जनता साथ, संस्थाओं की साख पर सवाल क्यों? जानिए क्या कहती है सर्वे रिपोर्ट

जनता साथ, संस्थाओं की साख पर सवाल क्यों? जानिए क्या कहती है सर्वे रिपोर्ट

लोकतंत्र की असली ताकत वोट में नहीं बल्कि उस भरोसे में होती है जो वोट के बाद बचा रहता है। नागरिक को यदि अपने वोट और अधिकारों के साथ संस्थाओं के निष्पक्ष व्यवहार का भरोसा न हो, तो लोकतंत्र का आधार कमजोर होता है। इंडिया टुडे-सीवोटर के अगस्त 2026 के मूड ऑफ द नेशन सर्वे में संस्थाओं पर बढ़ते अविश्वास को सबसे गंभीर संकेत माना गया है।

  • जनवरी 2026 में 46 प्रतिशत लोग लोकतंत्र को सुरक्षित मानते थे जो अब बढ़कर 46.7 प्रतिशत हो गया है जो इसे खतरे में मानते हैं।
  • चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष मानने वालों की संख्या अगस्त 2025 के 64.4 प्रतिशत से घटकर 51.9 प्रतिशत रह गई है।
  • प्रवेश और सरकारी भर्ती परीक्षाओं की निष्पक्षता पर 67 प्रतिशत लोगों ने कम या बिल्कुल भरोसा नहीं जताया है।
  • करीब 47 प्रतिशत लोग सरकार के आर्थिक प्रबंधन को औसत, खराब या बहुत खराब मानते हैं।

संस्थाओं की साख और जनता का घटता विश्वास

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लोकतंत्र की असली ताकत वोट में नहीं, उस भरोसे में निहित है जो मतदान के बाद भी सुरक्षित रहता है। नागरिक को यदि अपने वोट, अधिकार और शिकायत के साथ संस्थाओं के निष्पक्ष व्यवहार पर भरोसा न रहे, तो लोकतंत्र का बुनियादी ढांचा कमजोर पड़ने लगता है। इंडिया टुडे-सीवोटर के अगस्त 2026 के ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वेक्षण का सबसे गंभीर संकेत विभिन्न संस्थाओं पर लगातार बढ़ते अविश्वास की ओर इशारा करता है। जनवरी 2026 में 46 प्रतिशत लोग लोकतंत्र को सुरक्षित मानते थे, लेकिन अब 46.7 प्रतिशत लोग इसे खतरे में मानते हैं जबकि 41.6 प्रतिशत लोग इसे अभी भी सुरक्षित मानते हैं। चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष मानने वालों की संख्या अगस्त 2025 के 64.4 प्रतिशत से भारी गिरावट के बाद अब 51.9 प्रतिशत ही रह गई है। वहीं ऐसा न मानने वालों की संख्या 31.7 प्रतिशत से बढ़कर सीधे 40.9 प्रतिशत तक पहुंच गई है। ये आंकड़े किसी एक राजनीतिक दल के खिलाफ फैसला नहीं हैं, बल्कि यह पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बड़ा सवालिया निशान खड़े करते हैं।

नीति पर सहमति और प्रक्रिया पर गहराता संदेह

यहीं पर इस पूरे सर्वेक्षण का सबसे बड़ा विरोधाभास खुलकर सामने आता है कि जनता की मुद्दों पर पूरी सहमति है, लेकिन उन्हें लागू करने वाली प्रक्रिया पर उसका भरोसा कमजोर होता जा रहा है। समान नागरिक संहिता, एक साथ चुनाव कराने और अवैध प्रवासन के खिलाफ सख्त कार्रवाई को जनता का पर्याप्त समर्थन मिल रहा है। लेकिन इसके बावजूद नागरिक संस्थाओं के कामकाज पर पूरी तरह से आश्वस्त नजर नहीं आ रहे हैं। इसका मतलब साफ है कि जनता बदलाव की मांग तो कर रही है, पर उस बदलाव को लाने वाली पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में बनी हुई है। किसी भी नीति से असहमति होना लोकतंत्र का एक स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है। चिंता तब और अधिक बढ़ने लगती है जब नियम बनाने और उन्हें लागू करने वाली संस्थाओं की निष्पक्षता पर ही सवाल उठने लगें। तब वह विवाद किसी एक नीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता ही कटघरे में आ खड़ी होती है। समाज में सहमति तो बनी हुई है, लेकिन उस सहमति के नीचे अविश्वास लगातार गहराता जा रहा है।

