकरण से एक बात साफ है कि लोकतंत्र में सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है। सही आपत्ति पर ध्यान देकर व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सकता है।