युवाओं का भविष्य और परीक्षा व्यवस्था पर सवाल

जब देश का युवा किसी भी परीक्षा की निष्पक्षता पर से अपना भरोसा खो देता है, तो उसकी सीधी चोट व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ती है। युवाओं के लिए किसी भी संस्था का सीधा अर्थ परीक्षा केंद्र, भर्ती बोर्ड और नौकरी पाने का एक तय रास्ता होता है। नीट पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर हुआ आंदोलन देश के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग तक जा पहुंचा था। झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में भी सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर युवाओं का बड़ा असोष सामने आ चुका है। सवाल बिलकुल साफ है कि जब योग्यता की परीक्षा ही पूरी तरह निष्पक्ष न हो, तो युवाओं की मेहनत पर भरोसा कैसे कायम रहे? सर्वेक्षण के दौरान 67 प्रतिशत लोगों ने प्रवेश और सरकारी भर्ती परीक्षाओं की निष्पक्षता पर या तो कम भरोसा जताया है या बिल्कुल भी भरोसा नहीं जताया है। परीक्षा व्यवस्था जीवन में आगे बढ़ने का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मार्ग होती है। इसके संदिग्ध होते ही सवाल केवल अभ्यर्थी के भविष्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे व्यवस्था की वैधता तक जा पहुंचता है। देश का गरीब और छोटे शहर का युवा आज यह पूछने को मजबूर है कि क्या बिना किसी सिफारिश, पैसे और प्रभाव के भी उसके लिए सफलता के दरवाजे खुले हैं?

चुनाव आयोग और निष्पक्षता की कसौटी

यदि चुनाव की निष्पक्षता पर ही लोगों का भरोसा घटने लगे, तो चुनाव कराने वाली संस्था भी इन सवालों से कभी बच नहीं सकती है। सर्वेक्षण में शामिल 43.3 प्रतिशत लोगों का यह कहना था कि पिछले एक साल के दौरान चुनाव आयोग पर उनका भरोसा बढ़ा है। वहीं दूसरी तरफ 38 प्रतिशत लोगों ने चुनाव आयोग पर अपना भरोसा घटने की बात भी खुलकर कही है। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को देश में 60 प्रतिशत लोगों का समर्थन मिला और 76 प्रतिशत लोगों ने अवैध प्रवासन को एक बड़ा खतरा माना। इन सब बातों के बावजूद देश में चुनावों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर लोगों का भरोसा कम हुआ है। आम नागरिक मतदाता सूची से सभी फर्जी और दोहरी प्रविष्टियों को हटाने तथा चुनावी व्यवस्था को और मजबूत करने के पूरी तरह पक्ष में है। लेकिन नागरिक यह भी अपेक्षा करता है कि इस पूरी प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता हो, नियम स्पष्ट हों और सबके लिए एक समान पैमाने अपनाए जाएं। किसी भी संस्था का केवल अंतिम फैसला ही नहीं, बल्कि उस फैसले तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया भी भरोसे की एक बड़ी कसौटी होती है।

आर्थिक आंकड़े और नागरिक की जेब का सच

अर्थव्यवस्था के आंकड़े चाहे जितनी भी बड़ी और सुनहरी तस्वीर क्यों न दिखाएं, लेकिन नागरिक की अपनी जेब उसका सबसे सच्चा और कड़वा हिसाब बताती है। सर्वेक्षण में शामिल 23 प्रतिशत लोगों ने बेरोजगारी को सरकार की सबसे बड़ी असफलता माना है। वहीं 15.9 प्रतिशत लोगों ने महंगाई को और 13.9 प्रतिशत लोगों ने आर्थिक वृद्धि को अपनी मुख्य चिंता बताया है। लगभग आधे यानी करीब 47 प्रतिशत लोग सरकार के मौजूदा आर्थिक प्रबंधन को औसत, खराब या फिर बहुत खराब श्रेणी में रखते हैं। देश में बढ़ती महंगाई, आर्थिक असमानता और रोजमर्रा के बढ़ते खर्चों ने आम परिवारों पर कर्ज का दबाव काफी बढ़ा दिया है। यहीं पर सरकारी आंकड़े और एक आम नागरिक का दैनिक जीवन का अनुभव बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं। जब देश के विकास के आंकड़े तो लगातार बढ़ते दिखें, लेकिन नौकरी और घरेलू बजट से कोई राहत न मिले, तो सवाल सिर्फ आर्थिक नीति पर नहीं उठता। तब सवाल उन संस्थाओं पर भी सीधा उठता है जो देश के लिए ऐसे तमाम महत्वपूर्ण आर्थिक फैसले लेती हैं।

भ्रष्टाचार के आरोप और संस्थागत जवाबदेही

जब भी देश में भ्रष्टाचार का कोई सवाल उठता है, तो उसका सीधा निशाना केवल व्यवस्था पर नहीं बल्कि उसके प्रति बने भरोसे पर लगता है। सर्वेक्षण में शामिल 43 प्रतिशत लोगों को आज यह लगता है कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल के दौरान देश में भ्रष्टाचार बढ़ा है। पेपर लीक के मामले, भर्ती से जुड़े विवाद, प्रशासनिक स्तर पर होने वाली देरी और संस्थागत फैसलों पर उठते सवाल इस धारणा को और मजबूत करते हैं। न्यायपालिका, प्रशासन और चुनाव तंत्र से आज आम नागरिकों की अपेक्षाएं पहले से काफी ज्यादा बढ़ चुकी हैं। लेकिन यदि फैसला बहुत देर से मिले, निर्णय की प्रक्रिया पूरी तरह अस्पष्ट हो या कोई जवाबदेही नजर न आए तो संदेह और अधिक गहरा हो जाता है। यह फर्क समझना बहुत जरूरी है कि किसी भी संस्था पर केवल आरोप लगना और उन आरोपों का सिद्ध होना दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। फिर भी लगातार उठते रहने वाले ये गंभीर आरोप सार्वजनिक भरोसे को अंदर से कमजोर करते चले जाते हैं। किसी भी संस्था की विश्वसनीयता केवल उसके सही निर्णयों से नहीं बनती, बल्कि निर्णय की पारदर्शिता, प्रक्रिया की स्पष्टता और जवाबदेही ही उसे लंबे समय तक टिकाऊ बनाती है।

लोकतंत्र की असली ताकत और निष्कर्ष

लोकतंत्र की सबसे बड़ी दरार तब पड़ती है जब कोई नागरिक सवाल तो पूछे, लेकिन उसे मिलने वाले जवाब पर बिल्कुल भी भरोसा न हो। इसे लोकतंत्र का पतन कह देना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन इस गंभीर चेतावनी को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता है। राजनीतिक सहमति आज भी देश में पूरी तरह कायम है और प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ भी काफी ऊंचा बना हुआ है। इसके बावजूद लोकतंत्र की असली कसौटी किसी की लोकप्रियता नहीं, बल्कि संस्थाओं पर एक आम नागरिक का पक्का भरोसा होती है। क्या देश के चुनाव वास्तव में पूरी तरह निष्पक्ष हैं? क्या देश का युवा अपनी कड़ी मेहनत का उचित परिणाम पा सकता है? क्या एक आम नागरिक को प्रशासन और न्यायपालिका से सही समय पर न्याय मिल पाता है? लोकतंत्र बहुमत की ताकत का नाम नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक को एक निष्पक्ष व्यवस्था मिलने का भरोसा है। इसलिए परीक्षा प्रणाली में पूरी पारदर्शिता, चुनाव प्रक्रिया में स्पष्टता, प्रशासन में जवाबदेही, न्याय में तेजी और भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच बहुत जरूरी है। आंकड़े, सरकारें और मुद्दे आने वाले समय में बदलेंगे, लेकिन नागरिक का मूल सवाल हमेशा वही रहेगा कि क्या यह व्यवस्था मेरे साथ पूरी तरह निष्पक्ष है? इसी एक सवाल के सही जवाब में ही देश के लोकतंत्र की असली ताकत छिपी हुई है।

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